नाबालिग की Custody से संबंधित कार्यवाही केवल प्रतिस्पर्धी दावेदारों के कानूनी अधिकारों के आधार पर निर्धारित नहीं की जानी चाहिए
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने पिता को सौंपी बच्चों की Custody, मां के सम्पर्क में बने रहने के लिए तय की व्यवस्था

किसी नाबालिग की Custody से संबंधित कार्यवाही केवल प्रतिस्पर्धी दावेदारों के कानूनी अधिकारों के आधार पर निर्धारित नहीं की जानी चाहिए. न्यायालय को अपने अधिकार क्षेत्र का प्रयोग करते हुए, बच्चे की शारीरिक, भावनात्मक, शैक्षिक, विकासात्मक और वित्तीय आवश्यकताओं, प्रस्तावित Custody के माहौल की स्थिरता, संबंधित पक्षों की देखभाल और सुरक्षा प्रदान करने की क्षमता और उन परिस्थितियों सहित परिस्थितियों की समग्रता का आकलन करने की आवश्यकता होती है, जिसमें बच्चे को एक सुरक्षित और पोषण संबंधी पालन-पोषण प्राप्त होने की संभावना है.
इसके साथ इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस संदीप जैन की बेंच ने दो बच्चों को पिता की Custody में सौंपने का आदेश दिया है. कोर्ट ने तमाम शर्तें भी जोड़ी हैं ताकि बच्चों को मां का सानिध्य भी मिलता रहे. बता दें कि इस प्रकरण की सुनवाई 17 अगस्त 2026 को हुई थी. तब कोर्ट ने बच्चों की Custody की मांग करने वाले पिता मोहम्मद जुबैर उस्मान को हर रविवार और स्कूल की छुट्टियों के दिन बच्चों की अस्थायी Custody दी गयी थी. उन्हें वीडियो कांफ्रेंसिंग से भी रोज बच्चों से बात करने की अनुति थी.
नाबालिग बच्चे की अस्थायी Custody लेने गए, तो उनके और उनके ससुराल वालों के बीच झगड़ा हो गया
सुनवाई के दौरान कोर्ट में मो. जुबैर के अलावा बच्चों की कस्टडी संभाल रहीं श्रीमती वजीहा वजाहत और नाबालिग बच्चे भी पेश किये गये. सुनवाई के दौरान मो. जुबैर उस्मान का कहना था कि जब वह इस कोर्ट के आदेश के अनुसार रविवार को नाबालिग बच्चे की अस्थायी Custody लेने गए, तो उनके और उनके ससुराल वालों के बीच झगड़ा हो गया, जिसके कारण नाबालिग बच्चे की Custody उन्हें नहीं सौंपी गई.
उनका यह भी कहना है कि इन्हीं हालात की वजह से वह नाबालिग बच्चे के साथ खुलकर और सार्थक रूप से बातचीत नहीं कर पाए हैं. उनका कहना है कि नाबालिग बच्चे के पिता होने के नाते, वह उनकी Custody चाहते हैं और उनकी देखभाल, शिक्षा, आर्थिक सुरक्षा और उनके विकास व तरक्की के लिए सही माहौल देने में सक्षम हैं.
उनके अनुसार, अलग रह रही पत्नी कोई कमाई नहीं कर रही हैं और अपने पिता पर निर्भर हैं. उन्होंने फिर से पत्नी के साथ रहने और अपनी वैवाहिक और माता-पिता की जिम्मेदारियाँ निभाने की इच्छा जताई. याचिकाकर्ता पिता को कोर्ट के सामने अपने नाबालिग बच्चों से बातचीत करने का मौका दिया गया, लेकिन वह बच्चों के साथ कोई सार्थक बातचीत नहीं कर पाए, क्योंकि वे अपनी माँ और नाना की गोद में ही रहे और उनके साथ सहज महसूस कर रहे थे.
कोर्ट ने याचिकाकर्ता की पत्नी श्रीमती वजीहा वजाहत से बातचीत की. उन्होंने बताया कि भले ही उनके पास फूड टेक्नोलॉजी में बीटेक और एमटेक की डिग्री है, लेकिन अभी वे कोई नौकरी नहीं कर रही हैं और अपने गुजारे के लिए अपने पिता पर निर्भर हैं. उन्होंने कहा कि ससुराल में कथित तौर पर उनके साथ हुए उत्पीड़न और क्रूरता के कारण वे फिर से शौहर के साथ रहने के लिए तैयार नहीं हैं.
कोर्ट ने पति पत्नी के बीच सुलह की संभावना तलाशने की ईमानदार और ठोस कोशिश की. यह कोशिश सफल नहीं हो सकी. इस पर कोर्ट ने कहा कि पत्नी की स्पष्ट इच्छा के खिलाफ दोनों पक्षों को वैवाहिक जीवन फिर से शुरू करने के लिए मजबूर करने का कोई सार्थक नतीजा नहीं निकलेगा. इन हालात में कोर्ट के पास नाबालिग बच्चों की Custody के सवाल पर उनके अपने गुण-दोष के आधार पर विचार करने के अलावा कोई और विकल्प नहीं बचा है.
पत्नी ने स्वयं स्वीकार किया है कि वह वर्तमान में कमाई नहीं कर रही है और उसके पास आय का कोई स्वतंत्र स्रोत नहीं है. वह अपने पिता पर निर्भर हैं. याचिकाकर्ता पेशेवर रूप से योग्य है और कमाई करने में सक्षम है, उसे अपने आप में उसके लिए प्रतिकूल परिस्थिति नहीं माना जा सकता है, फिर भी, वर्तमान कस्टडी व्यवस्था का निर्धारण करते समय, न्यायालय को निर्धारण की तारीख पर प्राप्त वास्तविक परिस्थितियों पर विचार करना होगा, न कि संभावित या काल्पनिक वित्तीय स्थिति पर.
कोर्ट ने कहा
दूसरी ओर पति ने कहा है कि वह एक औद्योगिक प्रतिष्ठान चला रहे हैं जिसमें लगभग 20-30 व्यक्ति कार्यरत हैं और उनके पास मामूली धनराशि को बनाए रखने और समर्थन करने के लिए पर्याप्त आय है. उनके पास अचल संपत्ति, एक आवासीय घर, एक कार, तीन दोपहिया वाहन और पर्याप्त आभूषण हैं और उन पर कोई बकाया देनदारी नहीं है. उन्होंने हलफनामे पर कोर्ट को आश्वासन दिया कि वह नाबालिग को एक सभ्य और उपयुक्त स्कूल में उचित शिक्षा प्रदान करेगा और उनके शारीरिक, शैक्षिक और समग्र विकास के लिए सभी आवश्यक कदम उठाएगा.
यह कोर्ट इस बात को भी समझता है कि बच्चे अभी बहुत छोटे हैं और अपनी माँ और नाना के साथ रह रहे हैं. इसलिए, उनके साथ उनका भावनात्मक जुड़ाव स्वाभाविक है और इस पर उचित ध्यान दिया जाना चाहिए. कोर्ट के सामने बातचीत के दौरान बच्चों का अपनी माँ और नाना की गोद छोड़ने से हिचकिचाना, अपने आप में पिता को अस्वीकार करने जैसा नहीं माना जा सकता.
पिता का भी उनके साथ सार्थक और निरंतर संबंध बनाए रखने का समान अधिकार है, बशर्ते कि उनके कल्याण को सर्वोपरि माना जाए. Custody का आदेश ऐसा नहीं होना चाहिए जिससे बच्चों का किसी भी माता-पिता के साथ संबंध टूट जाए या कम हो जाए. बल्कि, इसे दोनों के साथ स्वस्थ और निरंतर संबंध को बढ़ावा देना चाहिए, जो उनके कल्याण के अनुकूल हो.
कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड पर लाई गई सभी परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए पिता की वित्तीय क्षमता और बच्चों की शिक्षा और पालन-पोषण की जिम्मेदारी लेने की उनकी इच्छा, और कोर्ट के सामने ऐसी किसी भी सामग्री का अभाव जिससे यह साबित हो सके कि बच्चों के पिता उनकी कस्टडी पाने के लिए अयोग्य हैं. ऐसी स्थिति में बच्चों को उनकी कस्टडी में सौंपने से बच्चों का भविष्य बेहतर होगा.
पिता को बच्चों Custody देने का मतलब यह नहीं समझा जा सकता कि बच्चों के साथ माँ का रिश्ता खत्म या कम हो गया है. बच्चों को अपनी माँ के निरंतर स्नेह, देखभाल और भावनात्मक सहयोग की आवश्यकता है और उनके कल्याण के लिए यह जरूरी है कि उनके साथ उनका रिश्ता बना रहे और उसे संवारा जाए. इसके साथ ही कोर्ट ने मां के साथ रेग्युलर टॅच में बने रहने के लिए व्यवस्था भी निर्धारित कर दी.