Incident की तारीख पर आरोपी की उम्र ही यह तय करने के लिए निर्णायक है कि वह नाबालिग कानून का लाभ पाने का हकदार है या नहीं, हाई कोर्ट ने 46 साल पुराने केस में दी आरोपी को राहत

बेंच ने Incident के समय नाबालिग की अपील आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए ट्रायल कोर्ट द्वारा अपीलकर्ता को दोषी ठहराए जाने के फैसले को बरकरार रखा है लेकिन सजा को रद्द करते हुए उसे पहले ही काटी जा चुकी सजा को पर्याप्त ठहराया है. बेंच ने कहा कि अपीलकर्ता को और कोई सजा नहीं काटनी होगी. कोर्ट ने उसे रिहा करने का आदेश दिया है.
यह क्रिमिनल अपील गोरखपुर के एडिशनल डिस्ट्रिक्ट एंड सेशंस जज द्वारा सुनाये गये फैसले और आदेश के खिलाफ दायर की गई थी. इस फैसले में अपीलकर्ता को भारतीय दंड संहिता की धारा 307 के तहत दोषी पाये जाने पर सात साल की कठोर कैद की सजा सुनाई गई थी.
Incident से लगभग दो हफ्ते पहले कुछ किताबों को लेकर उनके बीच झगड़ा हुआ था
तथ्यों के अनुसार आरोपी रंगलाल बारी और लाल साहब कक्षा 9 के छात्र और सहपाठी थे. Incident से लगभग दो हफ्ते पहले कुछ किताबों को लेकर उनके बीच झगड़ा हुआ था. कुछ दिनों बाद उसने कथित तौर पर उससे एक और किताब ली, जिससे फिर से झगड़ा हुआ. आरोप है कि Incident 16 और 17 मार्च 1980 की रात हुआ जब लाल साहब अपने खलिहान में सो रह था तभी उस पर चाकू से हमला किया गया. लाल साहब ने शोर मचाया तो उसके चाचा चाचा राम प्यारे, अभिमन्यु उर्फ मन्नू और अन्य लोग मौके पर पहुँचे. गवाहों को देखकर आरोपी चाकू लेकर मौके से भाग गया.
इस Incident के संबंध में थाना बड़हलगंज में केस क्राइम नंबर 48/1980 के तहत FIR राम प्यारे ने दर्ज कराई थी. उसी दिन हुई मेडिकल जांच में छाती, सिर, बांह और हाथ पर 11 कटे हुए घाव मिले. पुलिस ने जांच के बाद चार्जशीट कोर्ट में पेश की. अभियोजन पक्ष के सभी गवाहों से पूछताछ की गई और उन्होंने मामले का समर्थन किया. ट्रायल कोर्ट ने Incident के संबंध में आरोपी को IPC की धारा 307 के तहत अपराध का दोषी ठहराया. आरोपी को IPC की धारा 307 के तहत सात साल की सजा सुनाई.
अपीलकर्ता के वकील ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने अपीलकर्ता की उम्र उसके शारीरिक रूप-रंग के आधार पर तय करने में गंभीर गलती की है. मैट्रिकुलेशन सर्टिफिकेट, जिसमें जन्म तिथि 14.02.1964 दर्ज है, एक जरूरी और भरोसेमंद दस्तावेज था और अगर इसे माना जाए, तो घटना के समय अपीलकर्ता की उम्र सिर्फ 16-17 साल थी. नाबालिग होने का सवाल अपराध करने के समय आरोपी की उम्र के आधार पर तय किया जाना चाहिए न कि सिर्फ शारीरिक रूप-रंग के आधार पर.
उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों – जितेंद्र सिंह उर्फ बब्बू सिंह और अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, (2013) 11 SCC 193, और हरि राम बनाम राजस्थान राज्य और अन्य, (2009) 13 SCC 211 – का हवाला दिया. जितेंद्र सिंह मामले में, सुप्रीम कोर्ट ने दोषी ठहराए जाने के फैसले को तो बरकरार रखा, लेकिन निर्देश दिया कि अपीलकर्ता, जिसे Incident के समय नाबालिग पाया गया था, के मामले को जुवेनाइल जस्टिस एक्ट के तहत देखा जाए.
हरि राम मामले में, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि नाबालिग होने के दावे पर Incident के संबंध में के समय की उम्र के आधार पर विचार किया जाना चाहिए और जुवेनाइल जस्टिस कानून का लाभ 2000 के एक्ट के बनने से पहले किए गए अपराधों के मामले में भी दिया जा सकता है. A.G.A. ने अपील का विरोध किया और कहा कि अभियोजन पक्ष के गवाहों ने लगातार घटना का समर्थन किया है और ट्रायल कोर्ट ने सही तरीके से उनके सबूतों पर भरोसा किया है.
तर्क दिया कि सिर्फ मैट्रिकुलेशन सर्टिफिकेट पेश करने से अपीलकर्ता की उम्र साबित नहीं हुई और उसके शारीरिक रूप-रंग को देखते हुए, ट्रायल कोर्ट ने सही तरीके से उसकी उम्र लगभग 20-21 साल आंकी. इसलिए, दोषी ठहराने के फैसले या ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई सजा में किसी बदलाव की जरूरत नहीं है.
दोनों पक्षों की तरफ से पेश की गयी दलीलों को सुनने के बाद बेंच ने कहा कि अपील करने वाले ने अपनी उम्र के सबूत के तौर पर अपना मैट्रिकुलेशन सर्टिफिकेट पेश किया है जिस पर उसकी जन्मतिथि 14.02.1964 दर्ज है. रिकॉर्ड में ऐसा कोई सबूत नहीं है जिससे पता चले कि सर्टिफिकेट जाली या बनावटी है. इससे उसे माइनर मानाते हुए मामले को जुवेनाइज जस्टिस बोर्ड को भेज देना चाहिए था.
बेंच ने कहा कि शारीरिक रूप-रंग से उम्र के बारे में कुछ संकेत मिल सकते हैं, लेकिन जहाँ जन्मतिथि के बारे में भरोसेमंद दस्तावेजी सबूत मौजूद हों, वहाँ केवल शारीरिक रूप-रंग के आधार पर ऐसे दस्तावेजी सबूत को खारिज नहीं किया जा सकता. सर्टिफिकेट में दर्ज जन्मतिथि के आधार पर, Incident की तारीख पर अपील करने वाले की उम्र 18 साल से कम थी.
इसलिए, वह कानून के उल्लंघन के मामले में एक नाबालिग था और इस मामले पर लागू होने वाले ‘जुवेनाइल जस्टिस’ कानून का लाभ पाने का हकदार था. नाबालिग होने के निष्कर्ष का मतलब यह जरूरी नहीं है कि दोषसिद्धि को ही रद्द कर दिया जाए.
जितेंद्र सिंह मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अपील करने वाले को नाबालिग पाए जाने के बावजूद उसकी सजा को बरकरार रखा, लेकिन यह निर्देश दिया था कि सजा के मामले को ‘जुवेनाइल जस्टिस एक्ट’ (किशोर न्याय अधिनियम) के अनुसार देखा जाए. इसलिए, सवाल यह है कि अब अपील करने वाले को क्या राहत दी जानी चाहिए. कोर्ट ने कहा कि फैसलों से यह साफ है कि सिर्फ इस बात से कि Incident के समय आरोपी नाबालिग था, यह मतलब नहीं निकलता कि उसे हर मामले में अपने-आप रिहा कर दिया जाएगा.
कोर्ट को हर मामले की परिस्थितियों पर विचार करना होता है, जिसमें फैसले के समय आरोपी की उम्र, उसने पहले ही कितनी सजा काट ली है और क्या इतने समय बाद उसे जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड या स्पेशल होम भेजने से कोई फायदा होगा. मौजूदा मामले में, अपीलकर्ता Incident के समय नाबालिग था. वह बालिग हो चुका है और ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई सजा में से काफी समय जेल में बिता चुका है. घटना 1980 की है और तब से काफी समय बीत चुका है. इतने लंबे समय के बाद आदेश पारित करने के लिए अपीलकर्ता को जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड भेजने से कोई फायदा नहीं होगा.
Incident के बाद सजा के तौर पर उसने जो समय पहले ही काट लिया है, उस पर भी विचार किया जाना जरूरी है. अपीलकर्ता के खिलाफ दर्ज सजा को बरकरार रखा जाना चाहिए, लेकिन उसे सुनाई गई सजा को रद्द कर दिया जाना चाहिए. उसने जो समय पहले ही काट लिया है, वह न्याय के मकसद को पूरा करेगा.