छात्रा को जिंदा जलाना Heinous कृत्य, ऐसे मामलों में कोई यह दावा नहीं कर सकता कि उसने क्रूर और असामान्य तरीके से काम नहीं किया
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने आगरा में छात्रा को जलाकर मार डालने के आरोपी को नहीं दी राहत, ट्रायल कोर्ट के फैसले की पुष्टि

किसी छात्रा को जिंदा जलाना एक Heinous कृत्य है. ऐसे मामलों में कोई भी यह दावा नहीं कर सकता कि उसने क्रूर (Heinous) और असामान्य तरीके से काम नहीं किया. यह किसी व्यक्ति को जिंदा जलाने का मामला है और इसलिए यह न्यायालय का कर्तव्य है कि वह इस मामले से अत्यंत कठोर और सख्त तरीके से निपटे और कानून द्वारा निर्धारित अधिकतम दंड दे. इस कमेंट के साथ इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस सलिल कुमार राय और जस्टिस डॉ अजय कुमार II की बेंच ने छात्रा को जिंदा जलाने वाले आरोपितों को ट्रायल कोर्ट से सुनायी गयी सजा को सही ठहराया है.
फैसले में बेंच ने यह भी मेंशन किया कि राज्य सरकार दोषी के मामले पर सजा में छूट देने के लिए विचार करे. अपीलकर्ता अपनी गिरफ्तारी की तारीख से जेल में बंद है. 14.11.2025 के हिरासत प्रमाण पत्र के अनुसार अपीलकर्ता ने बिना किसी छूट के पहले ही 17 साल, 3 महीने और 15 दिन की सजा काट चुका है और हिरासत प्रमाण पत्र के अनुसार 14.11.2025 तक छूट सहित उसकी कुल सजा 19 साल 11 महीने और 27 दिन थी. इसलिए सजा में छूट का आदेश इस फैसले की कॉपी मिलने की तारीख से दो महीने के भीतर सजा में छूट की मौजूदा राज्य नीति के अनुसार पारित किया जाएगा.
छात्रा को जिंदा जला दिया जाना Heinous Act
बेंच ने अपने फैसले में यह भी कहा है कि विचारण न्यायालय ने धारा 302 IPC के तहत आरोप तय नहीं किया, जिसे कानूनी रूप से तय किया जा सकता था. लेकिन यह मामला ऐसा है जिसमें एक नाबालिग स्कूली छात्रा को अपीलकर्ता द्वारा जिंदा जला दिया गया (Heinous Act) है, इसलिए ट्रायल कोर्ट ने धारा 304 भाग-I के तहत निर्धारित अधिकतम दंड, यानी अपीलकर्ता को आजीवन कारावास सही रूप से दिया है और अपीलकर्ता को दी गई सजा में हस्तक्षेप करने का कोई आधार नहीं बनता है.
यह आपराधिक अपील दोषी अभियुक्त आशिक की ओर से दाखिल की गयी थी. याचिका अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, न्यायालय संख्या 5, आगरा द्वारा सत्र विचारण संख्या 1474/2008 (राज्य बनाम आशिक और अन्य) में 30.03.2013 को पारित निर्णय और आदेश के विरुद्ध निर्देशित थी. यह मामला केस क्राइम नंबर 290/2008 से उत्पन्न हुआ जो धारा 304/34, 326/34 IPC के तहत पुलिस थाना रकाबगंज, जिला आगरा में दर्ज किया गया था.
इस निर्णय के तहत अपीलकर्ता को धारा 304 IPC (धारा 34 IPC के साथ पठित) के अंतर्गत Heinous Act का दोषी ठहराया गया है और आजीवन कारावास के साथ 20,000 रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई गई है.
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रिकॉर्ड पर उपलब्ध तथ्यों के अनुसार प्रदीप नामक व्यक्ति ने 21.07.2008 को थाना रकाबगंज जिला आगरा में एक लिखित तहरीर दी. तहरीर में दी गयी जानकारी के अनुसार प्रदीप की बेटी एंग्लो बंगाली स्कूल में कक्षा 9 की छात्रा थी. मेले के दौरान, उसकी बेटी की सहेली के भाई आशिक उर्फ आशीष (राज कुमार का पुत्र) ने अपने दोस्त अमित के साथ मिलकर बेटी की तस्वीरें खींच ली थीं.
आशिक और अमित दोनों ही उसकी बेटी को वे तस्वीरें दिखाकर ब्लैकमेल किया करते थे. अमित उससे पैसे की मांग भी करता था और उसे अपने पास बुलाता था. किशोर और सेठी भी उनके साथ इस काम में शामिल थे.

20.07.2008 की शाम को आशिक अपने दोस्त अमित के साथ मुखबिर के घर की छत पर आया और उसने छात्रा पर केरोसिन तेल (Heinous Act) डाल दिया और अमित ने उसे आग लगा दी. इसके बाद वे दोनों मौके से फरार हो गए. उस समय छात्रा घर में अकेली थी. यह पूरी घटना पिता को उसकी बेटी ने ही सुनाई थी. उसे तत्काल आपातकालीन वार्ड में भर्ती कराया गया.
डॉक्टरों के अनुसार वह 90% तक जल चुकी थी. उसी दिन रात 10:30 बजे पीड़िता का मृत्यु-पूर्व बयान दर्ज किया गया. संयोग से उसे बचाया नहीं जा सका और उसकी मौत हो गयी. लिखित रिपोर्ट के आधार पर पुलिस ने केस दर्ज किया और विवेचना के बाद चार्जशीट कोर्ट में पेश कर दी.
मजिस्ट्रेट ने 23.10.2008 को अपराधों का संज्ञान लिया और मामले को सत्र न्यायालय को सौंप दिया, क्योंकि Heinous Act आरोपित अपराधों की सुनवाई सत्र न्यायालय द्वारा ही की जा सकती थी. दोनों पक्षों को सुनने के बाद, आरोपियों के खिलाफ IPC की धारा 304/34 (Heinous Act) और 326/34 के तहत आरोप तय किए गए. अपीलकर्ता पर भारतीय दंड संहिता की धारा 304/34 के तहत आरोप लगाया गया था और उसे इसी धारा के तहत दोषी ठहराया गया है.
सुनवाई के दौरान बेंच ने पाया कि अभियोजन पक्ष ने सफलतापूर्वक यह साबित कर दिया कि अपीलकर्ता का मृतका के शरीर पर किरासिन तेल डालना Heinous Act था और उसके बाद मृतका जल गई थी. अपीलकर्ता पीड़िता का पड़ोसी था. पीड़िता को जलने से इतनी गंभीर चोटें आईं कि घटना के 12 घंटे के भीतर ही उसकी मृत्यु हो गई.
इसलिए, यह स्पष्ट है कि मृतका को जलने से हुई चोटें अपीलकर्ता द्वारा इस इरादे से पहुंचाई गई थीं कि ऐसी शारीरिक चोटें पहुंचाई जाएं जिनसे Heinous मृत्यु होने की संभावना हो. इसे देखते हुए ट्रायल कोर्ट के निर्णय में हस्तक्षेप करने का कोई उचित आधार नहीं बनता है. बेंच ने अपर सत्र न्यायाधीश कोर्ट संख्या 5 आगरा द्वारा पारित निर्णय और सजा की ‘पुष्टि’ कर दी है.