तय मात्रा वाला Codeine सिरप चिकित्सा उपयोग के लिए बेचा या भेजा जाता है तो वह मादक पदार्थ नहीं माना जाएगा
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा, वही सिरप नशे के लिए भंडारित, बेचा या परिवहन किया जाता है, तो पूरा मिश्रण ” Codeine तैयारी” मानते हुए एनडीपीएस एक्ट के दायरे में आएगा

तय मात्रा वाला Codeine सिरप चिकित्सा उपयोग के लिए बेचा या भेजा जाता है तो वह मादक पदार्थ नहीं माना जाएगा. लेकिन, यदि वही सिरप नशे के लिए भंडारित, बेचा या परिवहन किया जाता है, तो पूरा मिश्रण ” Codeine तैयारी” मानते हुए एनडीपीएस एक्ट के दायरे में आ जाएगा. सामान्य दुकान से बिना पर्ची के Codeine सिरप बेचना ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट का उल्लंघन माना जाएगा न कि एनडीपीएस एक्ट का.
ऐसा तब होगा जब तक कि कम समय में भारी मात्रा में बिक्री न हो जो दुकानदार की मंशा जाहिर करे. इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल की बेंच ने Codeine आधारित कफ सिरप (न्यू फेंसेडिल, एस्कुफ, कोडेक्टस, लाइकारेक्स-टी आदि) से जुड़े 76 जमानत मामलों पर एक साथ सुनवाई करते हुए यह अहम फैसला सुनाया है.
क्या तय सीमा (0.2% कोडीन) से कम मात्रा वाला Codeine कफ सिरप, जो चिकित्सा प्रयोग में स्थापित है, एनडीपीएस एक्ट के दायरे में आता है या नहीं.
कोर्ट के सामने सवाल था कि क्या तय सीमा (0.2% कोडीन) से कम मात्रा वाला Codeine कफ सिरप, जो चिकित्सा प्रयोग में स्थापित है, एनडीपीएस एक्ट के दायरे में आता है या नहीं. आवेदकों के वकीलों ने दलील दी कि ऐसा Codeine सिरप “मैन्युफैक्चर्ड ड्रग” की परिभाषा में नहीं आता. ऐसे मामले में केवल ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट के तहत ही कार्रवाई हो सकती है. राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता अनूप त्रिवेदी ने तर्क दिया कि लाइसेंस की शर्तों के उल्लंघन में या नशे के मकसद से बेचे-ढोए जाने पर यह सिरप एनडीपीएस एक्ट के तहत दंडनीय होगा.
कोर्ट द्वारा मुख्य आवेदक भोला प्रसाद (साईं ट्रेडर्स रांची के प्रोप्राइटर) की जमानत अर्जी खारिज कर दी गई. सोनभद्र में लगभग 7.5 लाख बोतलें फर्जी फर्मों के जरिए डायवर्ट कर तस्करी में इस्तेमाल किए जाने के प्रथम दृष्टया साक्ष्य मिले, जिसमें कोर्ट ने पाया कि माल सोनभद्र न भेजकर बिहार, बांग्लादेश और अन्य जगह भेजा गया.
76 जुड़े मामलों में से अधिकांश ड्राइवर, खलासी, गार्ड या निम्न-स्तरीय कर्मचारियों को जमानत मिली. जहां सामान पैक कार्टन में छिपा मिला और उन्हें सामग्री की जानकारी होने के प्रमाण नहीं थे. जिन आवेदकों पर फर्जी फर्में बनाकर बड़े पैमाने पर Codeine सिरप डायवर्ट करने, जाली दस्तावेज तैयार करने या सिंडिकेट चलाने के ठोस सबूत मिले, उनकी जमानत अर्जियां खारिज कर दी गईं.
नशीले मादक पदार्थ की तस्करी में हिरासत में लिए गए आकरम की रिहाई का आदेश

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने नशीले पदार्थों की अवैध तस्करी रोकथाम अधिनियम के तहत निवारक हिरासत में रखे गए बरेली के अकरम को रिहा करने का आदेश दिया है. जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस अचल सचदेव की खंडपीठ ने हिरासत और उसकी पुष्टि करने वाले दोनों आदेशों को रद्द कर दिया.
अकरम के खिलाफ 17 अप्रैल 2026 को गृह सचिव द्वारा निवारक हिरासत का आदेश पारित किया गया था, जो 18 अप्रैल को उसे सौंपा गया. हिरासत का मुख्य आधार बरेली में दर्ज मामला था, जबकि दो अन्य पुराने मामलों में उसे पहले ही जमानत मिल चुकी थी.
याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि उसने 12 मई 2026 को अपनी लिखित प्रतिवेदन जेल प्रशासन को सौंपी थी, जिसे सलाहकार बोर्ड को भी भेजा गया. लेकिन बोर्ड की राय में यह दर्ज है कि उसे कोई लिखित प्रतिवेदन प्राप्त ही नहीं हुई. राज्य सरकार ने भी स्वीकार किया कि प्रतिवेदन भेजी गई थी, बावजूद इसके यह बोर्ड के रिकॉर्ड में नहीं पहुंची. दूसरी दलील यह थी कि सलाहकार बोर्ड के सामने पेशी के दौरान आकरम को कानूनी सहायता से वंचित रखा गया, जबकि जिलाधिकारी, वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक और गृह सचिव जैसे राज्य के अधिकारी स्वयं बोर्ड के समक्ष उपस्थित थे.
कोर्ट ने कहा कि यदि राज्य के अधिकारी सलाहकार बोर्ड के सामने पेश होकर मामले में सहायता करते हैं, तो निरुद्ध व्यक्ति को भी कानूनी प्रतिनिधित्व का अधिकार दिया जाना चाहिए. ऐसा न करना गंभीर खामी है. कोर्ट ने यह भी पाया कि लिखित प्रतिवेदन पर सलाहकार बोर्ड द्वारा विचार न करना बोर्ड की राय को प्रभावित करने वाली गंभीर चूक है, और मौखिक सुनवाई इसका विकल्प नहीं हो सकती.
एक और महत्वपूर्ण पहलू यह सामने आया कि जवाबी हलफनामे में एक अधिकारी ने खुद को हिरासत आदेश जारी करने वाला अधिकारी बताया, जबकि वास्तव में आदेश किसी अन्य अधिकारी ने पारित किया था. कोर्ट ने इस पर नाराजगी जताते हुए राज्य सरकार को संबंधित अधिकारी के आचरण पर संज्ञान लेने का निर्देश दिया.