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पुरुष को शादी के झूठे वादे के आधार पर Sexual relation बनाने के लिए आपराधिक रूप से तभी उत्तरदायी ठहराया जा सकता है जब संबंध उसी झूठे वादे के कारण बना हो

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने मुरादाबाद जिले में युवक उसके पिता और अन्य रिश्तेदारों के खिलाफ दर्ज एफआईआर और केस कार्रवाई को रद किया

पुरुष को शादी के झूठे वादे के आधार पर Sexual relation बनाने के लिए आपराधिक रूप से तभी उत्तरदायी ठहराया जा सकता है जब संबंध उसी झूठे वादे के कारण बना हो

किसी पुरुष को शादी के झूठे वादे के आधार पर Sexual relation बनाने के लिए आपराधिक रूप से तभी उत्तरदायी ठहराया जा सकता है जब वह Sexual relation पूरी तरह से उसी झूठे वादे के कारण बना हो. यदि वह Sexual relation अन्य कारणों से बना हो तो अपराध सिद्ध नहीं होता है. कोई महिला शादी के वादे के अलावा अन्य कारणों जैसे कि आपसी स्नेह या व्यक्तिगत पसंद के कारण, Sexual relation बनाने का चुनाव कर सकती है, भले ही वह शादी के लिए जोर न दे रही हो.

यह एक स्थापित तथ्य है कि आपराधिक मामलों में, जहाँ आरोपी पर बलात्कार का आरोप होता है, पीड़िता की गवाही बहुत अहम हो जाती है और यदि उसका बयान पूरी तरह विश्वसनीय है तो उसे किसी अन्य साक्ष्य से पुष्टि की भी आवश्यकता नहीं होती. इसका विपरीत भी सच है क्योंकि साक्ष्य के मूल्यांकन से संबंधित कानून गवाहों की विभिन्न श्रेणियों के बीच कोई भेदभाव नहीं करता और बलात्कार की पीड़िता को कोई विशेष अधिकार नहीं दिया गया है. पीड़िता के बयान को ‘अटल सत्य’ मानने का कोई सार्वभौमिक कानून नहीं है.

इस कमेंट के साथ इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस मदन पाल सिंह की बेंच ने कपिल सोम और अन्य की तरफ से दाखिल आपराधिक अपील को स्वीकार कर लिया है और उसके खिलाफ मुरादाबाद जिले में दर्ज एफआईआर और उससे जुड़ी केस कार्रवाई को रद कर दिया है.

कोर्ट ने 5 जुलाई 2025 के विवादित आदेश तथा केस क्राइम संख्या 29/2025 से उत्पन्न विशेष सत्र विचारण संख्या 1283/2025 (राज्य बनाम कपिल सोम व अन्य) की संपूर्ण कार्यवाही जो धारा 352, 351 (2), 69 बीएनएस और एससी/एसटी एक्ट की धारा 3 (1) (r), 3 (1) (s) तथा धारा 3 (2) (v) के अंतर्गत महिला थाना मुरादाबाद में दर्ज केस जो विशेष न्यायाधीश  मुरादाबाद के न्यायालय में लंबित है को रद्द कर दिया है.

अपने फैसले में कोर्ट ने यह भी मेंशन किया है कि शादी का झूठा वादा करके किसी महिला के साथ Sexual relations बनाना एक ऐसा अपराध है जो उसकी सहमति को दूषित कर देता है, और इसके तहत IPC की धारा 376 के तहत अपराध बनता है. वादे का उल्लंघन आम तौर पर किसी एक पक्ष द्वारा दूसरे पक्ष से शादी करने के आपसी समझौते या प्रतिबद्धता को पूरा न कर पाने के रूप में परिभाषित किया जाता है और इसे एक दीवानी गलती माना जाता है.

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शादी के झूठे वादे की आड़ में बलात्कार करने के लिए किसी आरोपी को आपराधिक रूप से दोषी ठहराने हेतु आवश्यक है कि अभियोजन पक्ष यह साबित करे कि आरोपी ने शुरू से ही पीड़िता को धोखा दिया था, और उसका शादी करने का कोई इरादा नहीं था. उसका एकमात्र उद्देश्य अपनी हवस (Sexual relation) मिटाना था.

शादी के झूठे वादे के आधार पर Sexual relation अपराध के आवश्यक तत्व:

  • (a) आरोपी ने पीड़िता से शादी करने का वादा किया था
  • (b) वह वादा झूठा था और उसे पूरा करने का कोई इरादा नहीं था
  • (c) वह वादा पीड़िता को धोखा देने और उसे Sexual relation बनाने के लिए सहमति देने हेतु प्रेरित करने के इरादे से किया गया था
  • (d) धोखा देने और छल करने का बेईमानी भरा इरादा वादे की शुरुआत से ही मौजूद था
  • (e) Sexual relation के लिए पीड़िता की सहमति केवल ऐसे झूठे वादे के आधार पर ही प्राप्त की गई थी
  • (f) किसी झूठे वादे के कारण सहमति को दूषित मानने के लिए, उस वादे का महिला द्वारा Sexual relation बनाने के निर्णय से सीधा और तात्कालिक संबंध होना आवश्यक है
  • (g) इस बात को दर्शाने के लिए पर्याप्त सबूत होने चाहिए कि आरोपी द्वारा किया गया वादा, अपनी शुरुआत से ही, उसे पूरा करने के किसी भी इरादे के बिना किया गया था

कोर्ट ने कानूनी सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए FIR और पीड़ित के 161 और 164 के तहत दिए गए बयानों की बारीकी से जांच करने पर पाया कि इसमें शादी के बहाने Sexual relation के सिर्फ कोरे आरोप लगाए गए हैं. बिना यह बताए कि उनका रिश्ता कितने समय तक चला या उस समय कोई वादा किया गया था या नहीं.

प्रथम सूचना रिपोर्ट और अपने बयानों में पीड़ित ने लगातार यही कहा है कि तीन साल पहले उसकी मुलाकात इंस्टाग्राम पर आरोपित युवक से हुई थी और उसने उससे बात की थी. एक दिन आरोपित कपिल ने कहा कि वह उसे बहुत सुंदर लगती है और वह उससे मिलकर उनकी शादी के बारे में बात करना चाहता है. इस पर उसने कपिल से कहा कि वह उसकी बहन के घर आ जाए. आरोपित वहाँ आया और फिर उसने युवती से कहा कि वह मेरठ में उसके घर आ जाए. इसके बाद वह उसके साथ मेरठ में उसके घर गई जहाँ वह 56 दिनों तक रही और Sexual relation बनाए.

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युवती ने आरोपित सोम से पूछा कि वह उससे शादी कब करेगा तो वह उसे अपने परिवार के सदस्यों और कुछ रिश्तेदारों के साथ सिविल कोर्ट (कचहरी) ले गया और 50 रुपये के स्टांप पेपर पर उसके दस्तखत करवा लिए और कहा कि उनकी शादी हो चुकी है और अब वे दोनों पति-पत्नी की तरह रहेंगे.  युवती ने बताया है कि दिसंबर 2023 में आरोपित सोम ने उसे जीरो प्वाइंट पर छोड़ दिया और चला गया. इसके बाद उसने संबंधित पुलिस अधीक्षक को एक अर्जी दी.

बयानों से यह साफ है कि युवती अपनी मर्जी से इंस्टाग्राम पर आरोपित सोम के साथ लगभग तीन दिनों तक चैट करती रही . हैरानी की बात है कि 24 साल की एक बालिग लड़की, आरोपित के बारे में कुछ भी जाने बिना उसे अपनी बहन के घर बुलाती है और उसके जोर देने पर अगले ही दिन उसके घर चली जाती है और वहाँ 56 दिनों तक रहती है.

जहाँ उसकी मर्जी के बिना आरोपित उसके साथ Sexual relation बनाता है. जिसके बारे में वह किसी से कोई शिकायत नहीं करती. यहाँ यह भी ध्यान देने लायक है कि पीड़िता की माँ, पिता, भाई और बहन भी पीड़िता को आरोपित के साथ भेज देते हैं, जबकि वे उसके बारे में कुछ भी नहीं जानते थे.

वे लगभग एक साल तक कोई आपत्ति नहीं उठाते और वे तभी आते हैं जब पीड़िता उन्हें बुलाती है. बयान साफ दिखाते हैं कि आरोपित और पीड़िता के बीच आपसी सहमति से Sexual relation थे. अदालत यह भी पाती है कि 1 मई 2025 को दर्ज की गई FIR के अनुसार, वह तीन साल पहले इंस्टाग्राम के जरिए अपीलकर्ता के संपर्क में थी.

वह अक्टूबर, 2022 में अपीलकर्ता के साथ उसके घर यानी मेरठ गई थी और दिसंबर, 2023 तक युवक के घर पर पति-पत्नी की तरह उसके साथ रिश्ते में थी. इसका मतलब यह है कि जब कथित अपराध किया था तब ‘भारतीय न्याय संहिता’ लागू नहीं हुई थी. यह संहिता 1 जुलाई, 2024 को लागू हुई थी जिसका अर्थ है कि इस संहिता की कोई भी धारा पिछली तारीख से लागू नहीं हो सकती. इसलिए B.N.S. की धारा 69 के तहत आरोपित के खिलाफ कोई अपराध नहीं बनता है.

इस बात के सबूत की गैर-मौजूदगी कि “शादी के वादे” का जरूरी तत्व विशेष रूप से यह था कि वादा शुरू से ही उसे पूरा करने के किसी भी इरादे के बिना किया गया था भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 375 के साथ पढ़ी जाने वाली धारा 90 के तहत Sexual relation के लिए पीड़ित की सहमति को अमान्य नहीं करती है. आपसी सहमति से बने Sexual relation के बाद शादी से इनकार करने पर आरोपी पर बलात्कार का आरोप नहीं लगाया जा सकता.

इस स्थिति को सुप्रीम कोर्ट के न्यायशास्त्र में लगातार समर्थन मिला है, जैसा कि दीपक गुलाटी (Supra) और प्रमोद सूर्यभान पवार (Supra) के मामलों में कहा गया है. इसमें जोर देकर यह माना गया है कि शादी के वादे को तोड़ने मात्र से, अगर शुरू में कोई बेईमान इरादा नहीं था तो आपसी सहमति से बने Sexual relation को बलात्कार में नहीं बदला जा सकता. शादी से ऐसे हर इनकार को दूषित सहमति मानना IPC की धारा 375 की पवित्रता को कमजोर करेगा और आपराधिक न्याय प्रणाली पर असली यौन अपराधों के बजाय खराब हुए रिश्तों से जुड़े मामलों का बोझ बढ़ा देगा.

सुप्रीम कोर्ट ने महेश दामू खरे बनाम महाराष्ट्र राज्य और अन्य (2024 SCC OnLine SC 347 में रिपोर्टेड) के मामले में यह राय दी है कि…… यह तथ्य कि शिकायतकर्ता ने लंबे समय तक बिना शादी की जिद किए Sexual relation बनाए रखे, इस बात की संभावना को कम करता है कि अपीलकर्ता ने उससे शादी करने का कोई ऐसा वादा किया होगा. इसके बजाय, यह इस बात का संकेत देता है कि यह रिश्ता आपसी सहमति से बना था.

सुप्रीम कोर्ट ने राय दी है कि पार्टनर्स के बीच शारीरिक संबंधों का लंबे समय तक बिना किसी विरोध या महिला पार्टनर की तरफ से शादी की जिद के जारी रहना, इस बात का संकेत है कि यह रिश्ता आपसी सहमति से बना था न कि पुरुष पार्टनर द्वारा शादी के झूठे वादे पर आधारित था.

इसके आधार पर सर्वोच्च न्यायालय ने यह मत व्यक्त किया है कि यदि इतने लंबे समय तक चले Sexual relation को बहुत बाद के चरण में जाकर आपराधिक कृत्य माना जाता है तो इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं. इससे ऐसे लंबे समय तक चले संबंधों में खटास आने के बाद उन्हें आपराधिक रंग देने की गुंजाइश पैदा हो जाएगी, क्योंकि ऐसा आरोप बहुत बाद के चरण में भी लगाया जा सकता है, ताकि किसी व्यक्ति को कठोर आपराधिक प्रक्रिया के जंजाल में फंसाया जा सके.

एक ऐसे दीवानी संबंध को, जिसमें वैसे भी पहले से ही कुछ परेशानियाँ चल रही हों, आपराधिक इरादा देने का खतरा हमेशा बना रहता है और न्यायालय को भी इस बात का ध्यान रखना चाहिए. कोर्ट ने तथ्यों को परखने के बाद कहा कि बीएनएस 2023 की धारा 352, 351(2) और 69 के तहत लगाए गए आरोपों के संबंध में मारपीट, गाली-गलौज और धमकी के दावे बहुत ही अस्पष्ट और सामान्य प्रकृति के हैं. FIR या बयानों में कोई विशिष्ट विवरण दिखाई नहीं देता है, इसलिए प्रथम दृष्टया कोई मामला नहीं बनता है. SC/ST अधिनियम की धारा 3(1)(r), 3(1)(s), या 3(2)(v) के तहत भी कोई अपराध सिद्ध नहीं होता है.

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FIR और पीड़िता के बयानों में उसकी SC/ST स्थिति को लेकर सार्वजनिक रूप से उसे अपमानित करने के उद्देश्य से कही गई किसी भी विशिष्ट जातिसूचक टिप्पणी का अभाव है. शादी से इनकार करते समय केवल जातिगत अंतरों का उल्लेख करना कानूनी आवश्यकताओं को पूरा नहीं करता है, इसलिए SC/ST अधिनियम की धारा 14-A(1) लागू नहीं होती है.

संक्षिप्त तथ्य यह हैं कि युवती द्वारा अपीलकर्ताओं और चार अन्य नामजद व्यक्तियों के विरुद्ध 1 मई, 2025 को एक प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कराई गई थी. इसे केस अपराध संख्या 29/2025 के रूप में पंजीकृत किया गया है. जिसके अंतर्गत धारा 352, 351 (2) 69 B.N.S. और SC/ST अधिनियम की धारा 3 (1) (r), 3 (1) (s) तथा धारा 3 (2) (v) शामिल थे. यह मामला पुलिस थाना-महिला थाना, जिला-मुरादाबाद में दर्ज किया या था.

अपीलकर्ताओं के वकील ने दलील दी कि कथित घटना 1 अक्टूबर, 2022 को शुरू हुई थी, लेकिन पीड़िता ने पहली सूचना रिपोर्ट 1 मई, 2025 को 18:35 बजे दर्ज कराई. इसके लिए कोई भी विश्वसनीय स्पष्टीकरण नहीं दिया गया है, और ऐसा प्रतीत होता है कि यह FIR बाद में सोच-समझकर गढ़ी गई है.

दलील दी गई कि अपीलकर्ता निर्दोष हैं क्योंकि FIR में अपीलकर्ताओं और अन्य आरोपियों पर लगाए गए आरोप झूठे और मनगढ़ंत हैं. युवक और युवती के बीच का संबंध आपसी सहमति पर आधारित थे. ऐसा कोई भी स्वतंत्र गवाह सामने नहीं आया है, जिसने अभियोजन पक्ष की कहानी का समर्थन किया हो. सोम के पिता को आरोपित इसलिए बनाया गया है ताकि उन पर दबाव बनाया जा सके.

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FIR का मात्र अवलोकन करने से यह स्पष्ट होता है कि अपीलकर्ता के विरुद्ध SC/ST अधिनियम के अंतर्गत आने वाले अपराधों से संबंधित कोई आरोप नहीं लगाए गए हैं. जांच अधिकारी के समक्ष ऐसा कोई भी दोषसिद्ध करने वाला साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया, जिससे इस दावे की पुष्टि हो सके कि अपीलकर्ता द्वारा विवाह का झूठा वादा करके पीड़िता का शोषण किया गया था.

राज्य की ओर से A.G.A. ने अपीलकर्ताओं के वकील द्वारा दी गई दलीलों का विरोध करते हुए यह तर्क दिया है कि पीड़िता का बयान स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि उसे अपीलकर्ता द्वारा धोखा दिया गया था, जिसने अपनी हवस मिटाने (Sexual relation) के लिए शादी का वादा किया था. चुनौती दिए गए आदेश में कोई अवैधता या कमी नहीं है इसलिए इस आपराधिक अपील में कोई दम नहीं है और इसे खारिज किया जाना चाहिए.

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