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गवाहों के बयानों में विरोधाभास बना आधार, 14 साल पहले हुई Murder के मामले में पिता-पुत्र हाई कोर्ट से बरी

गवाहों के बयानों में विरोधाभास बना आधार, 14 साल पहले हुई Murder के मामले में पिता-पुत्र हाई कोर्ट से बरी

मेरठ के किठौर थाना क्षेत्र में 2012 में हुई किरण पाल Murder case में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पिता-पुत्र अमित और कांति को बरी कर दिया है. दोनों को 2018 में मेरठ की अपर सत्र न्यायालय ने Murder case में आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी. अभियोजन के अनुसार, 7 सितंबर 2012 को किरण पाल बाजार से सामान खरीदकर लौट रहे थे, तभी अमित, उसके पिता कांति और साथी पवन से उनकी बेटी को छेड़ने को लेकर कहासुनी हुई. आरोप था कि कांति ने किरण पाल को पकड़ा और अमित ने स्क्रूड्राइवर से हमला कर दिया, जिससे अस्पताल ले जाते समय उनकी मौत हो गई.

ट्रायल कोर्ट ने तीसरे आरोपी पवन को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया था, जबकि अमित और कांति को दोषी करार दिया था. जस्टिस जेजे मुनीर और जस्टिस संजीव कुमार की बेंच ने कई बिंदुओं पर अभियोजन पक्ष के मामले को संदिग्ध पाया. तथ्यों के अनुसार तहरीर लिखने वाले गवाह ने बताया कि उसने शाम 4-4:30 बजे Murder case में रिपोर्ट लिखी थी, जबकि एफआईआर दोपहर 2:20 बजे दर्ज दिखाई गई. एफआईआर मजिस्ट्रेट के पास सात दिन बाद पहुंची और रोजनामचे में काट-छांट भी मिली, जिससे कोर्ट ने इसे “एंटी-टाइम्ड” यानी बाद में तैयार कर पहले की तारीख डालना माना.

स्क्रू ड्राइवर बरामदगी का स्वतंत्र गवाह मुकर गया और कहा कि पुलिस ने खाली कागज पर दस्तखत करवाए थे. गवाह हेमचंद ने घटना देखने से ही इन्कार कर दिया. पत्नी अनीता ने कहा कि वे रिक्शे में बैठे थे और घटना उनके सामने हुई, जबकि जांच अधिकारी ने रिक्शे में होने की बात को गलत बताया. उन्होंने यह भी कहा कि पति के घाव से खून नहीं बहा, जबकि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में पांच गहरे घाव और अत्यधिक रक्तस्राव से मौत बताई गई थी यानी मेडिकल और गवाही में साफ विरोधाभास सामने दिखायी देता है. सूचना देने वाले राकेश खुद घटनास्थल पर मौजूद नहीं थे और बाद में जानकारी मिलने पर पहुंचे थे.

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कोर्ट ने यह भी नोट किया कि अमित पहले सूचनाकर्ता की बहन के साथ दुष्कर्म के मामले में सजायाफ्ता होकर जमानत पर छूटा था, जिससे झूठे फंसाए जाने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता. तमाम विरोधाभासों और कमजोर सबूतों के आधार पर हाईकोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष संदेह से परे Murder case साबित नहीं कर सका. Murder case में ट्रायल कोर्ट का फैसला रद्द करते हुए अमित और कांति को बरी कर दिया गया. दोनों पहले से जमानत पर थे, इसलिए उन्हें आत्मसमर्पण की जरूरत नहीं होगी.

Murder के मामले में गिरफ्तारी से राहत से इन्कार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जौनपुर जिले के खेता सराय थाना क्षेत्र में दर्ज Murder के एक मामले में आरोपी प्रदीप बिंद की याचिका खारिज कर दी है. कोर्ट ने न तो प्राथमिकी  रद्द करने का आदेश दिया और न ही आरोपी को गिरफ्तारी से राहत दी. यह प्राथमिकी 2 मई 2026 को भारतीय न्याय संहिता  की धारा 103(1) (Murder) के अंतर्गत खेतासराय थाने में दर्ज कराई गई थी. अभियोजनग पक्ष के अनुसार, प्रदीप बिंद को मुख्य आरोपी के रूप में चिन्हित किया गया है, जिस पर अपनी बंदूक से गोली चलाकर मृतक की हत्या (Murder) करने का आरोप है.

याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता चंद्र जीत यादव ने कोर्ट में दलील दी कि उनके मुवक्किल को झूठे तरीके से Murder मामले में फंसाया गया है और इसलिए एफआईआर रद्द की जानी चाहिए. राज्य सरकार की ओर से अपर शासकीय अधिवक्ता  और प्राथमिकी दर्ज कराने वाले पक्ष के अधिवक्ता ने कोर्ट को बताया कि प्राथमिकी और मौजूदा साक्ष्य प्रथम दृष्टया अपराध की पुष्टि करते हैं और मामले की गहन जांच जरूरी है. उन्होंने कहा कि इस चरण में आरोपी की गिरफ्तारी पर रोक लगाने से जांच प्रभावित होगी और सबूत नष्ट होने या गायब होने का खतरा रहेगा.

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जस्टिस अजय भनोट और जस्टिस दिवेश चंद्र समंत की बेंच ने सुप्रीम कोर्ट के दो अहम फैसलों स्टेट ऑफ हरियाणा बनाम भजनलाल (1992) और नीहारिका इंफ्रास्ट्रक्चर प्राइवेट लिमिटेड बनाम स्टेट ऑफ महाराष्ट्र (2021) का हवाला दिया. भजनलाल मामले में सुप्रीम कोर्ट ने उन परिस्थितियों को रेखांकित किया था जिनमें प्राथमिकी रद्द की जा सकती है, लेकिन साथ ही यह चेतावनी भी दी थी कि यह शक्ति बेहद सीमित और दुर्लभतम मामलों में ही प्रयोग की जानी चाहिए.

निहारिका इंफ्रास्ट्रक्चर मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि जांच जारी रहने और तथ्य अस्पष्ट होने की स्थिति में हाईकोर्ट को नियमित रूप से “गिरफ्तारी न करने” या “कोई सख्त कदम न उठाने” जैसे अंतरिम आदेश पारित करने से बचना चाहिए, तथा आरोपी को इसके बजाय सक्षम अदालत में अग्रिम जमानत के लिए आवेदन करना चाहिए.

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खंडपीठ ने कहा कि दोनों नजीरें इस मामले पर पूरी तरह लागू होती हैं और इसी आधार पर याचिकाकर्ता को कोई अंतरिम राहत देने से इनकार किया जाता है. कोर्ट ने एफआईआर रद्द करने की मांग भी खारिज कर दी और याचिका को समग्र रूप से खारिज कर दिया.

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