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Anticipatory bail पर फैसला करते समय कोर्ट आरोप की गंभीरता प्रकृति पर भी विचार करे, 50 हजार के मुचलके पर महिला को जमानत

Anticipatory bail पर फैसला करते समय कोर्ट को आरोप की प्रकृति, गंभीरता, आरोपी का पिछला रिकॉर्ड, आरोपी के न्याय से भागने की संभावना पर भी विचार करना चाहिए. कोर्ट को आरोपी के खिलाफ उपलब्ध सभी सामग्री का सावधानीपूर्वक मूल्यांकन करना चाहिए और आरोपी की सटीक भूमिका पर भी विचार किया जाना चाहिए. सुप्रीम कोर्ट द्वारा सिद्धाराम सतलिंगप्पा म्हेत्रे बनाम महाराष्ट्र राज्य, (2011) 1 SCC 694 के मामले में दी गयी इस व्यवस्था पर भरोसा करते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस डॉ गौतम चौधरी ने फरार घोषित महिला की अग्रिम जमानत मंजूर कर ली है.

Anticipatory bail पर फैसला करते समय कोर्ट आरोप की गंभीरता प्रकृति पर भी विचार करे, 50 हजार के मुचलके पर महिला को  जमानत

जस्टिस चौधरी ने फैसला सुनाते हुए कहा कि, कानून के उपरोक्त प्रस्ताव पर विचार करते हुए कि ऐसा नहीं है कि सभी मामलों में Anticipatory bail देने के आवेदन पर विचार करने पर पूरी तरह से रोक होगी. जब महिला के खिलाफ 82 और 83 की कार्रवाई की गयी तब वह गर्भवती थी और संबंधित अदालत के सामने पेश होने में असमर्थ थी. इसी के चलते कोर्ट ने उसे अग्रिम जमानत देने के लिए एक उपयुक्त मामला माना.

मामला उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले के कीरतपुर थाना क्षेत्र का है. इस थाने में केस क्राइम नंबर 472 ऑफ 2023, धारा 316, 420, 504, 120-B आई.पी.सी. और मेडिकल काउंसिल एक्ट, 1956 की धारा 15(2), 15(3) दर्ज किया गया था. Anticipatory bail की मांग में हाई कोर्ट पहुंची मोनिका नामक महिला का पक्ष रख रहे सीनियर एडवोकेट ने बताया कि आवेदक सह-आरोपी के अस्पताल में दाई नर्स है और कथित घटना से उसका कोई लेना-देना नहीं है.

शिकायत दर्ज होने के बाद आवेदक को संबंधित ट्रायल कोर्ट द्वारा अंतरिम Anticipatory bail दी गई थी. जब ट्रायल कोर्ट ने आवेदक की Anticipatory bail याचिका खारिज कर दी, तो उसने इस कोर्ट में क्रिमिनल मिसलेनियस Anticipatory bail आवेदन संख्या 9657 ऑफ 2024 दायर किया, जिसमें इस कोर्ट की एक समन्वय पीठ ने 17.10.2024 के आदेश द्वारा अगली सुनवाई की तारीख तक अंतरिम सुरक्षा प्रदान की थी. इस Anticipatory bail याचिका को इस कोर्ट ने 25.09.2025 के आदेश द्वारा खारिज कर दिया था.अब आवेदक ने चार्जशीट जमा होने के बाद यह दूसरा अग्रिम जमानत आवेदन दायर किया.

आवेदक के वकील ने कोर्ट को बताया कि मुखबिर द्वारा धारा 156(3) के तहत दायर पिछले चार आवेदनों में आवेदक के खिलाफ कोई आरोप नहीं है. एफआईआर खुद ही डेढ़ साल से ज्यादा देरी से दर्ज की गई है. मुख्य आरोप सह-आरोपी पर है और आवेदक को इस मामले में सिर्फ इसलिए फंसाया गया है क्योंकि वह घटना की कथित तारीख को उक्त अस्पताल में सह-आरोपी की देखरेख में नर्स के तौर पर काम कर रही थी.

Anticipatory bail आवेदन पर विचार करने का कोई अवसर नहीं है और इसे खारिज किया जाना चाहिए

शुरू में ही कोर्ट को मुखबिर के वकील ने बताया कि आवेदक के खिलाफ पहले ही गैर-जमानती वारंट और धारा 82 और 83 सीआरपीसी के तहत उद्घोषणा जारी की जा चुकी है, इसलिए, वर्तमान Anticipatory bail आवेदन पर विचार करने का कोई अवसर नहीं है और इसे खारिज किया जाना चाहिए.

इसके जवाब में आवेदक के वकील ने कहा कि आवेदक के खिलाफ पहले ही गैर-जमानती वारंट और सीआरपीसी की धारा 82/83 के तहत उद्घोषणा जारी की जा चुकी है. चार्जशीट 09.11.2024 को दायर की गई थी, जिस पर 19.05.2025 को संज्ञान लिया गया और 10.10.2025 को उसके खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी किया गया.

उस समय आवेदक गर्भवती थी और उसने 06.10.2025 को एक लड़के को जन्म भी दिया था. मामले को संज्ञान लेने के बाद आवेदक ने हर तारीख पर अपनी व्यक्तिगत उपस्थिति से छूट के लिए कई आवेदन भी दिए क्योंकि वह गर्भवती थी और ट्रायल कोर्ट के सामने पेश होने में असमर्थ थी, लेकिन विद्वान ट्रायल कोर्ट ने ऐसे आवेदन पर विचार किए बिना आवेदक के खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी कर दिया गया.

ऐसा करना सुप्रीम कोर्ट द्वारा आशा दुबे बनाम मध्य प्रदेश राज्य (आपराधिक अपील संख्या 4564/2024, 12.11.2024 को तय) के मामले में दिए गए फैसले के भी खिलाफ है. कोर्ट ने आदेश दिया कि आवेदक- मोनिका की गिरफ्तारी की स्थिति में जो उपरोक्त मामले में शामिल है, उसे ट्रायल खत्म होने तक Anticipatory bail पर रिहा किया जाएगा. वह संबंधित अदालत की संतुष्टि के अनुसार 50,000रुपये का व्यक्तिगत मुचलका और इतनी ही राशि के दो जमानतदार पेश करेगी.

  • कोर्ट ने लगायी शर्तें :-
  • (i) आवेदक जब भी आवश्यक हो, अदालत की कार्यवाही में शामिल होगी और कोई अनावश्यक स्थगन नहीं मांगेगी.
  • (ii) आवेदक प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से मामले के तथ्यों से परिचित किसी भी व्यक्ति को कोई प्रलोभन, धमकी या वादा नहीं करेगी ताकि उसे ऐसे तथ्यों को अदालत या किसी पुलिस अधिकारी को बताने से रोका जा सके या सबूतों के साथ छेड़छाड़ न करे.
  • (iii) आवेदक ट्रायल के दौरान सहयोग करेगी और जमानत की स्वतंत्रता का दुरुपयोग नहीं करेगी.
  • किसी भी शर्त का उल्लंघन करने पर, संबंधित अदालत आवेदक को दी गई Anticipatory bail रद्द करने के लिए उचित आवेदन दाखिल करने के लिए स्वतंत्र होगी.

CRIMINAL MISC. ANTICIPATORY BAIL APPLICATION U/S 482 BNSS No.- 10241 of 2025: Monika vs. State of U.P. and Another

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