Principles of Law: संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत अधिकार पाने के लिए पूर्ण, सत्य और सही तथ्य रखने की जिम्मेदारी वादी की
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने वाराणसी के विद्यालय के क्लर्क और चपरासी को राहत देने से किया इंकार

Law का एक सुस्थापित सिद्धांत है कि कोई भी वादी जो न्यायालय के असाधारण और न्यायसंगत क्षेत्राधिकार का आह्वान करता है उस पर पूर्ण, सत्य और सही तथ्यों को प्रकट करने का एक गंभीर दायित्व होता है. किसी महत्वपूर्ण विवरण को दबाना, छिपाना या तोड़-मरोड़कर पेश करना, ऐसे वादी को भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत विवेकाधीन राहत मांगने के अधिकार से वंचित कर देता है. इस पर भरोसा करते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट की जस्टिस मंजू रानी चौहान की बेंच ने शिव दुर्गेशेश्वर महावीर पूर्व माध्यमिक विद्यालय अश्वारी वाराणसी के क्लर्क और चपरासी को कोई राहत देने से इंकार करते हुए याचिका खारिज कर दी है.
बेंच ने अपने फैसले में कहा कि, यह न्यायालय यह टिप्पणी करने के लिए बाध्य है कि याचिकाकर्ता ‘साफ हाथों’ के साथ न्यायालय के समक्ष उपस्थित होने में विफल रहे हैं. नियुक्ति की तिथि के संबंध में उनकी दलीलों में जो विसंगति है जिसे शुरू में वर्ष 1977 बताया गया था और बाद में बदलकर 1980 कर दिया गया वह कोई मामूली या अनजाने में हुई त्रुटि मात्र नहीं है, बल्कि यह उनके दावे की मूल बुनियाद पर ही प्रहार करती है.
ऐसे परस्पर विरोधी रुख स्पष्ट रूप से अपने मामले को बेहतर बनाने और न्यायालय को गुमराह करने के एक सोचे-समझे प्रयास को उजागर करते हैं. इसलिए याचिकाकर्ता Law के अनुसार न्यायालय से किसी भी प्रकार की रियायत या सहानुभूति पाने के योग्य नहीं हैं.
किसी नाबालिग की सार्वजनिक पद पर नियुक्ति अपने आप में अवैध, शून्य और Law के अनुसार की नजर में अस्तित्वहीन होती है
बेंच ने कहा कि भले ही याचिकाकर्ताओं द्वारा प्रस्तुत पक्ष को तर्क के लिए मान भी लिया जाए फिर भी यह एक स्वीकृत और निर्विवाद स्थिति बनी रहती है कि कथित नियुक्ति के समय एक याचिकाकर्ता की आयु 18 वर्ष से कम थी. किसी नाबालिग की सार्वजनिक पद पर नियुक्ति अपने आप में अवैध, शून्य और Law के अनुसार की नजर में अस्तित्वहीन होती है. ऐसी नियुक्ति में उसके प्रारंभ से ही कोई कानूनी (Law) वैधता नहीं होती और उसे शून्य माना जाना चाहिए.

यह रिट याचिका वाराणसी के लक्ष्मी शंकर तिवारी व एक अन्य की तरफ से दाखिल की गयी थी. इसमें शिक्षा निदेशक (बेसिक) उत्तर प्रदेश द्वारा 20 दिसंबर 2014 को दिये गये आदेश को रद्द करने, याचिकाकर्ताओं के कामकाज और कर्तव्यों के निर्वहन में हस्तक्षेप न करने और उन्हें नियमित वेतन भुगतान के साथ बकाया वेतन भुगतान की मांग में दाखिल की गयी थी.
याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ता ने जानकारी दी कि दोनों शिव दुर्गेशेश्वर महावीर पूर्व माध्यमिक विद्यालय अश्वारी वाराणसी में चतुर्थ और तृतीय श्रेणी कर्मचारी के रूप में कार्यरत हैं. संस्था को 2006 में अनुदान-सहायता सूची में शामिल किया गया था. उनकी प्रारंभिक नियुक्ति 1980 को हुई थी.
संस्थान को ‘ग्रांट-इन-एड’ सूची में शामिल किया गया था तब तत्कालीन मैनेजर ने अपने जान-पहचान वालों को नियुक्त करने के लिए कुछ लोगों के साथ मिलकर साजिश रची और याचिकाकर्ताओं से जुड़े जरूरी रिकॉर्ड में हेरफेर और जालसाजी की. ऐसा इसलिए किया गया ताकि याचिकाकर्ताओं को झूठे तौर पर असिस्टेंट टीचर के रूप में दिखाया जा सके जबकि असल में वे नॉन-टीचिंग स्टाफ के तौर पर काम कर रहे थे.
सरकारी रिकॉर्ड में याचिकाकर्ताओं के पदों में बदलाव कर दिया तो उन्होंने इस कोर्ट में सिविल मिसलेनियस रिट याचिका संख्या 25487/2008′ (परशु राम और अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य) दायर की.
इस याचिका का निपटारा 2012 के निर्णय और आदेश के माध्यम से किया गया था. जिसमें शिक्षा निदेशक (बेसिक), उत्तर प्रदेश, लखनऊ’ को निर्देश दिया गया था कि वे इस मामले की जाँच करें और संस्थान के ‘ग्रांट-इन-एड’ दर्जे के संबंध में उचित निर्णय लें. उक्त आदेश का पालन करते हुए संबंधित अधिकारी द्वारा विवादित आदेश पारित किया गया है.
तर्क दिया गया कि उत्तर प्रदेश मान्यता प्राप्त बेसिक स्कूल (जूनियर हाई स्कूल) (मंत्रालयी कर्मचारियों और ग्रुप ‘D’ कर्मचारियों की भर्ती और सेवा शर्तें) नियमावली, 1984′ के प्रावधान याचिकाकर्ताओं की नियुक्तियों पर लागू नहीं होते क्योंकि उक्त नियमावली प्रकृति से भविष्यलक्षी है और उनके प्रारंभिक नियुक्तियों की तिथि के बाद लागू हुई थी.
प्रतिवादी की ओर से उपस्थित अधिवक्ता ने कहा कि 2006 में संस्था के ‘ग्रांट-इन-एड’ सूची में शामिल होने के बाद संस्था के प्रबंधक द्वारा एक प्रबंधकीय विवरण अनुमोदन हेतु अग्रेषित किया गया था. इसमें उन शिक्षकों की सूची शामिल थी जो कथित तौर पर उस तिथि को संस्था में कार्यरत थे.
प्रबंधकीय विवरण की जाँच तीन-सदस्यीय समिति द्वारा की गई थी जिसमें वित्त एवं लेखा अधिकारी, बेसिक शिक्षा अधिकारी और वरिष्ठ खंड शिक्षा अधिकारी शामिल थे. जाँच करने पर, समिति ने पाया कि उक्त विवरण कानून के अनुरूप नहीं था इसलिए समिति ने उसे अस्वीकृत कर दिया. प्रस्ताव वित्तीय अनुमोदन के लिए क्षेत्रीय स्तर की समिति को नहीं भेजा गया.
प्रबंधकीय विवरण के संबंध में सक्षम प्राधिकारी द्वारा कभी भी कोई वित्तीय स्वीकृति या अनुमोदन प्रदान नहीं किया गया था. सूची को चुनौती देते हुए संस्था के शिक्षकों परशुराम और अन्य ने कोर्ट में सिविल विविध रिट याचिका संख्या 25487/2008 दायर की.
रिट याचिका का निस्तारण 23.04.2012 के आदेश द्वारा किया गया, जिसके तहत सक्षम प्राधिकारी को निर्देश दिया गया कि वे याचिकाकर्ताओं के दावे की जांच करें और विधि (Law) के अनुसार उचित निर्णय लें. चूंकि नियुक्तियां अवैध पाई गईं और विधिवत अनुमोदित नहीं थीं इसलिए राज्य पर ऐसे व्यक्तियों को राजकोष से वेतन जारी करने का कोई दायित्व नहीं डाला जा सकता है.
बेंच ने माना कि प्रबंधन की ओर से प्रस्तुत अभिलेखों के अवलोकन से संकेत मिलता है कि संबंधित शिक्षकों ने अलग-अलग अभ्यावेदन प्रस्तुत किए हैं, जिनमें यह स्थापित करने का प्रयास किया गया है कि 31.03.1987 के आदेश द्वारा अनुमोदन प्रदान किया गया था. यह उल्लेखनीय है कि एक ही संदर्भ संख्या वाले दो अलग-अलग दस्तावेज अभिलेख पर लाए गए हैं, यद्यपि दोनों ही अनुमोदन प्रदान करने का दावा करते हैं, किंतु उनमें शिक्षकों और लिपिकीय कर्मचारियों की सूचियां एक-दूसरे से भिन्न हैं.
यह स्पष्ट विसंगति उन दस्तावेजों की सत्यता और प्रामाणिकता के संबंध में गंभीर संदेह उत्पन्न करती है, जिन पर भरोसा किया गया है और प्रथम दृष्टया यह संकेत देती है कि किसी न किसी स्तर पर उनमें प्रक्षेप या मनगढ़ंत फेरबदल किया गया है. ऐसी परिस्थितियों में, इस मामले की सावधानीपूर्वक जांच-पड़ताल किया जाना आवश्यक है, क्योंकि संबंधित पक्षों द्वारा अभिलेखों में जालसाजी या हेरफेर की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है.
प्रतिवादियों के वकील ने तर्क दिया कि सिविल विविध रिट याचिका संख्या 25487/2008 में दावा किया था कि वे वर्ष 1977 से संस्था में काम कर रहे हैं. प्रतिवादी-प्रबंध समिति की ओर से उपस्थित वकील ने संस्था का पक्ष रखते हुए बताया कि रिट याचिका में याचिकाकर्ताओं ने स्वयं स्पष्ट रूप से यह कहा है कि एक ने वर्ष 1977 में संस्था में प्रवेश लिया था.
इसके समर्थन में नियुक्ति कार्यक्रम की एक प्रति संलग्न की गई थी. इस पर जन्म तिथि 08.06.1967 दर्ज की गई थी. इस तरह से इस याचिकाकर्ता की आयु मात्र 10 वर्ष थी. वर्तमान रिट याचिका में उसने अपनी नियुक्ति की तिथि 01.07.1980 दिखाने का प्रयास किया है. भले ही उक्त तिथि को स्वीकार कर लिया जाए तब भी कथित नियुक्ति के समय उसकी आयु 18 वर्ष से कम ही होगी.
दोनों ही स्थितियों में वह एक अवयस्क था और इस प्रकार संस्था में किसी भी पद पर नियुक्ति के लिए अयोग्य था. तथ्य स्पष्ट रूप से इंगित करते हैं कि याचिकाकर्ताओं ने महत्वपूर्ण तथ्यों को गलत तरीके से प्रस्तुत किया है और इस न्यायालय के साथ प्रतिवादी अधिकारियों को भी गुमराह करने का प्रयास किया है.
दोनों पक्षों के तर्कों को सुनने के बाद बेंच ने कहा कि यह कानून (Law) का एक स्थापित सिद्धांत है कि किसी संस्था में किसी पद पर नाबालिग की नियुक्ति अस्वीकार्य और प्रारंभ से ही शून्य होती है. बेंच ने कहा कि राम आशीष चौधरी मामले में डिवीजन बेंच का निर्णय इस कानूनी (Law) स्थिति की स्पष्ट रूप से पुष्टि करता है. प्रतिवादियों ने सही तर्क दिया है कि कथित नियुक्तियाँ भर्ती को नियंत्रित करने वाले वैधानिक (Law) प्रावधानों अर्थात् 1978 के नियमों और 1984 के नियमों का घोर उल्लंघन हैं.
रिकॉर्ड की जांच करने पर ऐसे विरोधाभासी दस्तावेजों का पता चलता है जिनके संदर्भ संख्या तो एक समान हैं लेकिन उनमें दी गई जानकारी में अंतर है. ऐसी विसंगतियों से उनकी प्रामाणिकता और असलियत के बारे में गंभीर और उचित संदेह पैदा होते हैं. Law का यह एक सुस्थापित सिद्धांत है कि राज्य के खजाने के विरुद्ध वेतन के लिए कोई भी दावा तब तक मान्य नहीं हो सकता, जब तक कि संबंधित नियुक्ति वैध (According to Law) न हो और सक्षम प्राधिकारी द्वारा विधिवत अनुमोदित न हो. वर्तमान मामले में, याचिकाकर्ता अपनी नियुक्तियों की वैधता सिद्ध करने में असफल रहे हैं.
Law स्पष्ट है कि किसी अवैध नियुक्ति से कोई अधिकार उत्पन्न नहीं हो सकता और न्यायालयों से ऐसे कार्यों को मान्यता देने या वैध ठहराने की अपेक्षा नहीं की जा सकती जो प्रारंभ से ही शून्य हों. यह भी समान रूप से सुस्थापित है कि न्यायसंगत विचार, चाहे वे कितने भी प्रबल क्यों न हों उन्हें वैधानिक (Law) प्रावधानों के अधिदेश को अधिरोपित करने या उसे कमज़ोर करने की अनुमति नहीं दी जा सकती.
बेंच ने किया कमेंट