शराब पीने के आरोप में 2010 में Dismiss सिपाही बहाल, कोर्ट ने कहा: सजा असंगत, नये सिरे से कार्रवाई की छूट

अनुपस्थिति के आरोप में किसी कर्मचारी को सेवा से Dismiss करने का फैसला लेते समय जिम्मेदार अफसरों को सम्पूर्ण परिस्थितियों का आकलन करना चाहिए. खासतौर पर उन फैक्ट्स पर जिसके दम पर आरोप की पुष्टि की जा रही है. दण्ड आदेश पर दर्ज तारीखों में ही गलती पकड़ी जाती है तो यह गंभीर मामला है. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गोरखपुर पुलिस लाइन में तैनात रहे सिपाही संजय कुमार चौहान को सेवा से Dismiss करने के आदेश को रद्द कर दिया है. जस्टिस अनीश कुमार गुप्ता की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया.
याची अधिवक्ता सुधांशु का कहना था कि जनवरी 2010 में सिपाही पर आरोप लगा था कि वह ड्यूटी में शराब पीकर एक वाद-विवाद प्रतियोगिता के दौरान अभद्र व्यवहार कर रहा था, साथ ही अनधिकृत रूप से अनुपस्थित रहने का भी आरोप था. विभागीय जांच में दोष सिद्ध मानते हुए 29 अक्टूबर 2010 को उसे Dismiss कर दिया गया था.
Dismiss किये जाने के बाद आरक्षी ने अपनी बातों को रखते हुए अपील दाखिल की. यह अपील भी खारिज कर दी गयी. इसके बाद उसने रिवीजन दाखिल कर दिया गया. यहां भी उसके द्वारा प्रस्तुत किये गये तथ्यों पर कोई सुनवाई नहीं हुई और उसकी बर्खास्तगी की सजा बरकरार रखी गयी. इसके बाद उसने रिट याचिका दाखिल करके राहत की मांग की.
बर्खास्तगी (Dismiss) की सजा को कोर्ट ने “अत्यधिक असंगत” करार दिया
कोर्ट ने कहा कि मेडिकल जांच रिपोर्ट, जिसके आधार पर शराब सेवन का आरोप लगाया गया, कभी सिपाही को उपलब्ध ही नहीं कराई गई और न ही जांच कार्यवाही में इसे साबित किया गया. Dismiss किये जाने के लिए अनुपस्थिति का आरोप 3 जनवरी से लगाया गया था, जबकि घटना 4 जनवरी की थी, जिस दिन सिपाही मौजूद था. इन विसंगतियों के बावजूद दी गई बर्खास्तगी (Dismiss) की सजा को कोर्ट ने “अत्यधिक असंगत” करार दिया.
कोर्ट ने बर्खास्तगी (Dismiss) आदेश तथा अपीलीय व पुनरीक्षण आदेशों को रद्द कर मामला अनुशासनिक प्राधिकारी को तीन महीने में नए सिरे से निर्णय के लिए वापस भेज दिया. साथ ही निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता को दो सप्ताह के भीतर सेवा में बहाल किया जाए, हालांकि अन्य लाभों का निर्णय नई कार्यवाही पर निर्भर करेगा.
जिलाधिकारी बस्ती के खिलाफ अवमानना याचिका निस्तारित,आदेश का किया पालन, मामला हुआ निष्प्रभावी

मामले की सुनवाई जस्टिस विकास बुधवार की एकलपीठ ने की. सुनवाई के दौरान राज्य विधि अधिकारी अभिनव प्रसाद ने जिलाधिकारी, बस्ती के हस्ताक्षर से 2 सितंबर 2026 को जारी निर्देश प्रस्तुत किए, जिनसे यह स्पष्ट हुआ कि याचिकाकर्ता का नाम अब राजस्व अभिलेखों में दर्ज हो चुका है. इसे देखते हुए न्यायालय ने पाया कि अवमानना याचिका अब निष्प्रयोज्य हो चुकी है. याचिकाकर्ता को यह छूट दी गई कि यदि भविष्य में आवश्यकता पड़े तो वह पुनः न्यायालय का दरवाजा खटखटा सकता है.
न्यायालय ने यह भी निर्देश दिया कि प्रस्तुत निर्देशों की प्रति याचिकाकर्ता के अधिवक्ता नित्य प्रकाश तिवारी को उपलब्ध कराई जाए, तथा दाखिल निर्देशों को रिकॉर्ड पर लेते हुए ‘परिशिष्ट-A’ के रूप में चिन्हित किया जाए.याची प्रबंध समिति का कहना था कि विद्यालय 50 वर्षो से संचालित है. जिलाधिकारी बस्ती ने आयुष महाविद्यालय के लिए 25 मई 26 को जारी आदेश 2 जून 26 को निरस्त कर दिया है. इसके बावजूद याची विद्यालय का नाम भूमि पर दर्ज करने के आदेश का पालन नहीं किया गया तो यह अवमानना याचिका दाखिल की गई थी.