कानपुर का Bikru Incident: चौकी इंचार्ज सहित दो आरोपियों की जमानत मंजूर, 6 साल से जेल में थे बंद

इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस सौरभ श्याम शमशेरी ने Bikru Incident के आरोपी तत्कालीन चौकी इंचार्ज केके शर्मा उर्फ कृष्ण कुमार शर्मा और शिवम दुबे उर्फ दलाल की जमानत अर्जियां मंजूर करते हुए कहा कि मुकदमे का ट्रायल काफी आगे बढ़ चुकी है और बड़ी संख्या में सहआरोपियों को पहले ही जमानत मिल चुकी है.
जमानत मंजूर करते हुए कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि Bikru Incident के आरोपी की जमानत पर विचार करते समय की गई टिप्पणियों का मुकदमे के गुण-दोष पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा. दोनों आरोपियों की जमानत अर्जियां वर्ष 2020 के चौबेपुर थाने में दर्ज मुकदमे से संबंधित हैं. इसमें हत्या, हत्या के प्रयास, आपराधिक षड्यंत्र समेत भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं, विस्फोटक पदार्थ अधिनियम और आपराधिक कानून संशोधन अधिनियम के तहत आरोप लगाए गए हैं. दोनों अर्जियां एक ही मुकदमे से संबंधित होने के कारण हाईकोर्ट ने उनका निस्तारण एक साथ किया.
Bikru Incident के आरोपी चौकी प्रभारी केके शर्मा की ओर से पक्ष रखते हुए अधिवक्ता ने दलील दी कि आरोपी पुलिसकर्मी है और आठ जुलाई 2020 से जेल में है. मुकदमे में 25 अभियोजन गवाहों के बयान दर्ज हो चुके हैं और केवल नौ गवाहों की गवाही शेष है. बची हुई गवाही मुख्य रूप से चिकित्सकों, विवेचकों और पुलिस अधिकारियों की है. बचाव पक्ष ने यह भी कहा कि 42 सहआरोपियों में करीब 33 को पहले ही हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिल चुकी है. केके शर्मा पर मुख्य आरोप साजिश का है और आरोप है कि उसने पुलिस की प्रस्तावित दबिश की सूचना मुख्य आरोपी को दी थी.
पुलिस चौकी का प्रभारी Bikru Incident के मुख्य आरोपी के संपर्क में था
अपर शासकीय अधिवक्ता ने जमानत का विरोध करते हुए कहा कि केके शर्मा संबंधित गांव की पुलिस चौकी का प्रभारी था और Bikru Incident के मुख्य आरोपी के संपर्क में था. आरोप है कि उसने पुलिस की दबिश की जानकारी लीक कर दी, जिसके बाद मुख्य आरोपी ने अपने साथियों को एकत्र कर पुलिस दल पर घात लगाकर हमला किया. अचानक हुए इस हमले में आठ पुलिसकर्मियों की मौत हो गयी थी जबकि सात घायल हुए थे.
हाईकोर्ट ने कहा कि केके शर्मा के खिलाफ Bikru Incident के साजिश का आधार बनी मुख्य आरोपी के साथ कथित बातचीत को अब तक दर्ज साक्ष्य में पेश नहीं किया गया है. अदालत ने कहा कि साजिश के आरोप को इस स्तर पर पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, लेकिन आरोपी घटनास्थल पर मौजूद नहीं था. अंततः साजिश साबित होती है या नहीं, इसका फैसला विचारण अदालत को साक्ष्यों के आधार पर करना है. हाईकोर्ट ने विचारण अदालत को पक्षकारों के सहयोग और गवाहों की उपलब्धता के अधीन मुकदमे का शीघ्र निस्तारण करने का प्रयास करने का निर्देश भी दिया है.
पाक्सो एक्ट के आरोपी की हाई कोर्ट ने मंजूर की जमानत

इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस जितेंद्र कुमार सिन्हा ने कासगंज जिले के सोरों थाना क्षेत्र से जुड़े एक मामले में पाक्सो एक्ट के तहत आरोपी अनुभव कुमार को सशर्त जमानत दे दी है. पुलिस रिपोर्ट के अनुसार आरोपी और एक सह-आरोपी पर प्राथमिकी दर्ज कराने वाले की बेटी को बहला-फुसलाकर ले जाने का आरोप है. आरोपी को 6 अप्रैल 2026 को गिरफ्तार कर जेल में बंद कर दिया गया था.
आरोपी के वकील देवेंद्र नारायण पाण्डेय ने कोर्ट में दलील दी कि याची को झूठा फंसाया गया है और उसके खिलाफ कोई ठोस सबूत नहीं है. पीड़िता के बयान में विरोधाभास है. कक्षा 8 के प्रमाण पत्र के अनुसार उसकी उम्र 15 वर्ष 10 माह बताई गई, हालांकि हाईस्कूल का प्रमाण पत्र या पहली स्कूल में दाखिले का प्रमाण पत्र उपलब्ध नहीं था और उम्र निर्धारण के लिए कोई रेडियोलॉजिकल जांच भी नहीं कराई गई थी. बचाव पक्ष ने यह भी दावा किया कि मेडिको लीगल रिपोर्ट बलात्कार के आरोप का समर्थन नहीं करती और आरोपी का कोई आपराधिक इतिहास नहीं है.
राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त शासकीय ने जमानत याचिका का कड़ा विरोध किया.मामले के तथ्यों, दोनों पक्षों की दलीलों, अपराध की प्रकृति और सुप्रीम कोर्ट के कपिल वधावन बनाम सी बी आई (2025) तथा इलाहाबाद हाईकोर्ट के माया तिवारी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2024) मामलों में तय दिशा-निर्देशों को ध्यान में रखते हुए, कोर्ट ने मामले के गुण-दोष पर कोई टिप्पणी किए बिना आरोपी को जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया. कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया कि रिहाई आदेश बाम्ब(बेल मैनेजमेंट सिस्टम) के जरिए जेल भेजा जाए, ताकि आरोपी की शीघ्र रिहाई सुनिश्चित हो सके.