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Public View में जातिसूचक गाली और जाति के कारण अपराध का तत्व नहीं तो एससी एसटी एक्ट प्रभावी नहीं, कोर्ट ने रद की केस कार्यवाही

Public View में जातिसूचक गाली और जाति के कारण अपराध का तत्व नहीं तो एससी एसटी एक्ट प्रभावी नहीं, कोर्ट ने रद की केस कार्यवाही

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने Public View में जातिसूचक गाली और जाति के कारण अपराध का तत्व न होने के एक मामले में बड़ी राहत देते हुए पूरी आपराधिक कार्यवाही और सम्मन आदेश को रद्द कर दिया है. कोर्ट ने कहा कि एफआईआर में जातिसूचक गाली देने की तारीख, समय, स्थान, शब्द और Public View  तक का जिक्र नहीं है.

धमकी भी वोट न देने पर बेटी उठा लेने की जैसी निराधार है, जबकि लड़की खुद 24 साल की ग्रेजुएट है और प्रेमी से अपनी मर्जी से शादी कर चुकी है. मुख्य आरोप अपहरण का था, जिसे जांच अधिकारी ने खुद ही हटा दिया, फिर उसी सामग्री पर एक ही आरोपी को चार्जशीट करना मनमाना है. सत्यप्रकाश की अपील पर जस्टिस तेज प्रताप तिवारी ने यह फैसला सुनाया है.

तथ्यों के अनुसार श्रीमती राजो देवी ने 17 जुलाई 2025 को लिखित तहरीर दी कि अपीलकर्ता, जिसकी पत्नी गांव के स्वयं सहायता समूह की अध्यक्ष है और उसकी बहू उसी समूह की सदस्य है, सस्ते गल्ले की दुकान के डीलर चुनाव के विवाद में Public View में उसके घर आया , जातिसूचक शब्दों से गाली दी और धमकी दी कि वोट नहीं दिया तो बेटी को घर से उठवा लेगा. उसी दिन सुबह 10 बजे वह आंगनवाड़ी केंद्र गई और लौटने पर उसकी अविवाहित बेटी  गायब मिली. इस तहरीर के आधार पर बरेली जिले के थाने में प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज की गयी.

सस्ते गल्ले की दुकान के डीलर चुनाव के विवाद में Public View में उसके घर आया , जातिसूचक शब्दों से गाली दी

सुनवाई के दौरान कोर्ट में दलील दी गई कि एफआईआर चुनावी रंजिश का नतीजा है. आरोप लगाने वाले की बेटी बालिग है और अपनी मर्जी से घर छोड़कर गई और भगवान दास से शादी कर ली. उसने कहीं भी अपीलकर्ता का नाम नहीं लिया. तर्क दिया गया कि केस डायरी में मोबाइल बातचीत और व्हाट्सएप वीडियो के तथ्यों से दोनों के बीच प्रेम संबंध साबित होता है.

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जांच अधिकारी ने इसी सामग्री पर दूसरों को बरी किया और धारा 87 हटा दी, फिर भी अपीलकर्ता को मनमाने तरीके से चार्जशीट कर दिया. एससी एसटी एक्ट की धाराओं के लिए Public View का तत्व ही उपलब्ध नहीं है. कहा गया कि स्पेशल जज ने बिना तत्व देखे यांत्रिक तरीके से प्रकरण को संज्ञान लिया.

दूसरी तरफ सरकारी वकील का कहना था कि अपीलकर्ता नामजद है. सह-अभियुक्तों के साथ बेटी को गायब कराया और Public View में जातिसूचक गाली दी, वादिनी और उसके पति ने समर्थन किया है, संज्ञान सही है. कोर्ट ने कहा एफआईआर का सार ही अपहरण था, जो जांच में ही फेल हो गया. बची वेग धमकी चुनावी रंजिश में दी गई है, जिस पर मुकदमा चलाना न्याय का दुरुपयोग होगा.

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मजदूरों को मिली जमानत, गैंगस्टर एक्ट की सजा निलंबित, मूल पत्रावली तलब

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने गैंगस्टर एक्ट मे मजदूरों की सजा निलंबित करते हुए मूल पत्रावली तलब की है. अंतरिम जमानत की पुष्टि की है. यह आदेश जस्टिस तेज प्रताप तिवारी ने अफरोज आलम व सात अन्य की अपील में दाखिल अर्जी को स्वीकार करते हुए दिया है.

पीलीभीत के हजारा थाने की पुलिस ने 8 मजदूरों के ऊपर गैंगस्टर लगाया गया. सेशन जज पीलीभीत ने उनको दोषी करार देते हुए 3-3 साल की सजा सुनाई दिया. इस फैसले के खिलाफ आठों मजदूरों ने हाई कोर्ट में अपील दाखिल किया. मजदूरों के अधिवक्ता बीडी निषाद भूपेन्द्र ने बहस किया कि मजदूर केवल अपनी मांगों को लेकर कभी कभी धरना प्रदर्शन करते थे.

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हत्या के एक मामले में Public View में पुलिस के खिलाफ सड़क जाम किया था. जिसमें तीन पुलिस कर्मियों के खिलाफ हत्या का मामला भी दर्ज हुआ था. इससे खफा थाने की पुलिस ने मजदूरों पर गैंगस्टर लगा दिया और जेल भेज दिया.  हाई कोर्ट ने बहस को तर्कसंगत माना, सजा को स्थगित कर दिया और अपील सुनवाई हेतु स्वीकार कर लिया. मजदूरों को मिली जमानत जारी रखा है.

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