पति ने Suicide करके जान दी तो पत्नी मुआवजा पाने की हकदार नहीं, इलाहाबाद हाई कोर्ट ने खारिज की पत्नी की याचिका

संजीव कुमार गंगा शुगर वर्क्स नामक कंपनी में चौकीदार के पद पर कार्यरत थे. 7-8 जनवरी 2008 की रात उनकी संदिग्ध हालात में गोली लगने से मौत (Suicide) हो गई थी. परिवार ने दावा किया कि यह मौत ड्यूटी के दौरान हुई. ड्यूटी के दौरान की मौत का हवाला देते हुए परिवार के सदस्यों की तरफ से कंपनी से मुआवजे की मांग की गयी. कंपनी की तरफ से पॉजिटिव रिस्पांस न मिलने पर पत्नी ने मुआवजे के तौर पर 4,27,040 रुपये की मांग करते हुए याचिका दाखिल की.
कोर्ट में याची के अधिवक्ता की तरफ से तर्क दिया गया कि मृतक संजीव कुमार को रात की ड्यूटी दी गई थी. वह ड्यूटी पर थे तभी किसी अज्ञात व्यक्ति ने उन्हें गोली मार दी. गोली लगने से गंभीर रूप से जख्मी होने के चलते उनकी मौत हो गयी. इसकी सूचना पर पड़ताल की गयी लेकिन जांच में अपराधी का पता नहीं चल सका. कर्मचारी की मौत पर कंपनी के समक्ष मुआवजे का क्लेम किया गया था लेकिन कंपनी की ओर से कोई रिस्पांस नहीं दिया गया.
कंपनी का पक्ष : उन्होंने खुद को गोली मारकर Suicide की थी
कंपनी का पक्ष था कि संजीव कुमार को कभी रात की ड्यूटी नहीं दी गई और उन्होंने खुद को गोली मारकर Suicide की थी. श्रमिक क्षतिपूर्ति आयुक्त ने दोनों पक्षों के सबूतों की जांच के बाद पाया कि संजीव कुमार ने Suicide की थी, इसलिए याचिका खारिज कर दी गई थी. अपीलकर्ताओं के वकील ने तर्क दिया कि आयुक्त ने सिर्फ एक कर्मचारी की गवाही के आधार पर गलत निष्कर्ष निकाला.
प्रतिवादी पक्ष ने बताया कि हाजिरी रजिस्टर पेश करने वाले मुंशी ने साबित किया था कि संजीव कुमार को कभी रात की ड्यूटी नहीं दी गई थी. यह भी बताया गया कि पोस्टमार्टम और पंचनामा दोनों Suicide की पुष्टि करते हैं, और एफआईआर में दाखिल अंतिम रिपोर्ट पर पत्नी ने कोई आपत्ति नहीं जताई थी. हाईकोर्ट ने कहा कि रात या दिन की ड्यूटी का विवाद इस मामले में गौण है.
अहम बात यह है कि जांच रिपोर्ट पर नोटिस मिलने के बाद खुद अपीलकर्ता पत्नी ने मजिस्ट्रेट के सामने पेश होकर स्वीकार किया था कि उनके पति मानसिक रूप से परेशान थे और उन्होंने खुद को गोली मारी (Suicide) थी. पंच गवाहों की राय भी Suicide की पुष्टि करती थी. इन तथ्यों के आधार पर अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि संजीव कुमार की मौत Suicide से हुई थी, और चूंकि Suicide करने वाले श्रमिक को “रोजगार के दौरान मृत्यु” के आधार पर मुआवजा नहीं मिलता, इसलिए निचली अदालत के आदेश में कोई खामी नहीं है.