Child witness के बयान पर सजा सुनाया जाना संभव लेकिन संदेह होने पर भरोसेमंद सबूतों का महत्व ज्यादा, 41 साल बाद हत्या के आरोप बरी

कोई Child witness तथ्यों के बारे में बयान देने में सक्षम है, तो उसके बयान के आधार पर सजा सुनाई जा सकती है. लेकिन सावधानी के नियम के तौर पर कोर्ट को रिकॉर्ड पर मौजूद अन्य भरोसेमंद सबूतों से उसके बयान की पुष्टि देखनी चाहिए. कम उम्र होने के कारण Child witness आसानी से प्रभावित होने वाला गवाह होता है, जिसे आसानी से सिखाया-पढ़ाया ढाला या प्रभावित किया जा सकता है.
सुप्रीम कोर्ट द्वारा ‘दत्तू रामराव सखारे बनाम महाराष्ट्र राज्य’ (1997) 5 SCC 341 मामले में दिये गये इस फैसले को आधार बनाकर जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस जय कृष्ण उपाध्याय की बेंच ने मिर्जापुर के राम कुंवर और एक अन्य की तरफ से दाखिल क्रिमिनल अपील मंजूर कर ली और आरोपितों को दोषमुक्त कर दिया.
तथ्यों और साक्ष्यों को परखने के बाद कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष अपीलकर्ताओं के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 302/34 और 201/34 के तहत आरोपों को उचित संदेह से परे साबित करने में बुरी तरह नाकाम रहा है. इसके आधार पर कोर्ट ने अपील मंजूर करते हुए मिर्जापुर के III एडिशनल सेशंस जज द्वारा सेशंस ट्रायल नंबर 32/1987 (स्टेट बनाम राम कुंवर और अन्य) में दिए गए फैसले और आदेश को रद्द कर दिया है.
यह क्रिमिनल अपील राम कुंवर और एक अन्य की तरफ से अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, मिर्जापुर द्वारा सत्र परीक्षण संख्या 32/1987 (राज्य बनाम राम कुंवर और अन्य) में पारित फैसले और आदेश के खिलाफ दायर की गई थी. अपीलकर्ताओं को IPC की धारा 302 के साथ धारा 34 के तहत आजीवन कारावास और IPC की धारा 201/34 के तहत पांच साल की कठोर कैद की सजा सुनाई गई थी.
तथ्यों के अनुसार मृतक श्रीमती शनिचारी निवासी ग्राम बिशनपुरा, थाना बलुआ, जिला वाराणसी आरोपी राम केवल की बुआ थीं. घटना की रात आरोपी राम कुंवर और राम केवल श्रीमती शनिचारी को उनकी दो नाबालिग बेटियों (Child witness) कुमारी प्रमिला और कुमारी लीला के साथ ग्राम बिशनपुरा से ग्राम बहरानगंज ले गए. मिर्जापुर-वाराणसी मार्ग के पास एक सुनसान जगह पर उन पर चाकू से हमला करके हत्या कर दी गयी. इसके बाद महिला के शव को झाड़ियों में फेंक दिया. दोनों नाबालिग लड़कियों (Child witness) को घटनास्थल पर ही छोड़कर आरोपी भाग गए.
22 अक्टूबर 1985 को नंदू लाल ने लावारिस बच्चियों (Child witness) को चुनार थाना को दी. उसी शाम मृतका का शव नाले के पास मिला. घटना के संबंध में चुनार थाने में ज़ुबानी रिपोर्ट दर्ज की गई. विवचेना के बाद पुलिस ने कोर्ट में दो लोगों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल कर दी. इसमें दोनों पर IPC की धारा 302/34 और 201/34 के तहत अपराध के लिए मुकदमा चलाने का आग्रह किया गया था. ट्रायल कोर्ट ने पाया कि अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ आरोपों को बिना किसी उचित संदेह के साबित करने में पूरी तरह सफल रहा है और अपीलकर्ताओं को दोषी ठहराया और सजा सुनाई.
हाई कोर्ट में अपीलकर्ताओं के वकील ने कहा कि ट्रायल कोर्ट का दोषी ठहराने वाला फैसला और आदेश गलत और कानून की नजर में टिकने लायक नहीं है, क्योंकि यह पूरी तरह से एक अकेले Child witness के बिना पुष्टि किए गए, विरोधाभासी और सिखाए-पढ़ाए गए बयान पर आधारित है. तर्क दिया गया कि अभियोजन पक्ष अपीलकर्ताओं के अपराध को बिना किसी उचित संदेह के साबित करने में बुरी तरह विफल रहा और ट्रायल कोर्ट ने अभियोजन की कहानी में गंभीर विरोधाभासों और कमियों को नजरअंदाज करने में गलती की.

वकील ने कहा कि पूरा मामला कुमारी प्रमिला के बयान पर टिका है, जो कथित घटना के समय 5 से 6 साल की बच्ची (Child witness) थी. उसका बयान बिना कोई शपथ दिलाए चार साल की लंबी देरी के बाद दर्ज किया गया था. अधिवक्ता ने इंडियन एविडेंस एक्ट की धारा 27 के तहत अपराध में इस्तेमाल हथियार की कथित बरामदगी पर सवाल उठाए. कहा कि कथित बरामदगी के समय कोई स्वतंत्र गवाह मौजूद नहीं था और सील किए गए चाकू को कभी भी केमिकल जांच के लिए नहीं भेजा गया, जिससे यह साबित नहीं हो सका कि बरामद हथियार पर मिला खून मृतक का ही था.
राज्य की ओर से पेश हुए अतिरिक्त सरकारी वकीलों ने सजा के फैसले का बचाव करते हुए कहा कि निचली अदालत ने दोषी ठहराने से पहले रिकॉर्ड पर मौजूद सबूतों का बारीकी से मूल्यांकन किया था. Child witness कुमारी प्रमिला की गवाही स्वाभाविक, सच्ची और भरोसा जगाने वाली थी. तर्क दिया कि जिस बच्चे (Child witness) ने अपनी ही माँ की भयानक हत्या देखी हो, वह स्वाभाविक रूप से गंभीर मानसिक सदमे और आघात से गुजरेगा, जिससे उसकी कुछ समय की चुप्पी और बयान में मामूली विसंगतियों की पूरी तरह व्याख्या हो जाती है.
Child witness के बयान की पुष्टि की जरूरत वाला ‘सावधानी का नियम’ कानून का कोई पक्का नियम नहीं है. अगर कोर्ट को Child witness का अकेला और बिना पुष्टि वाला बयान भरोसेमंद लगता है तो उस पर कानूनी तौर पर सजा सुनाई जा सकती है. दोनों पक्षों के तर्कों को सुनने के बाद कोर्ट ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने ‘प्रदीप बनाम हरियाणा राज्य’ (2023 SCC OnLine SC 811) मामले में सावधानी बरतने का नियम दोहराया था.
कोर्ट ने कहा कि अगर कोर्ट को लगता है कि Child witness को कुछ सिखाया-पढ़ाया गया था या उसके बयान में बिना किसी स्वतंत्र पुष्टि के अहम विरोधाभास हैं, तो उस आधार पर किसी को दोषी ठहराना बहुत जोखिम भरा है. इस मामले में Child witness कुमारी प्रमिला के सबूत पर सुरक्षित रूप से भरोसा नहीं किया जा सकता. घटना के समय वह सिर्फ 5-6 साल की थी और उसका बयान घटना के चार साल बाद कोर्ट में दर्ज किया गया था.
साफ दिखाता है कि Child witness का बयान स्वाभाविक नहीं है और ऐसा लगता है कि उसे सिखाया-पढ़ाया गया था
सबसे अहम बात यह है कि घटना के बाद बच्चे (Child witness) का व्यवहार बिल्कुल असामान्य था. अगले ही दिन कॉन्स्टेबल पुरुषोत्तम पांडे से मिलने और राम प्रीत सिंह के साथ रहने के बावजूद, उसने 24 घंटे से ज्यादा समय तक अपनी माँ की हत्या के बारे में किसी को कुछ नहीं बताया. उसने पहली बार इस बारे में तब बात की जब पुलिस ने उसका बयान दर्ज किया. इतनी लंबी और बिना वजह की चुप्पी, और साथ ही आरोपी की पहचान को लेकर उसका कन्फ्यूजन, साफ दिखाता है कि Child witness का बयान स्वाभाविक नहीं है और ऐसा लगता है कि उसे सिखाया-पढ़ाया गया था.
एक और गंभीर कमी डॉक्टर की मेडिकल गवाही में है, जिन्होंने मृतक का पोस्टमार्टम किया था. कोर्ट ने कहा कि यह ध्यान रखना जरूरी है कि सिर्फ 6 इंच के ब्लेड वाले छोटे चाकू से इतना बड़ा और गहरा घाव करना, जिसकी लंबाई 36 सेमी और चौड़ाई 14 सेमी हो और जो हड्डी तक गहरा हो, शारीरिक रूप से असंभव है.
कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष अपीलकर्ताओं द्वारा मृतक एक गरीब महिला—की हत्या करने का कोई मकसद साबित करने में नाकाम रहा. ठोस प्रत्यक्ष चश्मदीद गवाही वाले मामलों में मकसद गौण हो सकता है, लेकिन मौजूदा मामले में, जहाँ चश्मदीद गवाह (Child witness) पर बहुत शक है और घटनाक्रम की कड़ियाँ टूटी हुई हैं, मकसद का पूरी तरह से न होना बचाव पक्ष के पक्ष में संदेह को और मजबूत करता है.