कोर्ट में नहीं टिक पायी अभियोजन की कहानी, 44 साल पुराने Robbery मामले में सबूतों के अभाव के चलते दो आरोपी दोषमुक्त

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने वर्ष 1978 के एक बहुचर्चित Robbery मामले में 44 वर्षों की लंबी कानूनी लड़ाई के बाद एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है. जस्टिस लक्ष्मी कांत शुक्ला की एकल पीठ ने मामले की विस्तृत सुनवाई के बाद Robbery के दो जीवित अभियुक्तों जसवंत और चंद्रपाल को साक्ष्यों के अभाव और अभियोजन पक्ष की गंभीर खामियों का लाभ देते हुए दोषमुक्त कर दिया है. कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि पुलिस और अभियोजन पक्ष घटना स्थल से जब्ती, कथित बरामदगी और गवाहों के बयानों में मौजूद गंभीर विरोधाभासों को सिद्ध करने में पूरी तरह नाकाम रहे हैं.
घटना उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले के थाना राया क्षेत्र स्थित दूधाधारी (मौजा दीवान कलां) गांव की है. 5 मार्च 1978 की आधी रात को दर्ज कराई गई प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) के अनुसार, 4 और 5 मार्च 1978 की मध्य रात्रि को लगभग 10:15 बजे गांव के अधिकांश पुरुष सदस्य लाल सिंह के बेटे की बारात में गए हुए थे. गांव में केवल कुछ ही लोग मौजूद थे, जो राम सिंह (शिकायतकर्ता) के घर के बाहर अलाव (होली/अलाव की आग) सेंक रहे थे.
इसी दौरान 13 से 14 हथियाराबंद डकैतों (Robbery) ने गांव पर धावा बोल दिया. डकैतों (Robbery)ने सबसे पहले लाल सिंह के घर पर लूटपाट की. महिलाओं द्वारा शोर मचाने पर बदमाशों ने हवाई फायरिंग की और घरों से सोने-चांदी के आभूषण व नकदी लूट ली. इसके बाद डकैतों ने राम सिंह और रोशन लाल के घरों को निशाना बनाया. घटना के समय गवाहों ने पास की रामदास की नौहरा की दीवार के पीछे छिपकर बदमाशों को देखने का दावा किया था. ग्रामीणों ने दावा किया था कि उन्होंने स्थानीय ग्रामीणों और आसपास के क्षेत्रों के पहचान वाले व्यक्तियों को डकैती (Robbery) करते हुए पहचान लिया था.
अभियोजन पक्ष की कहानी के अनुसार, जब डकैत (Robbery) लूटपाट की घटना को अंजाम देकर गांव से बाहर निकल रहे थे, तभी सामने से आ रही पुलिस टीम ने उन्हें चुनौती दी. दोनों ओर से हुई गोलीबारी में दो डकैत (Robbery) मौके पर ही घायल हो गए और बाद में उनकी मौत हो गई. पुलिस का दावा था कि मौके से सात आरोपियों को गिरफ्तार किया गया था और उनके कब्जे से लूटे गए सामान तथा अवैध हथियार बरामद किए गए थे.
निचली अदालत ने 28 जनवरी 1982 को दिए अपने फैसले में Robbery के सभी सात आरोपियों को दोषी ठहराया था. अदालत ने आरोपी चंद्रपाल को धारा 395/397 आईपीसी के तहत 8 वर्ष का कठोर कारावास और जसवंत को धारा 395 आईपीसी के तहत 7 वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी.
निचली अदालत के फैसले से क्षुब्ध होकर सभी सातों अभियुक्तों ने वर्ष 1982 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय में अपील दायर की. कोर्ट में अपील लंबित रहने के लंबे दौर के दौरान सात में से पांच अभियुक्तों केशव देव, रेशम सिंह, ऊदल, बच्चन और रामचरण की मृत्यु हो गई. इसके चलते उनके खिलाफ अपील की कार्यवाही को अदालत द्वारा पहले ही समाप्त घोषित कर दिया गया था. वर्तमान में यह अपील केवल आरोपी जसवंत और चंद्रपाल के संबंध में ही विचारधीन थी.
हाई कोर्ट ने अभिलेखों का सूक्ष्मता से विश्लेषण करने के बाद पाया कि पुलिस द्वारा Robbery की पेश की गई पूरी कहानी विरोधाभासों और संदेहास्पद साक्ष्यों से भरी हुई है. अदालत ने अपने निर्णय में निम्नलिखित मुख्य खामियों को रेखांकित किया:
Robbery में लूटे गए सामान और बरामदगी में भारी अंतर: शिकायत के अनुसार गांव के तीन घरों से लगभग 52 सोने की वस्तुएं (लगभग 425 ग्राम), 72 चांदी के सामान (2 किलो से अधिक) और 6,000 रुपये नकद Robbery में लूटे गए थे. लेकिन पुलिस द्वारा तथाकथित रूप से मौके पर गिरफ्तार Robbery के सातों आरोपियों से केवल 5 सोने की अंगूठियां और 300 रुपये की बरामदगी दिखाई गई. हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि जब आरोपी मौके पर ही पकड़े गए थे, तो भारी मात्रा में लूटा गया बाकी सामान कहां गायब हो गया, इसका कोई संतोषजनक स्पष्टीकरण अभियोजन नहीं दे सका.
बरामदगी मेमो पर हस्ताक्षरों का न होना: मामले की जांच करने वाले पुलिस अधिकारी ने जिरह में स्वीकार किया कि कथित जब्ती और बरामदगी के समय आरोपियों के हस्ताक्षर बरामदगी मेमो पर नहीं लिए गए थे और न ही उन्हें इसकी कोई प्रति सौंपी गई थी.
एफआईआर के समय पर सवाल : अदालत ने पाया कि गवाहों के बयानों में पुलिस स्टेशन जाने और Robbery की एफआईआर दर्ज कराने के समय को लेकर गंभीर अंतर था. साक्ष्यों से यह प्रतीत होता है कि एफआईआर वास्तव में एंटी-टाइम (घटना के बाद सोच-समझकर देर से) लिखी गई थी, जिससे अभियोजन की पूरी नींव हिल जाती है.
अन्य मामलों में पहले ही हो चुके थे बरी: बचाव पक्ष ने अदालत के समक्ष यह साक्ष्य भी प्रस्तुत किया कि इसी घटना के संबंध में आरोपियों के खिलाफ आर्म्स एक्ट और पुलिस पर हमले (धारा 307 आईपीसी) के तहत दर्ज केस में उन्हें वर्ष 1979 में ही सत्र अदालत द्वारा दोषमुक्त किया जा चुका था.
जस्टिस लक्ष्मी कांत शुक्ला ने अपने आदेश में लिखा कि अभियोजन पक्ष आरोपियों के खिलाफ Robbery अपराध को संदेह से परे साबित करने में पूरी तरह विफल रहा है. मात्र तकनीकी खामियां नहीं, बल्कि साक्ष्यों की यह कमियां मामले की जड़ पर प्रहार करती हैं. कोर्ट ने दोनों जीवित अभियुक्तों को “संदेह का लाभ” देते हुए निचली अदालत के 1982 के सजा के आदेश को निरस्त कर दिया और उन्हें सभी आरोपों से बरी कर दिया. धारा 437-ए सीआरपीसी के प्रावधानों के तहत उन्हें 50,000 रुपये का व्यक्तिगत बंधपत्र और जमानतदार प्रस्तुत करने का निर्देश दिया गया है.