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फैसले से पहले Trial court को कभी भी अपराध की धारा जोड़ने या हटाने का अधिकार, केस में धारा 307 जोड़ने का आदेश बरकरार

फैसले से पहले Trial court को कभी भी अपराध की धारा जोड़ने या हटाने का अधिकार, ट्रायल कोर्ट का धारा जोड़ने का आदेश बरकरार

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि फैसला सुनाने से पहले Trial court को कभी भी अपराध की धारा जोड़ने या हटाने का पूरा अधिकार है. जस्टिस सौरभ श्रीवास्तव की बेंच ने इस कमेंट के साथ बस्ती के Trial court  के अपर सत्र न्यायाधीश द्वारा आरोप में हत्या का प्रयास की धारा जोड़ने के आदेश को सही ठहराते हुए आरोपी राघवेंद्र प्रताप सिंह की याचिका खारिज कर दी है.

इस प्रकरण से संबंधित अपराध में थाना गौर, जिला बस्ती में 19 मई 2021 को एफआईआर दर्ज हुआ था. शिकायतकर्ता के अनुसार 16 मई 2021 की शाम करीब 7 बजे सिकरी चौराहे पर सब्जी खरीदते समय राजनीतिक रंजिश रखने वाले आरोपियों ने गाली-गलौज और धमकी दी. बाद में घर लौटते समय राम नरेश के घर के पास आरोपियों ने उसे पकड़कर लाठी-डंडों से पीटा. आरोप है कि आवेदक राघवेंद्र ने हाथ में तमंचा लेकर फायर किया. बचाने आए मनोज शर्मा को भी पीटा गया.

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विवेचना के बाद पुलिस ने आरोप पत्र दाखिल किया, लेकिन 2 अगस्त 2021 को पांच आरोपियों को केवल धारा 147, 323, 504 और 506 IPC में तलब किया गया, जबकि धारा 307जानलेवा हमला छूट गई. शिकायतकर्ता ने 8 अगस्त 2022 को धारा 216 सीआरपीसी के तहत आरोप में धारा 307 जोड़ने का आवेदन दिया, जिसे 8 सितंबर 2022 को यह कहकर खारिज कर दिया गया कि वह समय से पहले  है. 22 सितंबर 2022 को आरोप तय हुए और Trial शुरू हुआ.

Trial court ने बयान दर्ज करने के बाद 4 जून 2026 को इसे स्वीकार करते हुए धारा 307  जोड़ दी

Trial court ने बयान दर्ज करने के बाद 4 जून 2026 को इसे स्वीकार करते हुए धारा 307  जोड़ दी. इसी आदेश को चुनौती दी गई है. याची के अधिवक्ता अमित सिंह ने कहा कि Trial court का आदेश अवैध, मनमाना और बिना विवेक के पारित है. उनका तर्क था कि पहले खारिज हो चुके आवेदन को बिना किसी नए तथ्य या साक्ष्य के Trial court ने मंजूर कर लिया गया और उपलब्ध सामग्री से जानलेवा हमले का अपराध बनता ही नहीं.

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राज्य की ओर से अपर शासकीय अधिवक्ता और शिकायतकर्ता के अधिवक्ता ने Trial court के आदेश का समर्थन किया. उन्होंने गवाहों के बयान का सहारा लिया. पिस्तौल की गोली से चोट लगी है. कोर्ट ने कहा कि धारा 216 सीआरपीसी न्यायालय को फैसला सुनाए जाने से पहले किसी भी समय आरोप बदलने या जोड़ने की व्यापक शक्ति देती है.

विचारणीय प्रश्न यह है कि क्या धारा 307 जानलेवा हमला के आरोप का समर्थन करने वाला साक्ष्य मौजूद है. डॉक्टर ने चोट को आग्नेयास्त्र से बताया और घायल बबलू ने भी गोली लगने की बात कही है, इसलिए प्रथम दृष्टया साक्ष्य उपलब्ध है. दूसरे आवेदन की पोषणीयता पर कोर्ट ने कहा कि यह इस पर निर्भर है कि फैसला सुनाए जाने से पहले की अवस्था में शक्ति उपलब्ध है या नहीं, और ऐसी शक्ति निर्णय से पूर्व तक न्यायालय के पास रहती है.

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कोर्ट ने माना कि 4 जून 2026 का Trial court का आदेश न तो अवैध है और न ही विकृत  इसलिए हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं है. आवेदन खारिज कर दिया गया. कोर्ट ने कहा Trial के दौरान आए साक्ष्य के आधार पर, पहले आवेदन खारिज होने के बावजूद, फैसले से पहले कभी भी आरोप बढ़ाया जा सकता है.

कन्नौज में कैंसर और हार्ट हॉस्पिटल अब तक शुरू नहीं, हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से मांगी जानकारी

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने डॉ. बी.आर. अंबेडकर राजकीय मेडिकल कॉलेज, कन्नौज में कैंसर और कार्डियोलॉजी हॉस्पिटल को ऑपरेशनल करने के मामले में उत्तर प्रदेश सरकार से 30 नवंबर तक जवाब मांगा है. शौर्य दीप की जनहित याचिका पर चीफ जस्टिस अरुण भंसाली और जस्टिस क्षितिज शैलेन्द्र की खंडपीठ  ने यह आदेश पारित किया.

याची का कहना है कि इससे पहले दाखिल याचिका की सुनवाई के दौरान जारी  गाइडलाइन के अनुसार बताया गया कि कैंसर हॉस्पिटल का निरीक्षण हो चुका है, रिपोर्ट की जांच की जा रही है. इस वित्तीय वर्ष के लिए कंस्ट्रक्शन बजट हार्ट हॉस्पिटल के लिए 607 लाख और कैंसर हॉस्पिटल के लिए 607 लाख स्वीकृत किया गया है.

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इस पर याचिका निस्तारित कर दी गई थी. फिर जनहित याचिका दायर की गई है. याची के अधिवक्ता ने कहा एक साल से ज्यादा समय बीत गया, राज्य ने अपने ही दिए गए आश्वासन के अनुसार भी कोई जरूरी कदम नहीं उठाया.इसपर कोर्ट ने राज्य सरकार से जानकारी मांगी है.

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