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संदेह, चाहे कितना भी मजबूत क्यों न हो, सबूत की जगह नहीं ले सकता, इंडियन आयल कारपोरेशन का रिटेल Dealership आउटलेट खत्म करने का आदेश रद

संदेह, चाहे कितना भी मजबूत क्यों न हो, सबूत की जगह नहीं ले सकता, इंडियन आयल कारपोरेशन का रिटेल Dealership आउटलेट खत्म करने का आदेश रद

संदेह, चाहे कितना भी मजबूत क्यों न हो, सबूत की जगह नहीं ले सकता. इस महत्वपूर्ण कमेंट के साथ इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इंडियन आयल कारपोरेशन का रिटेल Dealership आउटलेट खत्म करने का आदेश रद कर दिया है. इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच के जस्टिस इरशाद अली ने बलरामपुर जिले के मेसर्स सरदार बलदेव सिंह एंड कंपनी के प्रोपराइटर करमजीत सिंह की तरफ से दाखिल याचिका मंजूर करते हुए कहा कि कॉरपोरेशन को ठोस तकनीकी सबूतों के माध्यम से यह साबित करना था कि कथित अनियमितताओं से डिलीवरी में हेरफेर हो सकता था और ऐसा हेरफेर याचिकाकर्ता के कारण हुआ था.

ऐसा कोई सबूत सामने नहीं आया है. कोर्ट ने आईओसी को छह सप्ताह के भीतर आउटलेट Dealership को बहाल करने का आदेश दिया है. इस रिट याचिका के जरिए याचिकाकर्ता ने उस आदेश को चुनौती दी है जिसके तहत बलरामपुर जिले के तुलसीपुर में स्थित उसरिटेल आउटलेट Dealership खत्म कर दी गई थी. याचिकाकर्ता ने उस अपीलीय आदेश को भी चुनौती दी थी जिसमें ‘मार्केटिंग डिसिप्लिन गाइडलाइंस, 2012’ के क्लॉज 8.9 के तहत दायर कानूनी अपील को खारिज कर दिया गया था.

याचिकाकर्ता के अनुसार इस रिट याचिका से जुड़े तथ्य यह हैं कि याचिकाकर्ता 1973 से उक्त रिटेल आउटलेट Dealership चला रहा है. उसका दावा है कि Dealership के पूरे कार्यकाल के दौरान उसका रिकॉर्ड बेदाग रहा है. उस पर कभी भी मिलावट, कम डिलीवरी या किसी अन्य गलत काम का आरोप साबित नहीं हुआ.

अधिकारियों द्वारा 10.05.2017 को रिटेल आउटलेट Dealership का संयुक्त निरीक्षण किया गया

याचिकाकर्ता का कहना था कि 02.05.2017 के सरकारी आदेश के तहत संबंधित अधिकारियों द्वारा 10.05.2017 को रिटेल आउटलेट Dealership का संयुक्त निरीक्षण किया गया. निरीक्षण के दौरान, एक ‘टोखाइम’ (Tokheim) डिस्पेंसिंग यूनिट में कुछ पल्सर केबल एडहेसिव टेप से जुड़े हुए पाए गए और मदरबोर्ड पर लगी ‘वेट्स एंड मेजर्स’ सील में एक जोड़ देखा गया.

एक अन्य ‘गिलबार्को’ (Gilbarco) डिस्पेंसिंग यूनिट में, MS यूनिट पर पल्सर की ‘वेट्स एंड मेजर्स’ सील टूटी हुई पाई गई. निरीक्षण रिपोर्ट के अनुसार, किसी भी डिस्पेंसिंग यूनिट के अंदर कोई अतिरिक्त इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस, चिप या कोई अनधिकृत फिटिंग नहीं पाई गई और डिलीवर किए गए ईंधन की मात्रा में कोई गड़बड़ी नहीं मिली.

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इसके बाद, संबंधित कॉर्पोरेशन ने फैक्ट-फाइंडिंग लेटर जारी किया, जिसमें MDG-2012 के क्लॉज 5.1.2, 5.1.3 और 5.1.4 के उल्लंघन का आरोप लगाया गया. याचिकाकर्ता ने आरोपों का खंडन करते हुए विस्तृत जवाब दिया. इसके बाद, कारण बताओ नोटिस जारी किया गया. इसका भी जवाब याचिकाकर्ता की ओर से दिया गया. सक्षम अधिकारी स्पष्टीकरण से संतुष्ट नहीं हुए और Dealership खत्म करने का आदेश पारित किया. याचिकाकर्ता द्वारा दायर कानूनी अपील भी खारिज कर दी गई. इसके बाद उसने हाई कोर्ट की शरण ली और Dealership खत्म करने के दोनों आदेशों को चैलेंज किया.

याचिकाकर्ता के वकील का तर्क दिया कि Dealership खत्म करने के दोनों आदेश मनमाने, गैर-कानूनी और कानून की दृष्टि से टिकने योग्य नहीं हैं, क्योंकि ये केवल संदेह पर आधारित हैं, जबकि डिस्पेंसिंग यूनिट्स के साथ छेड़छाड़ या फ्यूल डिलीवरी में हेरफेर साबित करने वाला कोई कानूनी रूप से स्वीकार्य सबूत नहीं है. यह भी कहा गया है कि प्रतिवादी MDG-2012 के क्लॉज 5.1.4 के तहत जरूरी शर्तों को साबित करने में विफल रहे हैं.

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अपनी दलील में याचिकाकर्ता के वकील का कहना था कि डिस्पेंसिंग मशीनें, जिनमें उनके मदरबोर्ड, पल्सर कार्ड, पल्सर केबल, सील और अन्य आंतरिक पुर्जे शामिल हैं, पूरी तरह से संबंधित कॉर्पोरेशन की थीं. उनकी स्थापना, कैलिब्रेशन, मरम्मत, रखरखाव और सीलिंग का काम केवल कॉर्पोरेशन के इंजीनियरों, उसकी अधिकृत सर्विस एजेंसियों और ‘वजन और माप विभाग’ के अधिकारियों द्वारा किया जाता था.

याचिकाकर्ता की डिस्पेंसिंग यूनिट्स के आंतरिक तंत्र तक न तो कोई तकनीकी पहुंच थी और न ही उन पर कोई नियंत्रण था. इसलिए, कानूनी रूप से उनके खिलाफ छेड़छाड़ का कोई अनुमान नहीं लगाया जा सकता. कहा गया कि निरीक्षण से पहले भी, वितरण इकाई 23.03.2017 से खराब थी और उस संबंध में याचिकाकर्ता द्वारा पहले ही शिकायतें दर्ज की गई थीं.

निरीक्षण रिपोर्ट में स्वयं दर्ज है कि वितरण इकाई निरीक्षण की तिथि पर ईंधन का वितरण नहीं कर रही थी. निरीक्षण से बहुत पहले, याचिकाकर्ता ने एक पत्र लिखकर प्रतिवादी निगम से पुराने और जंग लगे सीलिंग तार को बदलने का अनुरोध किया था. तर्क दिया गया कि जांच के दौरान संबंधित पुर्जे जब्त किए जाने के बावजूद, डिस्पेंसिंग मैकेनिज्म के साथ असल में छेड़छाड़ हुई है या नहीं, यह साबित करने के लिए न तो कोई लैब टेस्ट किया गया और न ही किसी एक्सपर्ट से कोई पक्की जांच करवाई गई.

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अपनी दलीलों के समर्थन में याचिकाकर्ता के वकील ने चेयरमैन इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन और अन्य बनाम मेसर्स ललाइट फिलिंग सेंटर और अन्य [स्पेशल अपील डिफेक्टिव नंबर 145/2026] में सुनाये गये फैसले का जिक्र किया. इसमें कहा गया है कि MDG का क्लॉज 5.1.4 अनधिकृत फिटिंग या हेरफेर के जरिए छेड़छाड़ की बात करता है, जिससे डिलीवरी पर असर पड़ सकता है.

डिवीजन बेंच ने माना कि जिस डिस्पेंसिंग यूनिट के साथ छेड़छाड़ का आरोप था, वह खुद ही काम नहीं कर रही थी और डिलीवरी में कोई कमी नहीं पाई गई थी, इसलिए केवल शक के आधार पर Dealership खत्म करना सही नहीं ठहराया जा सकता. आगे यह भी कहा गया कि ओरिजिनल इक्विपमेंट मैन्युफैक्चरर (OEM) की रिपोर्ट का इंतजार किए बिना ही Dealership खत्म करने का आदेश देना मामले पर पहले से ही कोई राय बना लेने जैसा था.

‘इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन लिमिटेड और अन्य बनाम M/s मॉडर्न सर्विस स्टेशन’ मामले में डिवीजन बेंच के एक और फैसले का भी हवाला दिया गया है. इसमें कोर्ट ने माना कि डीलर (Dealership) के खास बचाव पक्ष पर विचार न करना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन है. जब तक यह साबित करने के लिए ठोस सबूत पेश नहीं किए जाते कि कॉर्पोरेशन के इंजीनियरों या अधिकृत कर्मचारियों द्वारा डिस्पेंसिंग यूनिट को संभालने के बाद डीलर की उस तक अनधिकृत पहुँच थी, तब तक डीलर पर जिम्मेदारी नहीं डाली जा सकती.

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प्रतिवादियों के वकील का कहना था कि ‘कारण बताओ नोटिस’ के जवाब में याचिकाकर्ता ने जो स्पष्टीकरण दिया था, उस पर सक्षम अधिकारी ने ठीक से विचार किया, लेकिन उसे पूरी तरह से असंतोषजनक पाया. उनका तर्क है कि निरीक्षण के दौरान पाई गई अनियमितताएँ गंभीर प्रकृति की थीं, जिन पर ‘मार्केटिंग डिसिप्लिन गाइडलाइंस, 2012’ (MDG-2012) के नियम लागू होते हैं. इसलिए Dealership खत्म करने का फैसला सही था. तर्क दिया कि 1973 से अपने कथित संतोषजनक व्यवहार पर याचिकाकर्ता का भरोसा पूरी तरह से गलतफहमी पर आधारित है.

इस कोर्ट के लिए एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि प्रतिवादियों ने ऐसा कोई सबूत पेश नहीं किया है जिससे यह साबित हो सके कि याचिकाकर्ता ने डिस्पेंसिंग यूनिट के अंदरूनी इलेक्ट्रॉनिक पुर्जों तक अनधिकृत रूप से पहुंच बनाई थी. Dealership व्यवस्था के तहत, इंस्टॉलेशन, कैलिब्रेशन, रखरखाव और मरम्मत का काम कॉरपोरेशन द्वारा अपने इंजीनियरों या अधिकृत एजेंसियों के माध्यम से किया जाता था.

इस बात का कोई सबूत नहीं है कि कथित टेप वाले जोड़ कब और किसने बनाए थे, इसलिए यह निष्कर्ष कि याचिकाकर्ता ने खुद डिस्पेंसिंग यूनिट के साथ छेड़छाड़ की थी, किसी ठोस सबूत से समर्थित नहीं है. विवादित आदेशों से पता चलता है कि प्रतिवादियों ने इस धारणा के आधार पर कार्रवाई की कि चूंकि पल्सर केबलों में टेप वाले जोड़ थे और ‘वजन और माप’की सील में अनियमितता थी, इसलिए याचिकाकर्ता ने निश्चित रूप से छेड़छाड़ की होगी.

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ऐसी धारणा उस स्थापित कानूनी स्थिति की अनदेखी करती है जिसके अनुसार संदेह, चाहे कितना भी मजबूत क्यों न हो, सबूत की जगह नहीं ले सकता. कॉरपोरेशन को ठोस तकनीकी सबूतों के माध्यम से यह साबित करना था कि कथित अनियमितताओं से डिलीवरी में हेरफेर हो सकता था और ऐसा हेरफेर याचिकाकर्ता के कारण हुआ था. ऐसा कोई सबूत सामने नहीं आया है.

इसलिए, इस कोर्ट की यह सुविचारित राय है कि अनुशासनात्मक प्राधिकरण और अपीलीय प्राधिकरण द्वारा दर्ज किए गए निष्कर्षों में प्रासंगिक सामग्री पर विचार न करने, वैज्ञानिक सबूतों से समर्थित न होने वाले अनुमानित निष्कर्षों पर निर्भरता और मार्केटिंग डिसिप्लिन गाइडलाइंस, 2012 के क्लॉज 5.1.4 के गलत प्रयोग जैसी कमियां हैं.

नतीजतन Dealership आउटलेट खत्म करने के दोनों विवादित आदेशों को बरकरार नहीं रखा जा सकता है. कोर्ट ने प्रतिवादियों को निर्देश दिया है कि वे इस आदेश की प्रमाणित प्रति पेश किए जाने की तारीख से छह सप्ताह के भीतर याचिकाकर्ता की Dealership और उससे मिलने वाले सभी लाभों को बहाल करें.

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