Supreme Court से SLP बिना किसी विस्तृत कारण के खारिज कर दी जाती है, तो वहां ‘विलीनकरण का सिद्धांत’ लागू नहीं होता
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने सीजनल संग्रह अमीन की सेवा और पेंशन लाभ विवाद पर सुनाया फैसला, राज्य की अपील खारिज

इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने कहा है कि Supreme Court द्वारा विशेष अनुमति याचिका (SLP) को बिना किसी विस्तृत कारण के खारिज कर दिए जाने के बाद, उच्च न्यायालय के स्तर पर समीक्षा याचिका पूरी तरह से सुनवाई योग्य बनी रहती है, बशर्ते विधिक सिद्धांतों और पूर्व पीठकों के दायरे का उचित पालन किया जाए. जस्टिस राजेश सिंह चौहान और जस्टिस श्रीप्रकाश सिंह की बेंच ने यह फैसला और आदेश सिविल मिसलेनियस रिव्यू एप्लीकेशन संख्या 11 ऑफ 2026 (राज्य सरकार बनाम यमुना प्रसाद गुप्ता) पर सुनवाई के बाद सुनाया है.
यह पूरा कानूनी विवाद यमुना प्रसाद गुप्ता (विपक्षी/मूल याचिकाकर्ता) की सेवाओं से जुड़ा हुआ है. विपक्षी को 5 जून 1986 को सीजनल संग्रह अमीन के रूप में नियुक्त किया गया था. लंबी सेवा के उपरांत, 16 जनवरी 2013 को उनकी सेवाओं को नियमित किया गया और वर्ष 2016 में वे अपनी सेवा पूरी कर सेवानिवृत्त हो गए. सेवानिवृत्ति के पश्चात, उन्होंने अपनी प्रारंभिक सेवाओं को पेंशनरी लाभ और अन्य सेवानिवृत्तिक स्वत्वों के लिए जोड़े जाने की मांग को लेकर उत्तर प्रदेश राज्य लोक सेवा अधिकरण लखनऊ के समक्ष क्लेम याचिका संख्या 1026 ऑफ 2018 दाखिल की थी.
अधिकरण ने 13 जून 2017 के आदेश को निरस्त करते हुए 12 अक्टूबर 2020 को आदेश पारित किया कि याची प्रताप नारायण पाण्डेय (रिट याचिका संख्या 4031 (एस/एस) 2001) के मामले में पारित निर्णय के आधार पर 5 जून 1986 से नियमित संग्रह अमीन मानते हुए पेंशनरी लाभों के हकदार हैं.
राज्य सरकार ने इस आदेश के खिलाफ रिट ए संख्या 5482 ऑफ 2022 दायर की, जिसे खंडपीठ ने 30 अगस्त 2022 को खारिज कर दिया था. इसके बाद राज्य सरकार ने Supreme Court में एसएलपी (सिविल) संख्या 29497 ऑफ 2023 दाखिल की, जिसे Supreme Court ने 14 अगस्त 2023 को खारिज कर दिया था.
Supreme Court से एसएलपी खारिज होने के पश्चात, राज्य सरकार के राजस्व विभाग ने उच्च न्यायालय में वर्तमान समीक्षा याचिका (CMRA No. 11 of 2026) दायर की. समीक्षा याचिका में राज्य की ओर से तर्क दिया गया कि न्यायालय ने ‘वैलिडेशन एक्ट, 2021’ के प्रावधानों पर विचार नहीं किया था.
इस अधिनियम के तहत यह प्रावधान है कि यदि प्रारंभिक सेवाएं नियमों के अनुसार नहीं थीं, तो उन्हें पेंशनरी लाभों की गणना के लिए नहीं जोड़ा जाएगा. इसके अलावा, यह भी हवाला दिया गया कि सिविल मिसलेनीयस रिव्यू एप्लीकेशन संख्या 121 ऑफ 2022 और अन्य संबद्ध मामलों में यह तय किया जा चुका है कि सीजनल संग्रह अमीनों की सेवाएं पेंशन के लिए नहीं जोड़ी जा सकतीं.
Supreme Court द्वारा एसएलपी खारिज किए जाने के बाद हाई कोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान मुख्य रूप से दो प्रमुख बिंदुओं पर विचार किया:
प्रथम बिंदु: क्या Supreme Court द्वारा एसएलपी खारिज किए जाने के बाद समीक्षा याचिका विचारणीय (Maintainable) है?
द्वितीय बिंदु: क्या Supreme Court द्वारा एसएलपी में खुला छोड़ा गया कानून का प्रश्न वर्तमान पक्षों के बीच लागू होगा या अन्य मामलों पर?

कुन्हामम्मद (Kunhayammed and Others vs State of Kerala) और खोदय डिस्टिलरीज लिमिटेड (Khoday Distilleries Limited) के ऐतिहासिक मामलों में Supreme Court द्वारा प्रतिपादित सिद्धांतों का हवाला देते हुए खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि यदि कोई एसएलपी बिना किसी विस्तृत कारण के खारिज कर दी जाती है, तो वहां ‘विलीनकरण का सिद्धांत’ लागू नहीं होता. निचली अदालत का आदेश ही प्रभावी रहता है और उच्च न्यायालय में समीक्षा याचिका दायर करने का अधिकार सुरक्षित रहता है.
हालांकि, अदालत ने गुण-दोष (Merits) के आधार पर पाया कि समीक्षा याचिकाकर्ताओं ने अधिकरण के समक्ष या मूल रिट याचिका के समय ‘वैलिडेशन एक्ट, 2021’ का कोई आपत्तिजनक तर्क प्रस्तुत नहीं किया था. इसके अलावा, विभाग द्वारा समान परिस्थिति वाले अन्य कर्मचारियों (जैसे प्रताप नारायण पाण्डेय) को पहले ही इसका लाभ दिया जा चुका है और इस विशिष्ट मामले में भी विभाग ने आदेश का पालन करते हुए लाभ प्रदान कर दिया है.
- इलाहाबाद उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने अपने फैसले में निम्नलिखित बिंदुओं पर स्थिति स्पष्ट की:
- समीक्षा की ग्राह्यता: यह समीक्षा याचिका तकनीकी रूप से सुनवाई योग्य (Maintainable) पाई गई, क्योंकि Supreme Court द्वारा एसएलपी बिना कारणों के खारिज किए जाने पर डॉक्ट्रिन ऑफ मर्जर लागू नहीं होता.
- पक्षकारों पर प्रयोज्यता: वर्तमान विशेष प्रकरण और तथ्यों को देखते हुए, कानून का खुला छोड़ा गया प्रश्न वर्तमान पक्षकारों के बीच इस मुकदमे में दोबारा नहीं खोला जा सकता, हालांकि यह भविष्य के अन्य मामलों या अन्य पक्षों के लिए खुला रहेगा.
इन तमाम विधिक बिंदुओं और तर्कों के आधार पर, न्यायालय ने राज्य सरकार की इस समीक्षा याचिका को खारिज कर दिया. यह निर्णय उन तमाम सीजनल कर्मचारियों के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल है जो अपनी प्रारंभिक सेवाओं की गणना और पेंशनरी लाभों की कानूनी वैधता के लिए संघर्ष कर रहे हैं. कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला न्यायिक अनुशासन और वैधानिक स्पष्टता के बीच एक संतुलन स्थापित करता है.