Civil Dispute में आपराधिक कार्यवाही नहीं होती, बार एसोसिएशन के पूर्व सचिव के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही रद्द

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि Civil Dispute को क्रिमिनल केस की तरह ट्रीट नहीं किया जा सकता है. Civil Dispute को सिविल प्रक्रिया के तहत ही निस्तारित किया जाना चाहिए. Civil Dispute के मामलों में आपराधिक कार्यवाही नहीं होनी चाहिए. इसके साथ ही कोर्ट ने आगरा के नाहर सिंह यादव के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया है. कोर्ट ने कहा कि यह विवाद मूल रूप से Civil Nature का है और इसे आपराधिक मामले में नहीं बदला जा सकता.
आगरा के नाहर सिंह की तरफ से दाखिल की गयी याचिका में 17 दिसंबर 2024 को दाखिल चार्जशीट, 16 मई 2026 के संज्ञान/सम्मन आदेश और थाना जगदीशपुरा, जिला आगरा में दर्ज केस की पूरी कार्यवाही रद्द करने की मांग की गयी थी. याची का पक्ष रखते हुए सीनियर एडवोकेट डीएस मिश्र और विशेष राजवंशी ने कोर्ट में सुनवाई के दौरान तर्क दिया कि यह विवाद जिला न्यायालय आगरा की बार एसोसिएशन की कमेटी से जुड़ा है, न कि किसी निजी लेन-देन से.
इस संबंध में उत्तर प्रदेश बार काउंसिल के समक्ष पहले से ही शिकायत दर्ज है. इस पर फैसला आना बाकी है. इस स्थिति में मामले को आपराधिक केस की तरह ट्रीट करते हुए दाखिल की गयी चार्जशीट को संज्ञान लेना और समन जारी करना प्रक्रिया का दुरुपयोग है और इसे रोका जाना चाहिए.
प्रबंध समिति को लेकर दो गुटों के बीच का विवाद Civil Dispute
हाईकोर्ट के पहले के एक फैसले श्याम सुंदर उपाध्याय एवं अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि किसी शिक्षण संस्थान की प्रबंध समिति को लेकर दो गुटों के बीच का विवाद Civil Nature का है और इसे आपराधिक मुकदमे में तब्दील नहीं किया जाना चाहिए. यह भी बताया गया कि इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट ने अभिषेक पांडेय बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले में विशेष अनुमति याचिका में बरकरार रखा है.
याचिका की सुनवाई करते हुए जस्टिस सौरभ श्रीवास्तव की एकल पीठ ने कहा कि नाहर सिंह यादव पर लगे आरोप जिला न्यायालय, फिरोजाबाद की बार एसोसिएशन के सचिव के तौर पर उनकी भूमिका से जुड़े हैं, न कि एक निजी व्यक्ति के रूप में. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामले में आपराधिक कार्यवाही नहीं चलाई जा सकती. इसके आधार पर कोर्ट ने चार्जशीट, संज्ञान आदेश और संबंधित मुकदमे की पूरी कार्यवाही रद्द करते हुए आवेदन स्वीकार कर लिया.
वृद्धावस्था पेंशन वृद्धि मामला, राज्य सरकार को दो सप्ताह की मोहलत
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मथुरा निवासी प्रकाश चंद्र अग्रवाल द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए राज्य सरकार को अनुपालन रिपोर्ट पेश करने के लिए दो सप्ताह की मोहलत दे दी है. जस्टिस अरिंदम सिन्हा और जस्टिस सत्यवीर सिंह की बेंच के समक्ष राज्य सरकार की ओर से मुख्य स्थायी अधिवक्ता डॉ. राजेश्वर त्रिपाठी पेश हुए, जबकि याचिकाकर्ता स्वयं व्यक्तिगत रूप से उपस्थित हुए.
याचिकाकर्ता ने बताया कि 1,000 रुपये की राशि जमा हुई है, जबकि उनकी मासिक पेंशन 1,500 रुपये प्रतिमाह जनवरी 2026 से देय है. उन्होंने पेंशन में बकाया राशि और 1,000 रुपये से 1,500 रुपये तक की वृद्धि से संबंधित मुद्दा उठाया है. राज्य सरकार ने इस योजना का अनुपालन करने की इच्छा जताई है. अदालत ने मांगी गई मोहलत स्वीकार करते हुए निर्देश दिया कि अगली सुनवाई की तारीख तक अनुपालन की रिपोर्ट पेश की जाए, अन्यथा शपथ पत्र के माध्यम से स्पष्टीकरण देना होगा. मामले की अगली सुनवाई 28 सितंबर, 2026 को होगी.