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भर्ती के समय Recruit के मानसिक विकारों का पता नहीं लगाया जा सकता, बाद में पता चलने पर दिव्यांगता पेंशन का हक नहीं

भर्ती के 4 सप्ताह में चल गया था बीमारी का पता, इलाहाबाद हाई कोर्ट ने दिव्यांगता पेंशन की मांग में दाखिल याचिका की खारिज

भर्ती के समय Recruit के मानसिक विकारों का पता नहीं लगाया जा सकता, बाद में पता चलने पर दिव्यांगता पेंशन का हक नहीं
Arun Bhansali J

भर्ती के समय Recruit के मानसिक विकारों का पता नहीं लगाया जा सकता है. भर्ती के बाद ट्रेनिंग के दौरान इसका पता चलता और यह भी कि उसे ठीक होने में कम से कम तीन साल का समय लग सकता है तो Recruit को सेवा से बाहर कर दिये जाने पर Recruit दिव्यांगता पेंशन का हकदार नहीं हो जाता है. इसके साथ इलाहाबाद हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस अरुण भंसाली और जस्टिस क्षितिज शैलेन्द्र की बेंच ने Recruit को कोई राहत देने से इंकार कर दिया है.

यह रिट याचिका Recruit सचिन की ओर से दाखिल की गयी थी. इससे पहले वह आर्म्ड फोर्सेस ट्रिब्यूनल, रीजनल बेंच, लखनऊ में याचिका दाखिल कर चुका था. याचिका में दिये गये तथ्यों और इस पर दोनों पक्षों के तर्कों को सुनने के बाद ट्रिब्यूनल ने ओरिजिनल एप्लीकेशन नंबर 440/2020 में 09.07.2021 को पारित आदेश से याचिका को खारिज कर दिया था. ट्रिब्यूनल के इस फैसले को पांच साल इलाहाबाद हाई कोर्ट में चुनौती दी गयी थी.इसी पर चीफ जस्टिस की अध्यक्षता वाली बेंच सुनवाई कर रही थी.

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याचिकाकर्ता Recruit को कम मेडिकल कैटेगरी में सेवा से अयोग्य घोषित कर दिया गया था

इस आदेश के तहत याचिकाकर्ता Recruit को कम मेडिकल कैटेगरी में सेवा से अयोग्य घोषित कर दिया गया था क्योंकि यह माना गया कि विकलांगता सेवा के कारण नहीं हुई थी. इसके बाद 15 जनवरी 2016 के आदेश से उसे जीवन भर के लिए विकलांगता पेंशन देने की मांग को खारिज कर दिया गया था. ट्रिब्यूनल ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद यह निष्कर्ष निकाला कि बीमारी याचिकाकर्ता के भर्ती होने के चार सप्ताह से भी कम समय में शुरू हो गई थी इसलिए बीमारी के ‘सेवा से संबंधित न होने’ के बारे में मेडिकल बोर्ड की राय पर सवाल नहीं उठाया जा सकता.

इसके अलावा, सुप्रीम कोर्ट के नरसिंह यादव बनाम भारत संघ और अन्य (सिविल अपील नंबर 7672/2019, फैसला 03.10.2019) के फैसले का भी हवाला दिया गया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि भर्ती के समय मानसिक विकारों का पता नहीं लगाया जा सकता है और बाद में उनके सामने आने पर व्यक्ति विकलांगता पेंशन का हकदार नहीं होता है. सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस की अध्यक्षता वाली बेंच ने कहा कि इस याचिका में ट्रिब्यूनल द्वारा पांच साल पहले दिये गये फैसले को चुनौती दी गयी है.

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Khitij Shailendra J.

याचिका में इस बात का कोई जिक्र नहीं था कि इसे पांच साल बाद क्यों दाखिल किया गया है. कोर्ट ने कहा कि याचिका दाखिल करने में इतनी लम्बी देरी का कोई कारण नहीं बताया गया है इसलिए इसे सिर्फ इसी आधार पर भी खारिज किया जा सकता है. इसके बाद भी कोर्ट ने तथ्यों को भी सुना. कोर्ट ने ट्रिब्यूनल के फैसले को परखा और वहां पेश की गयी मेडिकल ओपीनियन पर भी गौर किया. मेडिकल ओपीनियन के अनुसार 19 साल के Recruit को पिछले 4-5 सालों में कई बार ‘फोकल ऑनसेट सीजर’ (दौरे) पड़े, जो बाद में पूरे शरीर में फैल गए.

आखिरी बार ट्रेनिंग के दौरान उसके साथियों ने Recruit को दौरा पड़ते देखा था. उसकी एमआरआई से पता चला कि दिमाग में कई रिंग एनहांसिंग लीजन हैं, जो न्यूरोसिस्टीसर्कोसिस का संकेत हैं. उसका इलाज एंटी-एपिलेप्टिक दवाओं से किया गया और स्टेरॉयड के साथ 04 सप्ताह तक सिस्टिसाइडल थेरेपी दी गई. इसके बाद उसे दौरे नहीं पड़े हालाँकि, उसे कम से कम तीन साल तक एंटी-एपिलेप्टिक दवा लेने की सलाह दी गयी थी.

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मेडिकल ओपीनियन में यह भी कहा गया था कि इस बात की संभावना कम है कि Recruit ट्रेनिंग का तनाव झेल पाएगा या एक फिट सैनिक के तौर पर सेवा कर पाएगा. कोर्ट ने तथ्यों को परखने के बाद कहा कि मेडिकल राय स्पष्ट और निश्चित है.

उसमें बताया गया है कि याचिकाकर्ता को यह बीमारी 4-5 साल से ज्यादा समय से है और आखिरी बार दौरा ट्रेनिंग के दौरान पड़ा था, यानी भर्ती होने के पहले चार सप्ताह के भीतर. कोर्ट ने कहा कि इस नजरिए से देखें तो, मेरिट के आधार पर ट्रिब्यूनल के निष्कर्षों में किसी भी तरह के दखल की जरूरत नहीं है. इसके आधार पर कोर्ट को याचिका में कोई दम नहीं मिला और उसने याचिका को खारिज कर दिया.

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