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Alternative legal remedie मौजूद तो संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत रिट याचिका पर फैसला सुनना उचित नहीं

इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच ने खारिज की मे. नीलकंठ प्रा. लि. की याचिका, नोटिस का जवाब देने पर फैसला लें

Alternative legal remedie मौजूद तो संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत रिट याचिका पर फैसला सुनना उचित नहीं
Shekher–B-Saraf J.

Alternative legal remedie की मौजूदगी अनुच्छेद 226 के तहत रिट अधिकार क्षेत्र पर पूरी तरह रोक नहीं लगाती है. लेकिन, यह देखना भी जरूरी है कि याचिका दाखिल करने वाले के पास Alternative legal remedie मौजूद है या नहीं. Alternative legal remedie मौजूद होने की दशा में अनुच्छेद 226 के तहत रिट याचिका पर सीधे आदेश देना उचित नहीं होगा. इसके साथ इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच के जस्टिस शेखर बी सर्राफ और जस्टिस अबधेश कुमार की बेंच ने मे. नीलकंठ एंटरपेन्योर्स प्रा. लि. के डायरेक्टर की तरफ से दाखिल याचिका को खारिज कर दिया है.

Alternative legal remedie मौजूद होने के बाद भी मेसर्स नीलकंठ एंटरप्रेन्योर्स प्राइवेट लिमिटेड के डायरेक्टर की तरफ से इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच में डिप्टी कमिश्नर, राज्य कर द्वारा जारी 09.07.2026 के ‘कारण बताओ नोटिस’ को रद्द करने और यह घोषणा करने कि सेंट्रल गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स एक्ट, 2017 की धारा 16(2)(c) और उत्तर प्रदेश गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स एक्ट, 2017 की संबंधित धारा 16(2)(c) भारत के संविधान के अनुच्छेद 14, 19(1)(g) और 300A के खिलाफ हैं, की मांग के साथ दाखिल की गयी थी.

याचिकाकर्ता एक प्राइवेट लिमिटेड कंपनी है, जो गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स एक्ट के तहत पंजीकृत है और SAC नंबर 9954 के तहत वर्क्स-कॉन्ट्रैक्ट सेवाएं (जैसे सामान्य निर्माण, भवन निर्माण, सिविल इंजीनियरिंग, विशेष ट्रेड (प्लंबिंग, इलेक्ट्रिकल इंस्टॉलेशन), और आवासीय, व्यावसायिक और औद्योगिक संपत्तियों के लिए पूर्णता या मरम्मत सेवाएं आदि) प्रदान करने का काम करती है. याचिकाकर्ता का दावा है कि वह बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र राज्यों में NCC लिमिटेड के लिए बड़े पैमाने पर सब-कॉन्ट्रैक्ट के काम पूरे करने में लगी हुई है.

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इन कामों में बिहार के डेहरी में ओल्ड एनीकट (बैराज) सिंचाई परियोजना के लिए खुदाई और डायाफ्राम-वॉल का निर्माण; झारखंड और उत्तर प्रदेश में कई जगहों पर ‘रिवैम्प्ड डिस्ट्रीब्यूशन सेक्टर स्कीम’ के तहत डिस्ट्रीब्यूशन इंफ्रास्ट्रक्चर का विकास; नॉर्थ बिहार पावर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी लिमिटेड और महाराष्ट्र में MSEDCL के लिए एडवांस्ड मीटरिंग इंफ्रास्ट्रक्चर/स्मार्ट प्रीपेड मीटर लगाना; और उत्तर प्रदेश में ‘स्टेट वॉटर एंड सैनिटेशन मिशन’ के तहत ग्रामीण सिविल और जलापूर्ति के काम शामिल हैं.

18 पंजीकृत उप-ठेकेदारों को उप-अनुबंध पर दिया, जो GST विभाग के साथ legal registered थे

वित्तीय वर्ष 2025-26 के लिए, उन्होंने उपरोक्त कार्यों के कुछ हिस्सों को ‘बैक-टू-बैक’ आधार पर 18 पंजीकृत उप-ठेकेदारों को उप-अनुबंध पर दिया, जो GST विभाग के साथ legal registered थे. याचिकाकर्ता का कहना है कि भले ही वे GST नियमों का पालन करते हैं, फिर भी सेंट्रल गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स एक्ट, 2017 की धारा 74A (1) के तहत जारी शो-कॉज नोटिस में याचिकाकर्ता द्वारा लिए गए इनपुट टैक्स क्रेडिट को नामंजूर करने के साथ ही टैक्स, ब्याज और पेनल्टी लगाने का प्रस्ताव दिया है.

नोटिस में मुख्य आरोप यह था कि जिन फर्मों को ऊपर बताए गए काम सब-कॉन्ट्रैक्ट किए गए थे, वे बोगस और अस्तित्वहीन लग रही थीं और याचिकाकर्ता ने गलत तरीके से इनपुट टैक्स क्रेडिट का लाभ उठाया था. याचिकाकर्ता ने उक्त शो-कॉज नोटिस का कोई legal जवाब दाखिल नहीं किया और वे इस कोर्ट के असाधारण रिट अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करते हुए सीधे कोर्ट आ गए. याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि याचिका में मांगी गई दूसरी राहत, जो CGST एक्ट, 2017 की धारा 16(2)(c) को संविधान के खिलाफ घोषित करने से जुड़ी है, उस पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आ चुका है.

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‘भंडारी स्क्रैप ट्रेडर्स बनाम यूनियन ऑफ इंडिया और अन्य’ (2026 SCC OnLine SC 1570) मामले में दायर स्पेशल लीव पिटीशन को सुप्रीम कोर्ट ने 24 जुलाई 2026 के आदेश से खारिज कर दिया था, जिससे ‘मारुति एंटरप्राइजेज बनाम यूनियन ऑफ इंडिया और अन्य’ मामले में गुजरात हाई कोर्ट का फैसला सही ठहराया गया. इस कोर्ट का मानना है कि यह फैसला CGST एक्ट, 2017 की धारा 16(2)(c) की संवैधानिक legal वैधता की पुष्टि करता है.

इसमें कहा गया है कि इनपुट टैक्स क्रेडिट तभी मिलता है जब सप्लायर ने सरकार को संबंधित GST का भुगतान किया हो. कोर्ट ने इस legal condition को कमजोर करने या इसका दायरा सीमित करने से इनकार कर दिया और दोहराया कि I.T.C. एक सशर्त legal remedie है न कि कोई पक्का या निहित अधिकार. वकील ने स्पष्ट कहा कि वह दूसरी राहत के लिए जोर नहीं देना चाहते.

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Abdhesh-Kumar-Chaudhary J.

याचिकाकर्ता के वकील ने कई आधारों पर कारण बताओ नोटिस के legal होने पर पर सवाल उठाये. कहा कि शो कॉज नोटिस जारी करने में अधिकार-क्षेत्र से जुड़ी गलती हुई है, जिससे legal नोटिस की वैधता ही खत्म हो जाती है. तर्क दिया कि पूरा टैक्स हिस्सा असली इनपुट टैक्स क्रेडिट से जुड़ा है, जो रजिस्टर्ड सेलिंग डीलरों से मिली असल इनवर्ड सप्लाई से पैदा हुआ है. ये डीलर उस समय रजिस्टर्ड थे और उन्होंने अपनी GST रिटर्न में सप्लाई से जुड़ा टैक्स दिखाया था जो याचिकाकर्ता के GSTR-2A में भी दिख रहा था.

वकील के अनुसार चूंकि टैक्स का सही तरीके से भुगतान किया गया था इसलिए याचिकाकर्ता ने सही ढंग से इनपुट क्रेडिट का लाभ उठाया. उनका कहना था कि GST एक्ट की धारा 16(2)(c) के तहत बताई गई शर्तों का ठीक से पालन किया गया है और इसलिए कारण बताओ नोटिस जारी करने का कोई आधार नहीं था. उन्होंने यह तर्क भी दिया कि कारण बताओ नोटिस GST की धारा 61 और उसके तहत बने नियमों के नियम 99(1) में दिए गए कानूनी (legal) तरीके को पूरी तरह नजरअंदाज करके जारी किया गया है.

वकील ने कोर्ट का ध्यान GST नियमों के नियम 99(1) की ओर दिलाया और कहा कि ये नियम रिटर्न की जांच के दौरान पाई गई विसंगतियों से निपटने के लिए एक पूरी legal proceeding प्रदान करते हैं. उनके अनुसार प्रतिवादी ने न तो धारा 61 या नियम 99 के तहत जरूरी कदमों का पालन किया और न ही याचिकाकर्ता को शुरुआत में ही विसंगति के बारे में स्पष्टीकरण देने का मौका दिया, बल्कि सीधे GST एक्ट की धारा 74A के तहत विवादित नोटिस जारी कर दिया.

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एडिशनल चीफ स्टैंडिंग काउंसिल ने कहा कि यह मामला अभी ‘कारण बताओ नोटिस’ के चरण में है. कहा कि कारण बताओ नोटिस को चुनौती देने के लिए इस कोर्ट के सामने जो आधार और तथ्य रखे गए हैं, उन्हें नोटिस के जवाब में भी आसानी से उठाया जा सकता है. विभाग को याचिकाकर्ता की ऐसी आपत्तियों पर निर्णय लेने का अनुभव और जरूरी अधिकार क्षेत्र प्राप्त है. कहा कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत कारण बताओ नोटिस जारी होने के चरण में इस कोर्ट का हस्तक्षेप बहुत सीमित है और याचिकाकर्ता ऐसा कोई legal आधार नहीं बता पाया है जिसके लिए हस्तक्षेप किया जाए.

एडिशनल चीफ स्टैंडिंग काउंसिल ने कहा कि उन सभी मामलों में इस बात पर कोई विवाद नहीं था कि मामले को जांच-पड़ताल के लिए चुना गया था या नहीं, क्योंकि हर मामले में विभाग ने स्वीकार किया था कि रिटर्न को जांच-पड़ताल के लिए लिया गया था. इसी संदर्भ में न्यायालयों ने माना था कि धारा 61 और नियम 99 का अनिवार्य रूप से पालन किया जाना चाहिए. वर्तमान मामले में किसी जांच-पड़ताल की आवश्यकता नहीं थी और विभाग ने रिटर्न की जांच के आधार पर कारण बताओ नोटिस जारी करने का निर्णय लिया, जो legal वर्जित नहीं है.

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उन्होंने विशेष रूप से इस कोर्ट की एक समान स्तर की बेंच के फैसले का हवाला दिया, जो Nagarjuna Agro Chemicals (P) Ltd. v. State of U.P. मामले में था और 2023 SCC OnLine All 5339 में रिपोर्ट किया गया है. आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच का फ़सला, जो ‘देवी ट्रेडर्स बनाम आंध्र प्रदेश राज्य’ (2023 SCC Online AP 1886) मामले में दिया गया था; यह तर्क देने के लिए कि GST एक्ट की धारा 74 के तहत कारण बताओ नोटिस जारी करने के लिए धारा 61 का नोटिस जारी करना अनिवार्य नहीं था.

दोनों पक्षों के तर्कों को सुनने के बाद कोर्ट ने विचार के लिए तीन बिन्दु तय किये:

  • (i) क्या विवादित ‘कारण बताओ नोटिस’, GST एक्ट की धारा 61 और उसके तहत बने नियमों के नियम 99 का पालन न करने के कारण अमान्य है
  • (ii) क्या विवादित नोटिस में GST एक्ट की धारा 74A(5)(ii) का इस्तेमाल अधिकार-क्षेत्र से बाहर जाकर किया गया है
  • (iii) क्या मौजूदा मामले के तथ्यों को देखते हुए, इस कोर्ट को भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत अपनी असाधारण रिट अधिकार-क्षेत्र का इस्तेमाल करके विवादित ‘कारण बताओ नोटिस’ को शुरुआती चरण में ही रोकना चाहिए.

कोर्ट ने सभी मुद्दों पर मौजूद नियमों पर ​विस्तृत ब्यौरा देते हुए कहा कि इन तीनों बिन्दुओं पर याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश किये गये तर्क नहीं टिकते हैं. बेंच ने कहा कि इसमें कोई शक नहीं कि संवैधानिक अदालतों ने बार-बार यह कहा है कि किसी वैकल्पिक कानूनी उपाय की मौजूदगी अनुच्छेद 226 के तहत रिट अधिकार क्षेत्र पर पूरी तरह रोक नहीं लगाती है.

यहां यह भी महत्वपूर्ण है कि नोटिस पाने वाले/याचिकाकर्ता के पास वे सभी आपत्तियां मौजूद हैं – जिनमें इस कोर्ट के सामने उठाए गए आधार भी शामिल हैं, जैसे कि सब-कॉन्ट्रैक्टर की असलियत, काम का असल में पूरा होना, बैंकिंग चैनल से पेमेंट, GSTR-2A में ट्रांज़ैक्शन का दिखना, फिजिकल वेरिफिकेशन में कोई गड़बड़ी न मिलना, और ‘सनक्राफ्ट एनर्जी’ मामले के नियम का लागू होना या न होना- जिन्हें वे ‘शो कॉज नोटिस’ के जवाब में एडजुडिकेटिंग अथॉरिटी के सामने उठा सकते हैं और जिन पर अथॉरिटी विचार कर सकती है. इसके साथ कोर्ट ने एड किया कि मौजूदा रिट याचिका में कोई दम नहीं है.

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बेंच ने फैसले में कोट कराया कि याचिकाकर्ता को विवादित कारण बताओ नोटिस का विस्तृत जवाब दाखिल करने से नहीं रोका जाएगा. वे चार सप्ताह के भीतर अपने सभी तथ्यात्मक और Legal argument पेश कर सकेंगे. यदि ऐसा जवाब दाखिल किया जाता है, तो निर्णय लेने वाला प्राधिकरण कानून के अनुसार उसके गुण-दोष के आधार पर विचार करेगा.

WRIT TAX No. – 1024 of 2026; M/S Neelkanth Entrepreneurs Private Limited Thru. Its Director V/s State Of U.P. Thru. Prin. Secy. Deptt. Of State Tax U.P. Lko. And Another

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