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Criminal मामलों की जाँच बहुत सावधानी और ट्रायल पूरी जिम्मेदारी के साथ चलाए जाने चाहिए, 46 साल पुराने फायरिंग मामले में आरोपी बरी

सुनवाई के दौरान पिता की हो चुकी थी मौत, बेटा भी हो चुका है बुजुर्ग, कोर्ट ने अभियोजन की कहानी को बताया कमजोर

Criminal मामलों की जाँच बहुत सावधानी और ट्रायल पूरी जिम्मेदारी के साथ चलाए जाने चाहिए, 46 साल पुराने फायरिंग मामले में आरोपी बरी

सुप्रीम कोर्ट द्वारा सुबल घोराई बनाम पश्चिम बंगाल राज्य में किये गए महत्वपूर्ण कमेंट कि Criminal मामलों की जाँच बहुत सावधानी से और ट्रायल पूरी जिम्मेदारी के साथ चलाए जाने चाहिए, को नजीर मानते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस ​अवनीश सक्सेना ने करीब 46 साल पुराने फायरिंग मामले में आरोपी को सबूतो की कमी के कारण बरी कर दिया है. अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष Criminal मामले में संदेह से परे आरोप साबित करने मे सफल नहीं हो सका, इसलिए आरोपी को संदेह का लाभ दिया जाना उचित है.

यह Criminal मामला 4 दिसंबर 1980 का है, जब मैनपुरी जिले के एक गांव में जमीन विवाद को लेकर गोली चलने की घटना हुई थी. आरोप था कि केशव सिंह उर्फ कल्लू ने अपने पिता बृजबासी लाल के उकसाने पर फायरिंग की, जिसमें शिव कुमार सिंह घायल हो गए थे. निचली अदालत ने Criminal मामले में  26 जून 1987 को आरोपी को दोषी ठहराते हुए तीन साल की सजा और पांच हजार रुपये का जुर्माना लगाया था.

यह Criminal अपील सीआरपीसी की धारा 374(2) के तहत दायर की गयी थी जिसमें दोषसिद्धि के फैसले को चुनौती दी गई थी. इसे दो अभियुक्तों बृजवासी लाल (पिता) और केशव सिंह उर्फ कल्लू (पुत्र) की ओर से दाखिल किया गया था. Criminal अपील के लंबित रहने के दौरान पिता (बृजवासी लाल) का निधन हो गया. बहस के दौरान अपीलकर्ता के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि एकमात्र जीवित अपीलकर्ता केशव सिंह उर्फ कल्लू की आयु भी अब 78 वर्ष हो चुकी है.

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ट्रायल कोर्ट ने 26.06.1987 को दिए गए अपने दोषसिद्धि के फैसले (सेशंस ट्रायल संख्या 165/1986 ‘राज्य बनाम बृजवासी लाल और अन्य’) में एकमात्र जीवित अपीलकर्ता को तीन वर्ष के कठोर कारावास और 5000 रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई थी. जुर्माना न भरने पर उसे एक और साल की कठोर कारावास की सजा काटने का निर्देश दिया गया.

Criminal अपील मामले की सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने पाया कि गवाहों के बयान एक-दूसरे से मेल नहीं खाते थे और घटनास्थल से जुड़े कई महत्वपूर्ण साक्ष्य भी एकत्र नहीं किए गए थे. अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि कथित हथियार को जब्त नहीं किया गया और न ही खून से सने कपड़े या अन्य जरूरी साक्ष्य प्रस्तुत किए गए, जिससे अभियोजन की कहानी कमजोर हो गई.

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न्यायालय ने कहा कि गवाहों के बयानों में समय, स्थान और घटना के तरीके को लेकर गंभीर विरोधाभास हैं. साथ ही यह भी स्पष्ट नहीं हो सका कि घायल और चश्मदीद गवाह घटना स्थल पर क्यों मौजूद थे. इन परिस्थितियों में अदालत ने माना कि आरोपी के खिलाफ Criminal मामले में ठोस और निर्णायक साक्ष्य नहीं हैं.

इन्हीं आधारों पर हाईकोर्ट ने 1987 में दी गई सजा और दोषसिद्धि को रद्द करते हुए आरोपी केशव सिंह उर्फ कल्लू को धारा 307 आईपीसी के आरोप से बरी कर दिया. साथ ही अदालत ने आपराधिक अपील को स्वीकार करते हुए आरोपी की जमानत और जमानतदारों को भी मुक्त करने का आदेश दिया.

इस मामले की जाँच संतोषजनक नहीं है और सबूतों को दर्ज करने का काम भी लापरवाही से किया गया है. न्याय केवल इसलिए हो पाया है क्योंकि अभियोजन पक्ष का मामला अपने आप में मजबूत था और गवाहों के रूप में पेश हुए सीधे-सादे लोगों के सबूत विश्वसनीय थे.

सेशंस मामलों में पीड़ितों के अधिकारों के साथ-साथ अभियुक्तों के अधिकार भी शामिल होते हैं. यहाँ तक कि समाज का भी सेशंस मामलों के सही ढंग से संचालन में बहुत बड़ा हित जुड़ा होता है, क्योंकि इनका संबंध कानून-व्यवस्था बनाए रखने से होता है. इसलिए, Criminal मामलों की जाँच बहुत सावधानी से की जानी चाहिए और ट्रायल पूरी जिम्मेदारी के साथ चलाए जाने चाहिए.
‘सुबल घोराई बनाम पश्चिम बंगाल राज्य’ मामले में सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी को बेंच ने अपने फैसले में मेंशन किया

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Criminal अपील से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्य जिसे बेंच ने नोटिस लिया:-

  • आरोपी अपीलकर्ता केशव सिंह उर्फ कल्लू और शिकायतकर्ता राजेंद्र सिंह पड़ोसी हैं और गाँव महलरपुर, थाना करहल, जिला मैनपुरी के रहने वाले हैं.
  • शिकायतकर्ता राजेंद्र सिंह और मृतक बृजवासी लाल के बीच जमीन के कब्जे को लेकर विवाद है. इस संबंध में सीआरपीसी की धारा 145 के तहत एक कार्यवाही लंबित थी.
  • घायल गवाह शिव कुमार सिंह, जो एक संयोगवश गवाह है गाँव विक्रमपुर सिविल लाइंस इटावा का रहने वाला है.
  • चश्मदीद गवाह सुघर सिंह कौसरी खेड़ा थाना- नगला कंगार मैनपुरी का रहने वाला है वह भी एक संयोगवश गवाह है.
  • शिकायतकर्ता के पिता जिनका नाम मुलायम सिंह है को भी कथित तौर पर गोली लगने से चोटें आई थीं. लेकिन, न तो उनकी कोई मेडिको-लीगल जाँच रिपोर्ट पेश की गयी और न ही उन्हें अदालत में गवाह के तौर पर पेश किया गया. ट्रायल कोर्ट ने गवाह पर भरोसा नहीं किया कि केशव ने मुलायम सिंह पर गोली चलाई थी जिससे उन्हें चोटें आईं.
  • आरोपी अपीलकर्ता केशव सिंह द्वारा इस्तेमाल की गई लाइसेंसी बंदूक उसके दादा सूबेदार की है जिसे पुलिस ने अपनी हिरासत में नहीं लिया है और न ही कोई एफएसएल रिपोर्ट हासिल की.
  • यह घटना जनपद मैनपुरी में हुई थी जबकि प्रथम सूचना रिपोर्ट थाना जसवंत नगर जिला इटावा में दर्ज की गई थी.
  • रिकॉर्ड की जाँच करते समय ऊपर बताए गए तथ्यों को ध्यान में रखा गया और कोर्ट ने माना कि ये तथ्य सबूतों का सही मूल्यांकन करने के लिए जरूरी हैं.

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