Religious Conversion के प्रयास के मामले में 12वीं की छात्राओं के खिलाफ एफआईआर रद्द करने से इलाहाबाद हाई कोर्ट ने किया इनकार

जहां ठोस सबूत मौजूद हों, वहां किसी उभरती हुई सामाजिक समस्या Religious Conversion से निपटने के लिए बनाए गए कानून के तहत होने वाली कानूनी कार्रवाई को शुरुआती चरण में ही नहीं रोका जाना चाहिए. इस कमेंट के साथ इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस जेजे मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना की बेंच ने कक्षा 12 की छात्राओं के खिलाफ ‘उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन (Religious Conversion) प्रतिषेध अधिनियम, 2021’ की धारा 3 और 5(1) के तहत दर्ज एफआईआर को रद्द करने से इनकार कर दिया. कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री से पहली नजर में ऐसा मामला बनता है जिसकी जांच जरूरी है.
इलाहाबाद हाई कोर्ट के दो जजों की बेंच उन आपराधिक रिट याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा था जिनमें एक एफआईआर को रद्द करने की मांग की गई थी. इसमें आरोप लगाया गया था कि कक्षा 12 की एक छात्रा को उसके सहपाठियों ने बुर्का पहनने के लिए मजबूर किया और उसे दूसरा धर्म अपनाने (Religious Conversion) के लिए प्रलोभन दिया गया.
कोर्ट ने कहा कि 2021 का कानून “इस उभरती हुई बुराई Religious Conversion को रोकने के लिए लाया गया था, जिसके बारे में आजकल देश के अलग-अलग हिस्सों से सुनने को मिल रहा है और जिसका हमें न्यायिक संज्ञान लेना चाहिए.” बेंच ने कहा कि “अगर Religious Conversion जैसी उभरती हुई बुराई को रोकने के लिए बनाए गए कानून को उसके लागू होने के शुरुआती चरणों में ही रोक दिया जाए, तो इससे कानून कमज़ोर पड़ जाएगा और उसका उद्देश्य विफल हो जाएगा.
Religious Conversion जैसी उभरती बुराई को रोकने के लिए बनाए गए कानून को शुरुआती चरणों में ही रोक दिया जाए, तो इससे कानून कमज़ोर पड़ जाएगा
बेंच ने कहा कि इसका मतलब यह नहीं है कि किसी नए कानून के तहत झूठे मामलों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए, लेकिन साथ ही, जिस उद्देश्य के लिए यह कानून बनाया गया है, उसे ठोस सबूतों के आधार पर शुरू की गई कानूनी कार्रवाई को शुरुआती चरण में ही खत्म करके विफल नहीं किया जा सकता.

यह एफआईआर पीड़ित छात्रा (कक्षा 12 की छात्रा) के भाई ने दर्ज कराई थी. एफआईआर में आरोप लगाया गया था कि उसके कुछ सहपाठियों ने उसकी बहन को प्रभावित करने और उसे दूसरा धर्म अपनाने (Religious Conversion) के लिए मजबूर करने की कोशिश की थी. आरोप लगाया गया था कि आरोपी लड़कियाँ जो ट्यूशन में उसकी सहपाठी थीं ने उसे बहलाया-फुसलाया, बुर्का पहनने के लिए मजबूर किया और उसे धर्म परिवर्तन (Religious Conversion) के लिए राजी करने की कोशिश की.
याचिकाकर्ताओं ने दलील दी कि एफआईआर अस्पष्ट और सामान्य आरोपों पर आधारित थी, जिसमें तारीख, समय या किसी प्रत्यक्ष कृत्य के बारे में कोई विशिष्ट विवरण नहीं था. इसके अलावा यह भी तर्क दिया गया कि शिकायत दुर्भावनापूर्ण थी और गलत इरादे से दर्ज कराई गई थी विशेष रूप से, दोनों पक्षों के बीच किसी कथित पिछली घटना और निजी मनमुटाव को देखते हुए.
याचिकाकर्ताओं ने इस बात पर भी जोर दिया कि वे युवा छात्र हैं और आपराधिक कार्यवाही के लंबित होने से उनकी शिक्षा और मानसिक स्वास्थ्य में गंभीर बाधा आ रही है. अदालत ने केस डायरी की जाँच की, जिसमें ‘भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023’ की धारा 180 और 183 के तहत पीड़ित के दर्ज बयान भी शामिल थे और पाया कि आरोप न केवल अस्पष्ट थे बल्कि विशिष्ट दावों द्वारा समर्थित भी थे.
अदालत ने पाया कि पीड़ित ने कहा था कि उसे उसकी मर्जी के खिलाफ बुर्का पहनने के लिए मजबूर किया गया. आरोपी उसे एक रेस्टोरेंट ले गया और उसे बार-बार उनका धर्म अपनाने (Religious Conversion) के लिए कहा गया. यह भी कहा गया कि उसे अपने माता-पिता को बताने से रोका गया और उसके विश्वासों को प्रभावित करने के प्रयास किए गए.
बेंच ने सीसीटीवी फुटेज के रूप में सहायक सामग्री की मौजूदगी का भी संज्ञान लिया, जो प्रथम दृष्टया इस बात का समर्थन करती थी कि पीड़ित को नकाब पहनने के लिए मजबूर किया (Religious Conversion) गया था. दुर्भावनापूर्ण इरादे के तर्क को खारिज करते हुए बेंच ने कहा कि शिकायतकर्ता द्वारा कथित उत्पीड़न के याचिकाकर्ताओं के दावे को साबित करने के लिए पहले कोई शिकायत दर्ज नहीं की गई थी.
मजिस्ट्रेट के सामने दिए गए पीड़ित के बयान को हल्के में नहीं लिया जा सकता. कोर्ट ने जोर दिया कि क्या कथित कृत्य अंततः 2021 के अधिनियम के तहत “प्रलोभन” या “अनुचित प्रभाव” की श्रेणी में आएंगे. यह जाँच के दौरान और यदि आवश्यक हो तो मुकदमे के दौरान जाँच का विषय है और एफआईआर रद्द करने के चरण में इसका कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया जा सकता.
दोनों पक्षों के तर्कों को सुनने के बाद अदालत के सामने विचारणीय तथ्य यह था कि “क्या याचिकाकर्ताओं के कृत्य प्रलोभन या अनुचित प्रभाव की श्रेणी में आते हैं. बेंच ने माना कि यह ऐसा प्रश्न है जिसकी जाँच एफआईआर रद्द करने की याचिका में करना अभी जल्दबाजी होगी. बेंच ने दोनों रिट याचिकाओं को खारिज कर दिया जाय और याचिकाकर्ताओं में से एक को दी गई अंतरिम सुरक्षा हटा ली गई.
“हमें इस स्थिति के प्रति सचेत रहना चाहिए कि 2021 का यह कानून समाज में एक उभरती हुई स्थिति को रोकने के लिए बनाया गया था. इस स्थिति में कुछ लोग अपने धर्म का पालन या प्रचार करने के बजाय उसे दूसरों पर थोपते हैं. उनके मन में यह गलत धारणा बैठ जाती है कि जिस धर्म में वे विश्वास करते हैं, उसका पालन दूसरों को भी करना चाहिए. अगर युवाओं के बीच इस तरह का चलन देखने को मिलता है, तो यह और भी ज्यादा चिंताजनक है.”
जस्टिस जेजे मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना की बेंच ने की टिप्पणी
CRIMINAL MISC. WRIT PETITION No. – 3203 of 2026; Aleena @ Aleena Parveen & Anr. v. State of Uttar Pradesh & Ors.