रेग्युलेशन 103 के तहत विधवा बहू (Daughter in law) का दर्जा पाने के लिए पहले बहू होना जरूरी: इलाहाबाद हाई कोर्ट
कोर्ट ने अनुकंपा नियुक्ति की मांग में दाखिल स्पेशल अपील किया खारिज, कहा, कर्मचारी की मौत के समय बहू नहीं थी आवेदिका

किसी सरकारी कर्मचारी जिसका बेटा जीवित हो और कर्मचारी की सेवाकाल में मृत्यु हो जाए तो केवल बेटा (न कि बहू (Daughter in law)) अनुकंपा नियुक्ति मांगने का पात्र होता है. जब बेटा सरकारी कर्मचारी से पहले ही मर गया हो तब तो एक विधवा बहू (Daughter in law) अपने पति की अनुपस्थिति में अनुकंपा नियुक्ति के लिए पात्र होगी. “बहू (Daughter in law)” वाक्यांश, “विधवा बहू (Daughter in law)” वाक्यांश के लिए एक पूर्व शर्त है. सीधे शब्दों में कहें तो ‘विधवा बहू (Daughter in law)’ का दर्जा पाने के लिए उस व्यक्ति का पहले ‘बहू (Daughter in law)’ होना जरूरी है.
इस कमेंट के साथ इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच के जस्टिस राजन राय और जस्टिस अब्देश कुमार चौधरी की बेंच ने सास के स्थान पर अनुकंपा नियुक्ति की मांग में याचिका दाखिल करने वाली Daughter in law को कोई राहत देने से इंकार कर दिया है. बेंच ने पूर्ववर्ती कोर्ट द्वारा सुनाये गये फैसले में कोई खामी नहीं पायी, इसलिए उसे बरकरार रखा.
यह स्पेशल अपील श्रीमती दीपिका तिवारी (Daughter in law) की ओर से दाखिल की गयी थी. इसमें इलाहाबाद हाई कोर्ट के नियम 1952 के अध्याय VIII नियम 5 के अंतर्गत सिंगल बेंच द्वारा रिट-ए संख्या 10799/2025 (श्रीमती दीपिका तिवारी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य) में 18 सितंबर 2025 को पारित आदेश पर रोक लगाने की मांग की गयी थी. सिंगल बेंच ने मृतक सरकारी कर्मचारी की विधवा बहू (Daughter in law) के रूप में अनुकंपा नियुक्ति के लिए उनकी याचिका खारिज कर दी थी.
मामले के तथ्यों के अनुसार संगीता बाजपेयी नारी शिक्षा निकेतन महाविद्यालय चकबस्त रोड लखनऊ में सहायक शिक्षिका के रूप में कार्यरत थीं. सेवा काल के दौरान 2021 में उसकी मृत्यु हो गयी. संगीता बाजपेयी के दो वैधानिक वारिस थे. पहले नंबर पर पति उदय भान बाजपेयी जो उत्तर प्रदेश लोक निर्माण संघ से पेंशनभोगी थे और दूसरा उनका बेरोजगार बेटा निखिल बाजपेयी.
मृतक सरकारी कर्मचारी के पुत्र निखिल बाजपेयी ने 2023 में अनुकंपा के आधार पर नियुक्ति के लिए आवेदन किया. यह आवेदन इस आधार पर खारिज कर दिया गया कि उनके पिता (मृतक संगीता बाजपेयी के पति) सरकारी पेंशनभोगी थे.
इसी बीच निखिल ने अपीलकर्ता दीपिका से शादी कर ली. दुर्भाग्य से निखिल बाजपेयी की मई 2023 में मौत हो गयी. मृत्यु की तारीख तक उन्होंने अनुकंपा के आधार पर अपनी नियुक्ति की अस्वीकृति को चुनौती नहीं दी थी. इसे मृतक कर्मचारी की विधवा बहू (Daughter in law) की तरफ से भी चुनौती नहीं दी गयी थी.
विधवा बहू (Daughter in law)’ के रूप में अनुकंपा नियुक्ति के लिए अपना दावा पेश किया

अपीलकर्ता ने 2024 में एक आवेदन के माध्यम से दिवंगत संगीता बाजपेयी की ‘विधवा बहू (Daughter in law)’ के रूप में अनुकंपा नियुक्ति के लिए अपना दावा पेश किया. सक्षम प्राधिकारी द्वारा उनके दावे को अस्वीकार कर दिया गया. इसके बाद उन्होंने रिट याचिका 4738/2024 दायर की गई. सिंगल बेंच ने 19.06.2024 के आदेश के माध्यम से प्रतिवादियों को अपीलकर्ता के अभ्यावेदन पर विचार करने का निर्देश दिया. कोर्ट के आदेश पर दिये गये अभ्यावेदन को 10.10.2024 के एक आदेश द्वारा इस आधार पर अस्वीकार कर दिया गया कि उनके ससुर पेंशन प्राप्त कर रहे थे.
इसके बाद विधवा बहू (Daughter in law) ने हाई कोर्ट में रिट-ए संख्या 10461/2024 दाखिल करके नियुक्ति न दिये जाने के आदेश को चुनौती दी. एकल न्यायाधीश ने अस्वीकृति आदेश को रद्द करते हुए सक्षम प्राधिकारी को निर्देश दिया कि वे अपीलकर्ता के दावे पर नए सिरे से विचार करें. सिंगल बेंच ने कुमारी फरहा नसीम बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य (न्यूट्रल साइटेशन संख्या-2024:AHC:154724) और कु. वंशिका निगम बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य (विशेष अपील डिफेक्टिव संख्या-73/2016) मामलों में कोर्ट द्वारा दिए गए निर्णयों को ध्यान में रखने का निर्देश दिया.
इन निर्णयों में यह माना गया था कि अनुकंपा नियुक्ति के दावे को केवल इस आधार पर अस्वीकार नहीं किया जा सकता कि पति-पत्नी में से कोई एक पेंशन प्राप्त कर रहा है. यह भी माना गया था कि अनुकंपा नियुक्ति के दावे को स्वीकार या अस्वीकार करते समय, उपलब्ध साधनों और संसाधनों की पर्याप्तता तथा आश्रित होने के मुद्दे पर सक्षम प्राधिकारी द्वारा विचार किया जाना अनिवार्य है.
कोर्ट के निर्देश के अनुपालन में याचिकाकर्ता ने रीप्रजेंटेशन दिया. इसके बाद 23 मई 2025 को नियुक्ति आदेश जारी किया गया. इसका संशोधित संस्करण 29 मई 2025 को जारी कया गया. क्षेत्रीय समिति की रिपोर्ट के आधार पर अपीलकर्ता को ‘सहायक अध्यापक’ (प्राणीशास्त्र) के पद पर नियुक्त किया गया. यह नियुक्ति ‘उत्तर प्रदेश इंटरमीडिएट शिक्षा अधिनियम, 1921’ के अध्याय 3 की धारा 16G के अंतर्गत जारी किए गए विनियम 103 से 107 के प्रावधानों पर आधारित थी.
इस संबंध में डीआईओएस द्वारा कुछ निर्देश भी जारी किए गए थे जिनमें याचिकाकर्ता के मूल दस्तावेजों का सत्यापन करने के उपरांत उसे ‘सहायक अध्यापक’ के पद पर कार्यभार ग्रहण करने की अनुमति देने का निर्देश शामिल था. इसके बाद नियुक्ति के संबंध में कुछ आपत्तियां उठाईं गईं. इसके अनुसार अपीलकर्ता मृतक सरकारी कर्मचारी की आश्रित नहीं थी. इसके बाद डीआईओएस ने उनकी नियुक्ति 21.08.2025 को रद कर दी.
इसके खिलाफ रिट याचिका संख्या 10799/2025 दायर की गई जिसमें एकल न्यायाधीश ने अपीलकर्ता (Daughter in law) की दलील को खारिज करते हुए 18.09.2025 को दिये गये अपने आदेश में कहा कि सरकारी कर्मचारी संगीता बाजपेयी की मृत्यु अपीलकर्ता के बेटे से विवाह से पहले हो जाने के कारण अपीलकर्ता बहू (Daughter in law) को ‘विनियम 103’ में परिभाषित ‘परिवार के सदस्य’ के दायरे से बाहर कर देती है. यही वह आदेश था जिसे वर्तमान स्पेशल अपील में चुनौती दी गयी थी.
अपीलकर्ता का पक्ष रखते हुए अधिवक्ता ने कहा कि विवाह सास की मृत्यु के बाद हुआ था, यह बात पूरी तरह से अप्रासंगिक है और न्यायालय के निष्कर्ष संशोधित ‘विनियम संख्या 103’ के विपरीत हैं, जिसमें स्पष्ट रूप से ‘विधवा बहू (Daughter in law)’ को आश्रितों के दायरे में शामिल किया गया है, जो अनुकंपा नियुक्ति के लिए पात्र है.
अपनी दलील को पुष्ट करने के लिए उन्होंने हाई कोर्ट की फुल बेंच के उस निर्णय पर भरोसा जताया जो ‘U.P. Power Corporation Urban Electricity Transmission Division-II, Allahabad बनाम Urmila Devi’ के मामले में दिया गया था (रिपोर्टेड: 2011 (3) ADJ 432). बेंच ने इस फैसले में कहा था कि विधवा बहू (Daughter in law) को ‘परिवार’ की परिभाषा के अंतर्गत शामिल किया गया है ताकि वह अनुकंपा के आधार पर नियुक्ति की हकदार बन सके. जिसमें विवाह की तारीख से संबंधित कोई शर्त नहीं लगाई गई है. अनुकंपा नियुक्ति के मानवीय उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए वर्तमान अपील को स्वीकार किया जाना चाहिए.
उन्होंने यह भी कहा है कि ‘विधवा बहू (Daughter in law)’ शब्द की उदार व्याख्या की जानी चाहिए, ताकि आश्रित विधवाओं को गरीबी और बेसहारापन से बचाया जा सके. कहा कि एकल न्यायाधीश ने अत्यधिक तकनीकी दृष्टिकोण अपनाकर विनियम 103 के विधायी उद्देश्य को विफल कर दिया है. वे यह समझने में असफल रहे कि वास्तव में अपीलकर्ता ने अपने पति का स्थान ले लिया था जो अनुकंपा के आधार पर नियुक्ति पाने के लिए पूरी तरह से पात्र थे.
उन्होंने विभा तिवारी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य (न्यूट्रल साइटेशन: 2024:AHC:49953-DB) में दिये गये फैसले को नजीर के तौर पर पेश किया जिसमें परिवार की परिभाषा में विशेष रूप से बहू शामिल नहीं थी फिर भी न्यायालय ने एक बहू (Daughter in law) के मामले पर विचार किया और उसे अनुकंपा नियुक्ति प्रदान की. क्योंकि उस मामले की परिस्थितियाँ ऐसी थीं कि पुत्र किसी शारीरिक अक्षमता से ग्रस्त था.
राज्य सरकार के अधिवक्ता ने कहा कि विवादित आदेश पूर्णतः तर्कसंगत एवं युक्तिसंगत है. उन्होंने अनुकंपा के आधार पर की जाने वाली किसी भी नियुक्ति के पीछे के उद्देश्य और प्रयोजन को स्पष्ट करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय द्वारा उमेश कुमार नागपाल बनाम हरियाणा राज्य मामले में दिए गए निर्णय (जो 1994 (4) SCC 138 में प्रकाशित है) पर भरोसा जताया. उनके अनुसार अपीलकर्ता को किसी भी प्रकार की राहत प्रदान करने का कोई भी आधार मौजूद नहीं है. अपीलकर्ता सरकारी कर्मचारी की मृत्यु के समय मृतक के परिवार की सदस्य भी नहीं थी. इसलिए वह नियमों के तहत “परिवार” की परिभाषा के दायरे में नहीं आती थी.
नारी शिक्षा निकेतन इंटर कॉलेज की तरफ से पेश अधिवक्ता ने तर्क दिया कि अपीलकर्ता “उत्तर प्रदेश सरकारी सेवकों के सेवाकाल में मृत्यु होने पर उनके आश्रितों की भर्ती नियमावली, 1974” के नियम 2 (c) के तहत परिभाषित “परिवार” की परिभाषा के दायरे में नहीं आती हैं. उनके अनुसार, लखनऊ के DM द्वारा 23.06.2021 को जारी किए गए “कानूनी वारिस प्रमाण पत्र” में केवल पति और पुत्र का नाम दर्ज था. मृतक के पुत्र ने अनुकंपा के आधार पर अपनी नियुक्ति का दावा किया था. उनकी नियुक्ति को अस्वीकृत किये जाने के आदेश को आज तक न तो श्री निखिल बाजपेयी द्वारा और न ही याचिकाकर्ता द्वारा चुनौती दी गई है.
क्या विधवा होने की तिथि एक प्रासंगिक कारक है, जिसके आधार पर किसी विधवा पुत्रवधू (Daughter in law) को परिवार की परिभाषा में शामिल किया जा सके, ताकि वह विनियमों के तहत ‘अनुकंपा के आधार पर नियुक्ति का दावा करने की पात्र बन सके?
कोर्ट के सामने विचारण के लिए महत्वपूर्ण तथ्य
कोर्ट ने माना कि यह मुद्दा इस तथ्य के प्रकाश में और भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि “बहू (Daughter in law)” वाक्यांश, “परिवार के सदस्य” की परिभाषा से स्पष्ट रूप से नदारद है. इसके विपरीत “विधवा बहू (Daughter in law)” वाक्यांश का स्पष्ट उल्लेख किया गया है और उसे पात्र माना गया है. इसका सीधा सा कारण यह है कि आम बोलचाल में पत्नी (Daughter in law) अपने पति (यानी बेटे) पर भरण-पोषण आदि के लिए निर्भर होती है इसलिए, “परिवार के सदस्य” की परिभाषा में बहू (Daughter in law) का नाम अलग से शामिल करने की कोई आवश्यकता नहीं थी.
नियमों में एक ऐसी स्थिति की परिकल्पना की गई है कि यदि बेटा (यानी पति) उस सरकारी कर्मचारी से पहले ही मर गया हो, जिसकी सेवाकाल के दौरान मृत्यु हुई है, तो ऐसे मामले में विधवा बहू (Daughter in law) को विशेष रूप से “परिवार का सदस्य” माना गया है, ताकि उसे अनुकंपा नियुक्ति के लिए पात्र बनाया जा सके. यह तर्क न केवल अधिक तार्किक और सद्भावपूर्ण प्रतीत होता है, बल्कि यह नियमों के तहत किसी भी अनुकंपा नियुक्ति के पीछे निहित महत्वाकांक्षी मानवीय उद्देश्य के भी पूरी तरह अनुरूप है.
यह समझना जरूरी है कि अनुकंपा के आधार पर नौकरी देने के प्रावधान का मकसद, मृत कर्मचारी के परिवार को उस अचानक आई मुसीबत से उबरने में मदद करना है, जो परिवार के कमाने वाले की मौत से पैदा हुई है जिसने परिवार को गरीबी और बिना किसी रोजी-रोटी के साधन के छोड़ दिया है.
तकनीकी और सामान्य तौर पर, सहानुभूति के आधार पर दी जाने वाली यह नौकरी असंवैधानिक है और भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन करती है. फिर भी सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार यह कहा है कि इस तरह की अनुकंपा नियुक्ति का मकसद सिर्फ नौकरी देना नहीं, बल्कि आर्थिक मदद पहुँचाना है. यह बात तय है कि इसका मूल विचार यह सुनिश्चित करना है कि मृत कर्मचारी के परिवार पर आई विपत्ति के समय, उनकी मुश्किलों को कम करने के लिए तुरंत मदद दी जाए.
जजमेंट में कोट किया गया पैरा
हमें उस अधिकार क्षेत्र की प्रकृति और सीमा को भी ध्यान में रखना चाहिए जिसका प्रयोग उच्च न्यायालय की ‘इंट्रा-कोर्ट’ करती है. ऐसा अपीलीय अधिकार क्षेत्र या तो ‘लेटर्स पेटेंट’ के तहत या प्रासंगिक वैधानिक प्रावधानों के तहत प्रदान किया जाता है. यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि एकल पीठ और खंडपीठ दोनों ही संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत समान अधिकार क्षेत्र का प्रयोग करते हैं.
हमारे विचार में, ‘इंट्रा-कोर्ट’ अपीलीय अधिकार क्षेत्र का प्रयोग केवल तभी उचित है, जब चुनौती दिया गया निर्णय या आदेश स्पष्ट रूप से त्रुटिपूर्ण हो या उसमें कोई विकृति हो. इस अधिकार क्षेत्र का प्रयोग केवल इसलिए नहीं किया जाना चाहिए कि तथ्यों के उसी समूह पर कोई अन्य दृष्टिकोण भी संभव है.
विशेष रूप से तब, जब एकल न्यायाधीश द्वारा अपनाया गया दृष्टिकोण तर्कसंगत और उचित हो. दूसरे शब्दों में, एक ‘इंट्रा-कोर्ट’ अपीलीय पीठ को अपना स्वयं का दृष्टिकोण केवल इसलिए नहीं थोपना चाहिए कि उसे अपना दृष्टिकोण, एकल पीठ द्वारा अपनाए गए दृष्टिकोण से बेहतर प्रतीत होता है, जब तक एकल पीठ द्वारा अपनाया गया दृष्टिकोण तर्कसंगत है, तब तक उसमें हस्तक्षेप से बचना चाहिए.
बिहार इंडस्ट्रियल एरिया डेवलपमेंट अथॉरिटी बनाम मेसर्स SCOPE सेल्स प्राइवेट लिमिटेड’ (रिपोर्टेड: 2026 INSC 89) मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दी गयी व्यवस्था
SPECIAL APPEAL No. – 353 of 2025; Smt. Deepika Tiwari V/s State of U.P. Thru.its Prin. Secy. Secondary Education Lko. and 3 others