Accused को समन करना या उसके खिलाफ संज्ञान लेना यांत्रिक प्रक्रिया नहीं, इसके लिए न्यायिक विवेक का पूरी तरह से प्रयोग जरूरी
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने आपराधिक मामलों में समनिंग आदेश और निष्पक्षता की नई परिभाषा दी

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि किसी भी Accused को समन करना या उसके खिलाफ संज्ञान लेना कोई यांत्रिक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि इसके लिए न्यायिक विवेक का पूरी तरह से प्रयोग होना आवश्यक है. यह दूरगामी फैसला जस्टिस संतोष राय की बेंच ने आपराधिक विविध आवेदन संख्या 15553/2017 (राज कुमार और अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य) की सुनवाई के बाद सुनाया है.
कोर्ट ने Accused की याचिका को खारिज कर दिया और निचली अदालत को निर्देश दिया कि वह मुकदमे की कार्यवाही को पूरी तेजी के साथ, अधिमानतः एक वर्ष के भीतर, प्राथमिकता के आधार पर पूरा करे. यह पूरा मामला वर्ष 2013 का है, जो जनपद जालौन के उरई कोतवाली क्षेत्र के अंतर्गत गढ़ार गांव से जुड़ा हुआ है.
वादी नरेश कुमार दोहरे ने आरोप लगाया था कि 11 अक्टूबर 2013 की शाम को Accused लाठी, डंडे और कुल्हाड़ी से लैस होकर उनके घर में घुस आए और उनके साथ मारपीट की. विरोध करने पर उसे जातिसूचक गालियां देते हुए गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी दी गई. प्रारंभिक स्तर पर पुलिस द्वारा मामला दर्ज न किए जाने पर, वादी ने दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 156(3) के तहत मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, जालौन के समक्ष गुहार लगाई, जिसके बाद न्यायालय के आदेश पर Accused के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई.
पुलिस ने विवेचना के जरिए तथ्य जुटाये और पर्याप्त साक्ष्य न मिलने पर कोर्ट में 29 जनवरी 2014 को फाइनल रिपोर्ट दाखिल कर दी. इसके खिलाफ वादी ने विरोध याचिका दायर की, जिसे अदालत ने एक शिकायत के रूप में दर्ज किया और प्रारंभिक साक्ष्य के आधार पर 28 फरवरी 2017 को विशेष न्यायाधीश (SC/ST Act) जालौन ने Accused को समन जारी कर दिया.
Accused के अधिवक्ताओं ने तर्क दिया कि निचली अदालत का समन आदेश पूरी तरह से गैर-जिम्मेदाराना
अदालत में सुनवाई के दौरान Accused के अधिवक्ताओं ने तर्क दिया कि निचली अदालत का समन आदेश पूरी तरह से गैर-जिम्मेदाराना और बिना किसी ठोस आधार के पारित किया गया है. पुलिस की विवेचना में Accused के खिलाफ आरोप झूठे पाए गए थे और स्वतंत्र गवाहों के बयानों को नजरअंदाज किया गया. सुप्रीम कोर्ट के कई पुराने निर्णयों का हवाला देते हुए कहा गया कि यदि प्रारंभिक प्रक्रिया ही त्रुटिपूर्ण है, तो आगे की सभी कार्यवाहियां स्वतः निरर्थक हो जाती हैं.
दूसरी ओर, राज्य के अपर महाधिवक्ता (A.G.A.) और विपक्षी संख्या 2 के वकील ने इसका कड़ा विरोध करते हुए कहा कि Accused के खिलाफ समन आदेश पूरी तरह से तर्कसंगत और साक्ष्यों पर आधारित है. इसके अलावा, इस मामले में पहले की चार्जशीट और ट्रायल की कार्यवाही काफी आगे बढ़ चुकी है, इसलिए इस स्तर पर हस्तक्षेप करने की कोई आवश्यकता नहीं है.

जस्टिस संतोष राय ने अपने निर्णय में सुप्रीम कोर्ट के कई ऐतिहासिक फैसलों-जैसे पेप्सी फूड्स लिमिटेड बनाम विशेष न्यायिक मजिस्ट्रेट, भूषण कुमार बनाम दिल्ली राज्य और मेहमूद उल रहमान बनाम खाजिर मोहम्मद टुंडा-का हवाला दिया:
न्यायिक विवेक की अनिवार्यता: अदालत ने दोहराया कि किसी भी नागरिक को आपराधिक अदालत में Accused के रूप में तलब करना एक गंभीर मामला है. यह किसी की प्रतिष्ठा और आत्मसम्मान को प्रभावित करता है. इसलिए, मजिस्ट्रेट को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उपलब्ध साक्ष्य प्रथम दृष्टया अपराध का गठन करते हैं या नहीं.
विस्तृत कारणों की अनिवार्यता नहीं: हालांकि समन आदेश में बहुत लंबे और विस्तृत कारणों का होना अनिवार्य नहीं है, लेकिन आदेश से यह स्पष्ट होना चाहिए कि मजिस्ट्रेट ने सामग्री का अवलोकन कर अपने न्यायिक मन का प्रयोग किया है.
ट्रायल की वर्तमान स्थिति: अदालत ने इस बात पर भी गौर किया कि इस मामले में लगभग नौ साल बीत चुके हैं, चार्ज फ्रेम किया जा चुका है और गवाहों की जिरह (cross-examination) चल रही है. ऐसे में मामले को बीच में रोकना न्यायहित में नहीं होगा.
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि निचली अदालत के आदेश में कोई विधिक त्रुटि या अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन नहीं पाया गया है. अदालत ने आवेदकों की याचिका को खारिज कर दिया और निचली अदालत को निर्देश दिया कि वह मुकदमे की कार्यवाही को पूरी तेजी के साथ, अधिमानतः एक वर्ष के भीतर, प्राथमिकता के आधार पर पूरा करे. इस फैसले से एक बार फिर स्पष्ट हो गया है कि आपराधिक मामलों में प्रथम दृष्टया साक्ष्यों की संतुष्टि के बाद कानून अपनी तय प्रक्रिया के तहत ही आगे बढ़ेगा.