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परिवहन विभाग में Enforcement Constable भर्ती विवाद में याचिका मंजूर, 3 महीने में नियुक्ति पर कानून के अनुसार फैसला लेने का आदेश

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने Enforcement Constable नियुक्ति की मांग ठुकराने वाले परिवहन विभाग के आदेश को रद किया

परिवहन विभाग में Enforcement Constable भर्ती विवाद में याचिका मंजूर, 3 महीने में नियुक्ति पर कानून के अनुसार फैसला लेने का आदेश

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उत्तर प्रदेश परिवहन विभाग में प्रवर्तन सिपाही (Enforcement Constable) के पद पर चयन और नियुक्ति से जुड़े एक लंबे अरसे से चले आ रहे विवाद में प्रार्थी के पक्ष में एक महत्वपूर्ण और दूरगामी फैसला सुनाया है. जस्टिस इरशाद अली की बेंच ने Enforcement Constable पद के अभ्यर्थी बिहारी लाल रस्तोगी की याचिका को स्वीकार करते हुए विभाग के उस आदेश को खारिज कर दिया है, जिसमें उनकी Enforcement Constable पद पर नियुक्ति की मांग को ठुकरा दिया गया था.

यह पूरा कानूनी विवाद वर्ष 2004 की एक भर्ती प्रक्रिया से जुड़ा है. उत्तर प्रदेश के परिवहन आयुक्त द्वारा 10 अगस्त 2004 को एक विज्ञापन जारी किया गया था, जिसके माध्यम से ‘Enforcement Constable (प्रवर्तन सिपाही)’ के पदों पर चयन के लिए आवेदन आमंत्रित किए गए थे. इस विज्ञापन के तहत प्रार्थी बिहारी लाल रस्तोगी ने भी अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) श्रेणी के अंतर्गत आवेदन किया था.

चयन प्रक्रिया पूरी होने के बाद, मार्च 2005 के अंतिम सप्ताह में ‘Enforcement Constable चयन परिणाम घोषित किए गए और 28 मार्च 2005 को नोटिस बोर्ड पर चयनित सूची चस्पा की गई. इस चयन सूची में अन्य पिछड़ा वर्ग श्रेणी के अंतर्गत प्रार्थी का नाम 54वें क्रम पर दर्ज था.

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प्रार्थी का मुख्य तर्क यह था कि विज्ञापन के समय ओबीसी वर्ग के लिए 50 पद थे, लेकिन परिणाम आने तक कुछ और ‘Enforcement Constable पद पर रिक्तियां बढ़ गईं थीं, जिसके कारण 55 उम्मीदवारों की सूची तैयार की गई थी. इसके अलावा, चयन वर्ष के दौरान कई पद रिक्त भी रह गए थे और अन्य उम्मीदवारों (जैसे इमामउद्दीन और बाल गोविंद उपाध्याय) को अदालत के आदेश पर पूर्व में नियुक्तियां मिल चुकी थीं.

याचिकाकर्ता के अधिवक्ताओं ने तर्क दिया कि जब इसी चयन सूची के अन्य अभ्यर्थियों (इमामउद्दीन और बाल गोविंद उपाध्याय) को पूर्व में न्यायालय द्वारा पारित आदेशों के अनुपालन में नियुक्ति प्रदान की जा चुकी है, तो प्रार्थी के साथ भेदभाव क्यों किया जाए?

याचिकाकर्ता के अधिवक्ताओं की ओर से यह भी दलील दी गई कि चयन वर्ष के दौरान रिक्त हुए पदों और विज्ञापनों में निर्धारित 25% कोटे के प्रावधान के तहत उसकी उम्मीदवारी पर विचार किया जाना न्यायसंगत था. याचिकाकर्ता का नाम ‘Enforcement Constable चयन मेरिट सूची में 54वें स्थान पर था और विभाग ने कई नियुक्तियां की थीं, ऐसे में उसे मात्र इस आधार पर वंचित नहीं किया जा सकता कि उसका क्रमांक प्रारंभिक विज्ञापनों की संख्या से थोड़ा आगे था, जबकि पर्याप्त पद रिक्त पड़े थे.

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दूसरी ओर, राज्य सरकार के विद्वान स्थायी और अपर मुख्य स्थायी काउंसिल ने याचिका का कड़ा विरोध किया. उनका यह तर्क था कि किसी भी उम्मीदवार का चयन सूची में नाम आ जाना उसे नियुक्ति का पूर्ण या निहित अधिकार नहीं देता है. शासकीय अधिवक्ताओं ने उत्तर प्रदेश परिवहन विभाग ‘Enforcement Constable संवर्ग (समूह ‘घ’) सेवा नियमावली, 1979 के नियम 30(j) का हवाला देते हुए कहा कि ‘भर्ती वर्ष’ वह बारह महीने की अवधि होती है जो पहली जुलाई से शुरू होती है.

विभाग का कहना था कि वर्ष 2004-05 की चयन प्रक्रिया के तहत सभी ‘Enforcement Constable चयनित अभ्यर्थी मार्च-अप्रैल 2005 में कार्यभार ग्रहण कर चुके थे और 30 जून 2005 के बाद आरक्षित श्रेणी में कोई भी पद रिक्त नहीं बचा था. इसलिए, समय-सीमा समाप्त होने के बाद पुरानी मेरिट लिस्ट के आधार पर नए पदों पर दावा नहीं किया जा सकता.

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जस्टिस इरशाद अली ने दोनों पक्षों की दलीलों को विस्तार से सुनने और पत्रावलियों का बारीकी से अध्ययन करने के बाद रेखांकित किया कि विवाद को केवल इस सामान्य सिद्धांत तक सीमित नहीं रखा जा सकता कि “चयन सूची में नाम होने मात्र से नियुक्ति का अधिकार नहीं मिलता”. न्यायालय को यह भी देखना होगा कि क्या प्राधिकारियों ने चयन शर्तों और नियमों का पालन निष्पक्ष और एक समान तरीके से किया है या नहीं.

अदालत ने ‘Enforcement Constable के पद पर चयन पर अपने निर्णय में स्पष्ट किया कि:

समानता का सिद्धांत: जब इसी चयन प्रक्रिया से जुड़े अन्य अभ्यर्थियों को अदालत के आदेश पर रिक्तियों के सापेक्ष नियुक्ति दी गई, तो प्रार्थी के मामले में भी वस्तुनिष्ठ और न्यायसंगत रुख अपनाया जाना चाहिए था.

याचिका का निस्तारण: न्यायालय ने 26 नवंबर 2012 को पारित उस आदेश को रद्द कर दिया जिसके तहत प्रार्थी की मांग को खारिज किया गया था.

तीन महीने की समय-सीमा: अदालत ने सक्षम प्राधिकारी को निर्देश दिया है कि वह आगामी तीन महीनों के भीतर प्रार्थी की मेरिट स्थिति, ओबीसी वर्ग, चयन वर्ष के दौरान उपलब्ध रिक्तियों और विज्ञापन के नियमों को ध्यान में रखते हुए नए सिरे से एक तर्कसंगत और विधिक आदेश पारित करें. याचिकाकर्ता नियमों और अपनी मेरिट के आधार पर पात्र पाया जाता है, तो उसे अन्य सफल अभ्यर्थियों की भांति सभी सेवा लाभों के साथ नियुक्ति प्रदान की जाए.

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