निलंबन काल में अटैचमेंट प्लेस पर अटेंडेंस न देना, जांच में सहयोग न करने वाले को Teacher भत्ते व पेंशन का हक नहीं

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मथुरा जिले के एक सेवानिवृत्त Teacher कांता प्रसाद की उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें उन्होंने 1992 में हुए अपने निलंबन को चुनौती देते हुए वेतन, पेंशन और अन्य सेवानिवृत्ति लाभों की मांग की थी. जस्टिस श्रीमती मंजू रानी चौहान की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया. कांता प्रसाद मथुरा के सरखंड खेड़ा स्थित प्राथमिक विद्यालय में Teacher के पद पर कार्यरत थे.
10 फरवरी 1992 को जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी, मथुरा ने उन्हें निलंबित कर दिया था. आरोप था कि Teacher ने विद्यालय का चार्ज अपने उत्तराधिकारी को नहीं सौंपा और कैश बुक, पासबुक व चेक बुक जैसे महत्वपूर्ण दस्तावेज अपने पास रखे रहे. बलदेव थाने में भारतीय दंड संहिता की धारा 409 के तहत एफआईआर दर्ज हुआ. 1997 में मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, मथुरा ने Teacher को दोषी करार देते हुए एक साल की सजा और 2,000 रुपये जुर्माना लगाया. अपील और पुनरीक्षण, दोनों में यह फैसला बरकरार रहा. पुनरीक्षण याचिका 31 मार्च 2018 को खारिज हुई.
Teacher कांता प्रसाद 30 जून 2000 को 60 वर्ष की आयु में सेवानिवृत्त हो गए, लेकिन तब तक भी उनका निलंबन बहाल नहीं हुआ था. सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने कई प्रत्यावेदन दिए और सूचना के अधिकार के तहत आवेदन भी किया, लेकिन विभाग की ओर से लंबे समय तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई.
1 जुलाई 2020 को जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी और चार सदस्यीय समिति ने उनके सभी प्रत्यावेदन खारिज करते हुए आदेश जारी किया कि दोषसिद्धि और निलंबन अवधि में विद्यालय में उपस्थिति दर्ज न कराने के कारण Teacher को निलंबन भत्ता व पेंशन का लाभ नहीं दिया जा सकता. हालांकि जीपीएफ व सामूहिक बीमा की राशि का भुगतान कर दिया गया था.
सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि याची Teacher न तो स्थानांतरण के बाद निर्धारित स्थान पर उपस्थित हुए और न ही उन्होंने विभागीय जांच में सहयोग किया. कोर्ट ने कहा कि “काम नहीं तो वेतन नहीं” का सिद्धांत इस मामले में प्रासंगिक है, और Teacher यह साबित नहीं कर सके कि वे कार्य पर लौटने को इच्छुक थे मगर विभाग ने उन्हें रोका.
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि पुनरीक्षण न्यायालय के आदेश को “सम्मानजनक दोषमुक्ति” नहीं माना जा सकता, इसलिए Teacher को समस्त अवधि का वेतन पाने का स्वतः अधिकार प्राप्त नहीं हो जाता. कोर्ट ने कहा कि लंबे निलंबन का अर्थ यह नहीं कि कर्मचारी को पूरा वेतन पाने का अधिकार मिल जाता है. कोर्ट ने कहा कि विभाग के 1 जुलाई 2020 के आदेश में कोई कानूनी खामी नहीं है और याची अपने सेवाकाल में शेष किसी भी लाभ का हकदार नहीं है क्योंकि जीपीएफ और बीमा राशि पहले ही भुगतान की जा चुकी है.
1987 से वेतन न मिलने के मामले में Teacher की याचिका खारिज, नियुक्ति की वैधता पर उठे सवाल

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने परवेज आलम व अन्य मदरसा अध्यापकों (Teacher) व स्टाफ की 1987 से बकाया वेतन भुगतान की मांग में दाखिल याचिका खारिज कर दी है. जस्टिस मंजू रानी चौहान की एकल पीठ ने यह आदेश दिया. आजमगढ़ स्थित मदरसा जमीयतुल कुरैश जलालंधरी में परवेज आलम, आफताब हुसैन, अरशद हुसैन (सहायक अध्यापक), मोहम्मद जावेद (क्लर्क) और मोहम्मद मुस्तफा (चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी) ने 1981 से 1987 के बीच नियुक्ति पाने का दावा किया था.
उनका कहना था कि मई 1987 तक उन्हें वेतन मिलता रहा, लेकिन प्रबंध समिति में विवाद के बाद उनका वेतन रोक दिया गया, जबकि उनकी सेवा कभी औपचारिक रूप से समाप्त नहीं की गई. याचिकाकर्ताओं ने 26 अगस्त 2003 के आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें संयुक्त निदेशक, अल्पसंख्यक कल्याण विभाग ने उनका वेतन दावा खारिज कर दिया था. सरकार की तरफ से तर्क दिया गया कि याचिकाकर्ताओं की नियुक्ति निर्धारित भर्ती प्रक्रिया व विज्ञापन के बिना हुई थी.
इसके अलावा 28 जुलाई 2018 की प्रधानाचार्य रिपोर्ट में स्पष्ट कहा गया कि याचिकाकर्ताओं ने कभी संस्था में कार्य नहीं किया और उनके ज्वाइनिंग पत्रों पर प्रधानाचार्य के फर्जी हस्ताक्षर पाए गए. “काम नहीं तो वेतन नहीं” के सिद्धांत के आधार पर तथा सरकारी आदेश दिनांक 21 नवंबर 2001 के अनुसार भी उनका दावा खारिज योग्य बताया गया.
कोर्ट ने कहा कि केवल मासिक विवरणी में नाम दर्ज होना या कुछ समय वेतन मिलना नियुक्ति की वैधता सिद्ध नहीं करता. याचिकाकर्ता (Teacher) यह साबित करने में असफल रहे कि उनकी नियुक्तियाँ कानूनी प्रक्रिया के तहत हुई थीं. कोर्ट ने माना कि सरकारी पत्र दिनांक 16 मार्च 2001 भी नियुक्तियों की वैधता का स्वतंत्र आधार नहीं बन सकता. इन आधारों पर कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी.