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Revision Court ने रिकॉर्ड की जांच और पक्षों की बात सुन ली और विवादों के गुण-दोष से जुड़े निष्कर्ष दर्ज कर लिए तो मामलों को नए सिरे से विचार के लिए वापस भेजने से बचना चाहिए

विवादित आदेशों को रद्द करने के बाद मामलों को नए सिरे से विचार के लिए ट्रायल कोर्ट को वापस भेजने की प्रथा बंद करें

Revision Court ने रिकॉर्ड की जांच और पक्षों की बात सुन ली और विवादों के गुण-दोष से जुड़े निष्कर्ष दर्ज कर लिए तो मामलों को नए सिरे से विचार के लिए वापस भेजने से बचना चाहिए

एक बार जब Revision Court ने रिकॉर्ड की जांच कर ली. पक्षों की बात सुन ली और विवादों के गुण-दोष से जुड़े निष्कर्ष दर्ज कर लिए तो मामलों को नए सिरे से विचार के लिए वापस भेजने की सामान्य प्रक्रिया से बचना चाहिए. Revision Court के ऐसे रिमांड आदेश, किसी भी स्पष्ट कानूनी या प्रक्रियात्मक आवश्यकता के अभाव में, मुकदमेबाजी को अनावश्यक रूप से लंबा खींचते हैं और कार्यवाही की अनावश्यक बहुलता का कारण बनते हैं. इस कमेंट के साथ इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस विनोद दिवाकर की बेंच ने एक साथ 11 मामलों को निरस्तारित कर दिया है. कोर्ट ने अपने आदेश में Revision Court के लिए डायरेक्शन भी जारी किये हैं.

यह याचिका अपर सत्र न्यायाधीश मथुरा द्वारा Criminal Revision संख्या 32/2025, (ध्रुव सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य) में 09.09.2025 को पारित आदेश को रद्द करने की मांग करते हुए प्रस्तुत की गई थी जिसके द्वारा मामले को नए सिरे से विचार करने हेतु विचारण न्यायालय को वापस भेज दिया गया था.

संक्षेप में तथ्य यह हैं कि याचिकाकर्ता कुंदन ने धारा 145 Cr.P.C. के तहत एक शिकायत नगर मजिस्ट्रेट मथुरा से की. जिसमें कहा गया था कि वह ‘कुंदन वाटिका’ नाम से एक मैरिज होम का स्वामी है. उसने यह मैरिज होम अपनी स्वयं की भूमि पर बनवाया है. मैरिज हॉल के एक कोने में स्थित एक कमरा सुरक्षा गार्ड, ध्रुव सिंह को रहने के लिए दिया गया था. अब सुरक्षा गार्ड यह दावा करते हुए शिकायतकर्ता के मैरिज हॉल पर अवैध रूप से कब्ज़ा करने का प्रयास कर रहा है कि उसने इसे कुंदन सिंह से खरीदा था. शिकायत प्राप्त होने पर नगर मजिस्ट्रेट ने थाना कोतवाली के निरीक्षक से एक रिपोर्ट मांगी.

निरीक्षक ने एक रिपोर्ट प्रस्तुत की जिसमें कहा गया था कि दोनों पक्ष विवादित संपत्ति पर अपने-अपने अधिकारों का दावा कर रहे हैं कि शांति भंग होने की आशंका है और दोनों पक्षों के बीच कोई अप्रिय घटना घटित हो सकती है. दोनों पक्षों को सुनने और अभिलेख का अवलोकन करने के पश्चात नगर मजिस्ट्रेट ने पुलिस को निर्देश दिया कि वह उक्त संपत्ति को कुर्क कर ले और उसे किसी निष्पक्ष व्यक्ति के सुपुर्द कर दे. इससे व्यथित होकर प्रतिवादी संख्या 2 ने नगर मजिस्ट्रेट के आदेश को वापस लेने के लिए एक अर्जी दी.

सिटी मजिस्ट्रेट ने फिर से पुलिस से रिपोर्ट मांगी. रिपोर्ट में बताया गया कि सिविल मुकदमा संख्या ध्रुव सिंह बनाम कुंदन सिंह मथुरा के सिविल जज (जूनियर डिवीजन) की अदालत में विचाराधीन है. ट्रायल कोर्ट ने दोनों पक्षों को ‘यथास्थिति’ बनाए रखने का निर्देश दिया था. दोनों पक्षों की दलीलें सुनने और रिकॉर्ड की जांच करने के बाद सिटी मजिस्ट्रेट ने प्रतिवादी की उस अर्जी को खारिज कर दिया जिसमें 10.08.2021 के आदेश को वापस लेने की मांग की गई थी.

परिसीमा अधिनियम’की धारा 5 के तहत एक अर्जी के साथ ‘Criminal Revision’ याचिका दायर करके चुनौती दी गई थी

इस आदेश को जिला एवं सत्र न्यायाधीश के समक्ष ‘परिसीमा अधिनियम’की धारा 5 के तहत एक अर्जी के साथ ‘Criminal Revision’ याचिका दायर करके चुनौती दी गई थी. Revision Court ने परिसीमा अधिनियम की धारा 5 के तहत दी गई अर्जी को मंजूर कर लिया और 10.08.2021 तथा 26.12.2024 के आदेशों को रद्द कर दिया और मथुरा के सिटी मजिस्ट्रेट को एक नया आदेश पारित करने का निर्देश दिया.

रिट में दर्ज तथ्यों को परखने के बाद कोर्ट ने पाया कि Revision Court द्वारा पारित आदेश विस्तृत है और कोर्ट ने मामले के सभी पहलुओं पर चर्चा की है, सिवाय प्रतिवादी संख्या 2 द्वारा लिमिटेशन एक्ट की धारा 5 के तहत दायर आवेदन पर निष्कर्ष देने के. Revision Court के सामने इस मामले पर अंतिम राय लेने में कोई कानूनी बाधा नहीं थी. मामले को नए सिरे से निर्णय के लिए सिटी मजिस्ट्रेट के पास वापस भेजने का कोई कारण दर्ज नहीं किया गया है, केवल मामले के गुण-दोष पर निष्कर्ष दर्ज किए गए थे.

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यदि Revision Court ने सिटी मजिस्ट्रेट के आदेश को त्रुटिपूर्ण पाया होता औ अपनी स्वयं की टिप्पणियाँ दर्ज करते हुए,उक्त आदेश को रद्द कर दिया होता तो उसे मामले को नए सिरे से विचार के लिए वापस भेजने के बजाय गुण-दोष के आधार पर स्वयं ही निर्णय लेना चाहिए था. कोर्ट ने माना कि कई याचिकाओं में एक बार-बार उठने वाला मुद्दा सामने आया है जहाँ Revision Court गुण-दोष पर निष्कर्ष दर्ज करने के बाद लगातार मामलों को ट्रायल कोर्ट के पास वापस भेज देते हैं.

विवादित आदेशों को एक नियमित प्रक्रिया के तौर पर रद्द कर दिया जाता है और ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया जाता है कि वे Revision Court द्वारा दर्ज किए गए निष्कर्षों को ध्यान में रखते हुए नए आदेश पारित करें.

ट्रायल कोर्ट अक्सर फिर से वैसे ही आदेश पारित कर देते हैं, जिससे बार-बार मामले वापस भेजने की स्थिति उत्पन्न होती है. यह चक्र कभी-कभी कई बार दोहराया जाता है, इससे पहले कि मामला इस कोर्ट तक पहुँचे. Revision Court ने, स्वतंत्र रूप से विचार करने और अपने निष्कर्ष दर्ज करने के बाद, मामले को नए सिरे से निर्णय के लिए वापस भेजकर सिटी मजिस्ट्रेट पर अनावश्यक बोझ डाल दिया है.

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अदालतों पर इस बार-बार होने वाली प्रथा के प्रभाव की जाँच करने पर, इस कोर्ट ने सभी संबंधित पक्षों को सुनने का निर्णय लिया ताकि Revision Court द्वारा अपनाई गई कार्यप्रणाली की विस्तार से जाँच की जा सके. रजिस्ट्रार जनरल को एक नोटिस जारी किया गया जिसमें उन्हें उक्त प्रथा के संबंध में कोई भी सामग्री रिकॉर्ड पर रखने की स्वतंत्रता दी गई और इस संबंध में एक सुविज्ञ निर्णय लेना रजिस्ट्रार जनरल पर छोड़ दिया गया.

अपना पक्ष रखते हुए सीनियर एडवोकेट ने कहा कि अदालतों का प्रयास हमेशा मुकदमों को कम करना होना चाहिए न कि उन्हें बढ़ाना. कोई भी अनावश्यक रिमांड (Revision) मुकदमों के एक नए दौर को जन्म देती है जिससे बचा जाना चाहिए. अदालतें पहले से ही काम के भारी बोझ से दबी हुई हैं इसलिए, एक बार जब कोई अदालत अपने न्यायिक विवेक का उपयोग करके और संवैधानिक अदालतों द्वारा निर्धारित सिद्धांतों के अनुरूप मामले के गुण-दोष पर निष्कर्ष दर्ज कर लेती है तो Revision Court के लिए मामले को वापस भेजकर नए सिरे से निर्णय देने का निर्देश देने का कोई स्पष्ट औचित्य नहीं रह जाता.

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एमिकस क्यूरी ने BNSS, 2023 की धारा 438 (Cr.P.C. की धारा 397) पर भरोसा जताते हुए प्रस्तुत किया कि BNSS, 2023 की धारा 438 का उद्देश्य और दायरा पुनरीक्षण की शक्ति का प्रयोग करने के लिए अभिलेखों (records) को मंगाना है. BNSS, 2023 की धारा 438 हाई कोर्ट और सत्र न्यायाधीश को किसी भी अधीनस्थ आपराधिक अदालत के अभिलेखों को मंगाने और उनकी जांच करने का अधिकार देती है, ताकि यह निर्धारित किया जा सके कि उस अधीनस्थ अदालत का दंडादेश, निष्कर्ष या आदेश कानूनी, सही या उचित है या नहीं.

क्या उस अदालत की कार्यवाही नियमित है, जिससे न्याय की विफलता और अवैधता के जारी रहने को रोका जा सके. हाई कोर्ट, BNSS, 2023 की धारा 442 (Cr.P.C. की धारा 401) के तहत आपराधिक पुनरीक्षण क्षेत्राधिकार का प्रयोग करते हुए, दोषमुक्ति  के निष्कर्ष को दोषसिद्धि में नहीं बदल सकती. यदि हाई कोर्ट को लगता है कि दोषमुक्ति का निर्णय त्रुटिपूर्ण था, तो वह उसे सीधे रद्द नहीं करेगी इसके बजाय, वह मामले को वापस भेज देगी ताकि विचारण अदालत द्वारा साक्ष्यों का पुनर्मूल्यांकन किया जा सके.

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कोर्ट ने कहा है कि उत्तर प्रदेश राज्य में सभी Revision Court से यह अपेक्षा की जाती है कि वे अधीनस्थ कोर्ट को मामलों को नए सिरे से विचार के लिए वापस भेजते समय उचित संयम और सावधानी बरतें.

विशेष रूप से BNSS, 2023 की धारा 164 और BNSS, 2023 की धारा 175(3) के तहत उत्पन्न होने वाली कार्यवाही में साथ ही इसी तरह की अन्य विविध कार्यवाही में. रिमांड की शक्ति एक अपवाद है, नियम नहीं. यहाँ तक कि BNSS, 2023 की धारा 442(3) भी उन सीमित सीमाओं को मान्यता देती है जिनके भीतर रिविजनल क्षेत्राधिकार का प्रयोग किया जाना है. इसलिए रिमांड का सहारा केवल दुर्लभ और असाधारण परिस्थितियों में ही लिया जाना चाहिए.

न्यायालयों को इस बात के प्रति सचेत रहना चाहिए कि बार-बार होने वाली न्यायिक सुनवाई के दौर के कारण होने वाला विलंबित न्याय, अक्सर न्याय से वंचित होने के समान ही होता है. चूंकि यह मामला पहले से ही सिविल कोर्ट में लंबित है और सिविल कोर्ट ने पक्षों को यथास्थिति बनाए रखने का निर्देश दिया है, इसलिए इस मामले को नए सिरे से फैसला करने के लिए सिटी मजिस्ट्रेट के पास वापस भेजने का कोई औचित्य नहीं है.

जैसा कि जांच अधिकारी की जांच रिपोर्ट में दर्ज है पक्षों के जीवन और संपत्ति को तत्काल खतरा है. इसलिए सिटी मजिस्ट्रेट का संपत्ति को कुर्क करने और उसे किसी निष्पक्ष तीसरे पक्ष को सौंपने का फैसला न्यायसंगत और उचित है. इसके आधार पर कोर्ट ने अपर सत्र न्यायाधीश मथुरा द्वारा आपराधिक पुनरीक्षण संख्या 32/2025 में 09.09.2025 को पारित विवादित आदेश को रद्द कर दिया और याचिका स्वीकार कर ली.

बता दें कि इस याचिका के साथ दस अन्य रिटें भी कनेक्ट थीं. सभी संबंधित मामलों में इस न्यायालय के समक्ष विचार के लिए एक सामान्य प्रश्न उत्पन्न हुआ है. इनमें से प्रत्येक मामले में, पुनरीक्षण न्यायालयों ने पक्षों को सुनने और अभिलेखों की जांच करने के बाद, उप-विभागीय मजिस्ट्रेट द्वारा BNSS, 2023 की धारा 164 [धारा 145 Cr.P.C.] के तहत और/या मजिस्ट्रेटों द्वारा BNSS, 2023 की धारा 175(3) [धारा 156(3) Cr.P.C.] के तहत पारित आदेशों को रद्द कर दिया और साथ ही विवाद के गुण-दोष से संबंधित निष्कर्ष भी दर्ज किए. ऐसा करने के बावजूद, Revision Court ने बाद में पुनरीक्षण आदेशों में दर्ज टिप्पणियों के आलोक में मामलों को नए सिरे से निर्णय के लिए विचारण न्यायालयों के पास वापस भेज दिया.

दुर्भाग्य से, उत्तर प्रदेश के जिला कोर्ट में एक विपरीत प्रथा विकसित होती दिख रही है, जिसके तहत Revision Court द्वारा गुण-दोष की जांच पहले ही कर लिए जाने के बावजूद मामलों को नियमित रूप से वापस भेज दिया जाता है. ऐसा दृष्टिकोण न केवल ट्रायल कोर्ट और उप-विभागीय मजिस्ट्रेट के कोर्ट पर बार-बार होने वाली कार्यवाही का बोझ डालता है, बल्कि अनावश्यक रूप से मामलों के ढेर लगने में भी योगदान देता है, जिससे न्याय प्रशासन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है. इसलिए, इस प्रथा को बंद किया जाना चाहिए.
कोर्ट ने की टिप्पणी

कोर्ट ने मामलों को संबंधित Revision Court को इस उद्देश्य से वापस भेजा दिया है कि ‘न्यायिक अधिकारियों को इस स्थापित सिद्धांत के प्रति संवेदनशील बनाया जाए’ कि, एक बार जब रिकॉर्ड की जांच और पक्षों की सुनवाई के बाद गुण-दोष के आधार पर निष्कर्ष दर्ज कर लिए जाते हैं, तो आमतौर पर मामले को अधीनस्थ न्यायालय द्वारा नए सिरे से निर्णय के लिए वापस भेजना (रिमांड करना) अनावश्यक होता है.

यह उम्मीद की जाती है कि, भविष्य में, Revision Court रिमांड की शक्ति का प्रयोग करते समय अधिक सतर्क, विवेकपूर्ण और कानूनी रूप से मान्य दृष्टिकोण अपनाएंगे, और ऐसे कदम का सहारा केवल तभी लेंगे जब कोई बाध्यकारी कानूनी या प्रक्रियात्मक आवश्यकता ऐसा करने की मांग करती हो.

इसके साथ ही कोर्ट ने चुनौती के अधीन Revision Court के आदेश:
(1) A-227/1539/2025- उमेश कुमार उपाध्याय बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और 5 अन्य;
(2) A-227/12515/2025- महताब हुसैन और एक अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और 4 अन्य;
(3) A-227/12524/2025- आफताब हुसैन और एक अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और 4 अन्य;
(4) A-227/13115/2025- दीनदयाल सिंह और 5 अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और एक अन्य;
(5) A-227/13746/2025- राजीव शुक्ला और एक अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और 2 अन्य;


(6) A-227/12434/2025- श्रीमती हेमलता बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और 3 अन्य;
(7) A-227/13129/2025- रुचि गुप्ता और 7 अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और एक अन्य;
(8) A-227/14400/2025- गिरीश दास बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और एक अन्य;
(9) A-227/5149/2022- बबीता बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और 2 अन्य; और
(10) A-227/13622/2025- असवद बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य को रद्द कर दिया है और संबंधित पुनरीक्षण न्यायालयों को नए आदेश पारित करने का निर्देश दिया है.

कोर्ट ने कहा कि न तो उच्च न्यायालय की ओर से उपस्थित अधिवक्ता ने और न ही एमिकस क्यूरी ने इस न्यायालय के समक्ष कोई ऐसा निर्णय या न्यायिक दृष्टांत प्रस्तुत किया है जो विवादित आदेशों को रद्द करने के बाद मामलों को नए सिरे से विचार के लिए अधीनस्थ न्यायालयों को वापस भेजने की नियमित प्रथा को उचित ठहराता हो.

कोर्ट ने रजिस्ट्रार (अनुपालन) को निर्देश दिया है कि वे इस आदेश की एक प्रति तत्काल उत्तर प्रदेश राज्य के सभी जिला न्यायाधीशों को परिचालित करें. इसकी प्राप्ति पर जिला न्यायाधीश अपने-अपने न्याय-क्षेत्रों में चर्चा, अनुपालन और अभिलेख के प्रयोजनार्थ बैठकें आयोजित करेंगे.

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