+91-9839333301

legalbulletin@legalbulletin.in

| Register

केवल मुकदमे के Final stage में होना या रक्षा साक्ष्य जुटाना जमानत का स्वतः आधार नहीं, 1 साल से जेल में बंद आरोपी को राहत नहीं

केवल मुकदमे के Final stage में होना या रक्षा साक्ष्य जुटाना जमानत का स्वतः आधार नहीं, 1 साल से जेल में बंद आरोपी को राहत नहीं

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि मुकदमा Final stage पर होने के आधार पर आरोपी को जमानत नहीं दी जा सकती. जमानत याचिका इसलिए भी मंजूर नहीं की जा सकती कि अभियोजन पक्ष की गवाही समाप्त हो रही है या आरोपी को अपना बचाव पक्ष तैयार करने के लिए जेल से बाहर आने की आवश्यकता है. जस्टिस अनिल कुमार-X की एकल पीठ ने संजय त्रिपाठी उर्फ संजय कुमार त्रिपाठी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य (Criminal Appeal No. 3764 of 2026) के मामले में फैसला सुनाते हुए आरोपी की दूसरी जमानत याचिका खारिज कर दी.

अदालत ने माना कि निष्पक्ष सुनवाई के लिए Final stage पर बचाव साक्ष्य जुटाने का अधिकार अत्यंत महत्वपूर्ण है, लेकिन यह जमानत पाने का कोई निरपेक्ष या अचूक आधार नहीं बन सकता. यह मामला कानपुर नगर के थाना हनुमंत विहार से संबंधित केस अपराध संख्या 168/2025 का है. आरोपी संजय त्रिपाठी के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धाराओं—329(3), 329(4), 352, 351(3), 308(2), 61(2), 318(4), 338, 336(3), 340(2) तथा अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम (SC/ST Act) की धाराओं के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई थी.

इसे भी पढ़ें…Fake Birth Certificate से POCSO Act के केस में फंस रहे 19-20 साल के लड़के, प्रवेश के समय उम्र सही दर्ज कराने की व्यवस्था करें

आरोपी पर शिकायतकर्ता की संपत्ति से संबंधित वसीयत और अन्य दस्तावेजों के फर्जीवाड़े  तथा अवैध कब्जे का आरोप है. इससे पूर्व, सत्र न्यायालय द्वारा जमानत याचिका खारिज किए जाने के बाद आरोपी ने उच्च न्यायालय का रुख किया था. हालांकि, 12 नवंबर 2025 को उच्च न्यायालय ने उसकी पहली जमानत याचिका को खारिज कर दिया था. इसके बाद आरोपी ने धारा 14-A(2) SC/ST एक्ट के तहत द्वितीय जमानत के लिए अपील दायर की.

आरोपी के अधिवक्ताओं ने तर्क दिया कि आरोपी आरोपी लगभग एक वर्ष से जेल में निरुद्ध है. अभियोजन पक्ष के सभी तथ्य-साक्षी परीक्षित किए जा चुके हैं. अब मुकदमा आरोपी के बयान (BNSS धारा 351 / CrPC धारा 313) और बचाव साक्ष्य के स्तर (Final stage) पर है. उन्होंने तर्क दिया कि जेल में बंद रहने के कारण आरोपी अपने बचाव Final stage पर सर्वोत्तम साक्ष्य एकत्र करने और उन्हें अदालत के समक्ष पेश करने में असमर्थ है, जिससे उसके निष्पक्ष सुनवाई के संवैधानिक अधिकार का हनन हो रहा है.

इसे भी पढ़ें…Indian Society कोई भी Minor Lady सामान्यतः अपनी मान-मर्यादा को दांव पर लगाकर झूठे आरोप (376 IPC) नहीं लगाती

उन्होंने कहा कि पूरा मामला मुख्य रूप से दीवानी (Civil Nature) और संपत्ति विवाद से जुड़ा है, न कि किसी गंभीर या जघन्य अपराध से. याचिकाकर्ता की ओर से इलाहाबाद उच्च न्यायालय की ही एक समन्वय पीठ द्वारा आशा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2025) मामले में दिए गए फैसले का हवाला दिया गया, जिसमें बचाव साक्ष्य एकत्र करने के लिए मुकदमे के Final stage में जमानत देने पर विचार करने की बात कही गई थी.

अभियोजन पक्ष की गवाही अभी पूरी तरह समाप्त (Final) नहीं हुई है

अपर शासकीय अधिवक्ता (AGA) ने जमानत का कड़ा विरोध किया. उन्होंने अदालत को बताया कि अभियोजन पक्ष की गवाही अभी पूरी तरह समाप्त (Final) नहीं हुई है, क्योंकि विवेचक की प्रतिपरीक्षा अभी भी जारी है. मुकदमे में हो रही देरी के लिए अभियोजन नहीं, बल्कि खुद आरोपी जिम्मेदार है, क्योंकि आरोपी पक्ष ने गवाहों की जिरह के लिए 5 से 6 दिन का अत्यधिक समय लिया. उन्होंने कहा कि पहली जमानत खारिज होने के बाद परिस्थितियों में ऐसा कोई नया या महत्वपूर्ण बदलाव (Material Change in Circumstances) नहीं आया है, जिससे दूसरे आवेदन पर विचार किया जाए.

मामले की सुनवाई करते हुए न्यायालय ने सर्वोच्च न्यायालय के प्रमुख निर्णयों और विधिक सिद्धांतों पर प्रकाश डाला:–

द्वितीय जमानत याचिका के नियम: अदालत ने दोहराया कि पहली जमानत खारिज होने के बाद दूसरी याचिका दायर करने पर कोई पूर्ण प्रतिबंध नहीं है. हालांकि, कल्याण चंद्र सरकार बनाम राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव (2005) मामले में निर्धारित सिद्धांतों के अनुसार, जब तक परिस्थितियों में कोई बड़ा तथ्यात्मक या विधिक बदलाव न आए, तब तक उन्हीं तर्कों के आधार पर दोबारा जमानत नहीं दी जा सकती.

इसे भी पढ़ें…Bachelor of Elementary Education डिग्री धारकों को बड़ी राहत, 897 पदों पर स्पेशल एजुकेशन डिप्लोमा और बीएल एड को भी शामिल करने का आदेश

‘आशा बनाम यूपी राज्य’ और सुप्रीम कोर्ट का निर्णय: अदालत ने याचिकाकर्ता द्वारा उद्धृत आशा केस का विस्तृत विश्लेषण किया. जस्टिस अनिल कुमार-X ने स्पष्ट किया कि आशा मामले के फैसले को यांत्रिक रूप से लागू नहीं किया जा सकता. कोर्ट ने उच्चतम न्यायालय के निर्णय इरफान बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2025 INSC 1012) का उल्लेख करते हुए कहा कि बचाव पक्ष की तैयारी के नाम पर जमानत का दावा खुद-ब-खुद स्वीकार नहीं होता.

आरोपी को यह दर्शाना होगा कि Final stage पर उसे किस विशिष्ट साक्ष्य या रणनीति के लिए रिहाई की आवश्यकता है और जेल में रहते हुए उसका वकील या प्रतिनिधि वह कार्य क्यों नहीं कर सकता. निष्पक्ष सुनवाई बनाम जमानत: अदालत ने माना कि आरोपी को बचाव साक्ष्य प्रस्तुत करने का पूर्ण अवसर मिलना चाहिए, लेकिन जमानत से इनकार करने से यह अधिकार समाप्त नहीं होता. यदि आरोपी को कस्टडी में साक्ष्य जुटाने में Final stage पर कोई विशिष्ट कठिनाई आती है, तो वह इसके लिए संबंधित विचारण न्यायालय के समक्ष आवेदन कर सकता है.

इसे भी पढ़ें… अलग-अलग व्यक्तिगत क्षमता में Arms License धारकों का धोखाधड़ी मामले में CrPC की धारा 223 के तहत संयुक्त विचारण संभव

उच्च न्यायालय ने माना कि आरोपी के खिलाफ दस्तावेजों के फर्जीवाड़े और संपत्ति पर अवैध कब्जे के गंभीर आरोप हैं. गवाहों की जिरह में लिया गया समय और परिस्थितियों में किसी बड़े बदलाव का अभाव यह दर्शाता है कि जमानत देने का कोई ठोस आधार नहीं बनता. कोर्ट ने आरोपी संजय त्रिपाठी की द्वितीय जमानत याचिका और आपराधिक अपील को खारिज कर दिया.

हालांकि, मामले के Final stage पर होने के कारण, उच्च न्यायालय ने विचारण न्यायालय को निर्देश दिया कि वह बिना किसी अनावश्यक स्थगन के मुकदमे की सुनवाई में तेजी लाए और इसे कानून के अनुसार शीघ्र पूरा करने का प्रयास करे.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *