इलाहाबाद हाई कोर्ट के कोर्टरूम 49 में Vandalism, uproar (हंगामा और बवाल), अवमानना और अनुशासनात्मक कार्रवाई की तैयारी

इलाहाबाद उच्च न्यायालय में बुधवार को Vandalism, uproar के चलते उस समय भारी अफरा-तफरी मच गई, जब अधिवक्ताओं के एक समूह ने न्यायिक कार्यवाहियों का विरोध करते हुए जमकर हंगामा किया. घटना के दौरान कोर्ट रूम नंबर 49 (जस्टिस अजय भनोट) में Vandalism, uproar और नारेबाजी की, जिससे परिसर में तनाव फैल गया. अन्य अदालतों के बाहर गलियारे (कॉरिडोर) में भी वकीलों द्वारा नारेबाजी और शोर-शराबा (Vandalism) किए जाने से अदालती कामकाज बाधित हुआ.
हाईकोर्ट बार एसोसिएशन और अधिवक्ताओं के अनुसार, विवाद की शुरुआत कोर्ट नंबर 49 में पुलिस अधिकारियों की बैठक व्यवस्था को लेकर हुई. आरोप है कि सुनवाई के दौरान एक पुलिस अधीक्षक (SP) स्तर के अधिकारी के बैठने के स्थान को लेकर अधिवक्ता और सरकारी वकील के बीच तीखी बहस हुई.
बाद में न्यायमूर्ति द्वारा एक अधिवक्ता के प्रति की गई सख्त टिप्पणी तथा अधिकारी से माफी मांगने के निर्देश को लेकर अधिवक्ताओं में रोष व्याप्त हो गया. बार एसोसिएशन ने इसे अधिवक्ताओं के स्वाभिमान व गरिमा से खिलवाड़ बताते हुए मुख्य न्यायाधीश से हस्तक्षेप की मांग की थी और कोर्ट के बहिष्कार की चेतावनी दी थी.
गलियारे में हो रहे शोर-शराबे (Vandalism) और अदालती कार्यवाही में बाधा पर कड़ा संज्ञान लेते हुए कोर्ट नंबर 66 में न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल की पीठ ने सख्त रुख अपनाया है. एक जमानत याचिका (देवेंद्र कुमार बनाम उत्तर प्रदेश राज्य) की सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति देशवाल ने टिप्पणी की कि दूर-दराज से आए लाचार वादकारियों के न्याय पाने के अधिकार में इस प्रकार की बाधा पूरी तरह अनुचित और अवमाननापूर्ण है.
तोड़फोड़ और हंगामे (Vandalism, uproar) पर अदालत ने सख्त आदेश जारी करते हुए कहा:-

रजिस्ट्रार (प्रोटोकॉल) को निर्देश: कोर्ट के बाहर लगे सीसीटीवी कैमरे की फुटेज की जांच की जाए और Vandalism, uproar करने वाले अधिवक्ताओं की पहचान की जाए.
कार्रवाई के लिए सिफारिश: पहचान पूरी होने के बाद संबंधित वकीलों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्यवाही हेतु मामला यूपी बार काउंसिल (Bar Council of U.P.) को भेजा जाएगा.
अवमानना कार्यवाही: दोषी अधिवक्ताओं के विरुद्ध अदालत की अवमानना (Contempt of Court) का मामला भी चलाया जाएगा.
घटना के तुरंत बाद उच्च न्यायालय परिसर में सुरक्षा बल तैनात कर दिए गए. बार और बेंच के बीच उपजे इस विवाद को सुलझाने तथा न्यायिक कामकाज की गरिमा बनाए रखने के लिए मुख्य न्यायाधीश स्तर पर भी स्थिति की समीक्षा की जा रही है. इस मामले की अगली सुनवाई 19 नवंबर 2026 को तय की गई है.
वकीलों के Vandalism से सुनवाई बाधित, जज ने केस स्थगित कर आदेश चीफ जस्टिस को भेजा

इलाहाबाद हाई कोर्ट में बुधवार को कोर्ट नंबर 55 में एक अग्रिम जमानत याचिका की सुनवाई के दौरान कुछ अधिवक्ताओं द्वारा कोर्ट रूम के बाहर Vandalism से कार्यवाही बाधित हो गई. न्यायमूर्ति विक्रम डी. चौहान ने मामले को स्थगित कर दिया और आदेश की प्रति मुख्य न्यायाधीश के समक्ष रखने के निर्देश दिए. आनंद प्रकाश केस की सुनवाई चल रही थी, तभी कोर्ट रूम के बाहर मौजूद अधिवक्ताओं ने Vandalism शुरू कर दिया.
अपने आदेश में न्यायालय ने कहा कि बार के कुछ सदस्य कोर्ट को कार्य करने नहीं दे रहे थे और बाहर से नारेबाजी के कारण आगे कार्यवाही चलाना कठिन हो गया. कोर्ट ने यह भी दर्ज किया कि हालांकि कोर्ट रूम में मौजूद अधिवक्ताओं ने अदालत की गरिमा बनाए रखी. जज ने टिप्पणी की कि वादकारियों के बड़े हित में न्यायालय का सुचारु संचालन सुनिश्चित करना बार के सदस्यों की जिम्मेदारी है.
आवेदक की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता ने मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए मामला स्थगित करने की प्रार्थना की. न्यायालय ने कहा कि Vandalism, uproar जैसे हालात में मामले को स्थगित कर उठ जाने के अलावा कोई विकल्प नहीं है. कोर्ट ने मामले को 5 नवंबर 2026 को पेश करने का आदेश दिया.साथ ही निर्देश दिया कि आदेश की प्रति रजिस्ट्रार जनरल द्वारा माननीय मुख्य न्यायाधीश के समक्ष रखी जाए.
पूरे घटनाक्रम में फसाद की जड़ कुर्सी थी. जस्टिस अजय भनोट द्वारा एक लोक सेवक के लिए कुर्सी आरक्षित कर दी गयी थी इसी को लेकर मंगलवार को विरोध हुआ था. बता दें कि यह वही इलाहाबाद हाई कोर्ट है, जहाँ पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी को भी कुर्सी नहीं मिली थी और उन्होंने खड़े होकर अपनी दलील पेश की थी. न्याय के मंदिर में किसी पद की नहीं, बल्कि विधि के शासन, न्यायिक निष्पक्षता और अधिवक्ताओं के सम्मान की सर्वोच्चता होनी चाहिए.