Prima facie cognizable offence बनता हो, जांच में पर्याप्त साक्ष्य पाये गये हों तो केस को दुर्भावनापूर्ण मंशा का नतीजा नहीं मान सकते

Prima facie cognizable offence बनता हो, जांच में पर्याप्त साक्ष्य पाये गये हों तो मुकदमे को दुर्भावनापूर्ण मंशा का नतीजा नहीं माना जा सकता और केस रद नहीं किया जा सकता है. ट्रायल कोर्ट को cognizable offence के तथ्यों और सबूतों को परखने का पूरा मौका देना ही उचित होगा. यह व्यवस्था देने के साथ ही इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस जयकृष्ण उपाध्याय की बेंच ने अधिवक्ता बृज मोहन की धारा 528 बीएनएसएस के तहत दाखिल याचिका पर हस्तक्षेप से इन्कार करते हुए खारिज कर दी है.
याची के खिलाफ फिरोजाबाद जिले के थाना रामगढ़ में वर्ष 2022 में केस दर्ज हुआ था. बृज मोहन, जो पेशे से अधिवक्ता हैं, पर cognizable offence धारा 307 (हत्या का प्रयास), 120-बी (आपराधिक षड्यंत्र) और 34 भारतीय दंड संहिता के तहत आरोप हैं. याचिका में तर्क दिया गया कि एफआईआर में याची का नाम नहीं था बल्कि जांच के दौरान घायल सुशील के बयान में उनका नाम सामने आया.
याची के विरुद्ध प्रथमदृष्टया cognizable offence बनता है
याची का कहना था कि एफआईआर झूठे आधार पर दर्ज की गई. पर्याप्त साक्ष्य के बिना चार्जशीट भी दाखिल कर दी गई. जिसमें अपराध के आवश्यक तत्व मौजूद नहीं है. मुकदमा दुर्भावनापूर्ण मंशा से दर्ज कराया गया. न्यायालय ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि *धारा 528 की याचिका के तहत तथ्यों के विवादित प्रश्नों पर निर्णय नहीं किया जा सकता. कोर्ट ने कहा रिकॉर्ड पर उपलब्ध सामग्री से स्पष्ट होता है कि याची के विरुद्ध प्रथमदृष्टया cognizable offence बनता है और जांच में पर्याप्त साक्ष्य एकत्र किए गए हैं. इस आधार पर केस कार्यवाही में हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता.
बैंक द्वारा अवैध बेदखली की धमकी पर हाईकोर्ट सख्त, अगली सुनवाई 3 जून को
इलाहाबाद उच्च न्यायालय के जस्टिस सौमित्र दयाल सिंह और जस्टिस सत्य वीर सिंह की खंडपीठ ने श्रीमती हरवती देवी की याचिका पर सरफेसी एक्ट के तहत बैंक की मनमानी पर स्पष्टीकरण मांगा है और याचिका को सुनवाई हेतु 3 जून को पेश करने का निर्देश दिया है.
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याची अधिवक्ता ने तर्क दिया कि सरफेसी अधिनियम, 2002 की धारा 14 के तहत अभी तक कोई वैधानिक कार्यवाही शुरू नहीं की गई है. इसके बावजूद, देहरादून स्थित ऋण वसूली न्यायाधिकरण में सुनवाई लंबित रहते हुए बैंक द्वारा याचियों को कानूनी प्रक्रिया के बाहर जाकर बेदखल करने की धमकी दी जा रही है. बैंक के अधिवक्ता *देवेश सक्सेना ने न्यायालय को आश्वस्त किया कि अगली सुनवाई की तारीख तक याचियों को बेदखल करने का कोई तत्काल खतरा नहीं है.