37 साल पुराने Dowry death केस के तीन आरोपित बरी, हाई कोर्ट ने कहा, जिन परिस्थितियों पर अभियोजन दोष सिद्ध करना चाहता है, उन्हें आरोपी के समक्ष रखना अनिवार्य है

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कानपुर नगर के 37 वर्ष पुराने Dowry death के एक चर्चित मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए तीन आरोपियों को सभी आरोपों से बरी कर दिया है. जस्टिस सिद्धार्थ वर्मा और जस्टिस जय कृष्ण उपाध्याय की खंडपीठ ने कहा कि अभियोजन पक्ष Dowry death के आरोप को संदेह से परे साबित करने में असफल रहा. अदालत ने यह भी माना कि जिस विसरा रिपोर्ट के आधार पर Dowry death का आरोप सिद्ध किया गया था, उसे आरोपियों के समक्ष दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 313 के तहत पूछताछ के दौरान रखा ही नहीं गया, इसलिए उस पर भरोसा नहीं किया जा सकता.
मामला कानपुर नगर के महाराजपुर थाना क्षेत्र का है. अभियोजन के अनुसार वर्ष 1984 में विजय लक्ष्मी का विवाह राकेश कुमार मिश्रा उर्फ डॉक्टर से हुआ था. आरोप था कि विवाह के बाद से ही ससुराल पक्ष दहेज में रुपये और व्यापार में साझेदारी की मांग को लेकर उसे प्रताड़ित करता था.
13 जनवरी 1986 को मृतका के भाई ने एफआईआर दर्ज कराते हुए आरोप लगाया था कि ससुराल वालों ने विजय लक्ष्मी को जबरन जहरीला पदार्थ खिलाया, जिसके बाद उपचार के लिए कानपुर ले जाते समय उसकी मौत हो गई. पोस्टमार्टम के बाद विसरा जांच में जिंक फॉस्फाइड नामक विष मिलने की बात सामने आई थी. ट्रायल कोर्ट ने वर्ष 1989 में पति, ससुर, जेठ और सास को Dowry death के लिए दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई थी. अपील लंबित रहने के दौरान सास राजदेई की मृत्यु हो गई थी.
ट्रायल कोर्ट ने वर्ष 1989 में पति, ससुर, जेठ और सास को Dowry death के लिए दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई थी
हाईकोर्ट ने अपील की सुनवाई के दौरान पूरे साक्ष्यों का विस्तृत परीक्षण किया और पाया कि अभियोजन के गवाहों के बयान एक-दूसरे से मेल नहीं खाते. मृतका के भाई ने कहा कि उसे कुछ खाने के लिए दिया गया था, जबकि भांजे ने अदालत में बयान दिया कि पानी में कोई पदार्थ मिलाकर जबरन पिलाया गया था. अदालत ने कहा कि इस तरह के महत्वपूर्ण तथ्यों में विरोधाभास Dowry death की अभियोजन की कहानी को कमजोर करता है.
खंडपीठ ने यह भी कहा कि जिंक फॉस्फाइड ऐसा विष नहीं है जिसे बिना प्रतिरोध के आसानी से किसी को पिलाया जा सके. इसका स्वाद अत्यंत कड़वा और गंध तीव्र होती है. यदि किसी स्वस्थ व्यक्ति को जबरन ऐसा विष पिलाया जाता तो वह स्वाभाविक रूप से विरोध करता और शरीर पर संघर्ष के स्पष्ट निशान दिखाई देते. लेकिन रिकॉर्ड में ऐसे कोई विश्वसनीय साक्ष्य मौजूद नहीं थे.
अदालत ने Dowry death की जांच प्रक्रिया पर भी गंभीर सवाल उठाए. फैसले में कहा गया कि पोस्टमार्टम के बाद विसरा किसकी अभिरक्षा में रहा, उसे किसने सुरक्षित रखा, किसने फॉरेंसिक प्रयोगशाला तक पहुंचाया और पूरी प्रक्रिया का रिकॉर्ड क्या था, इसका कोई संतोषजनक प्रमाण अभियोजन प्रस्तुत नहीं कर सका. फॉरेंसिक प्रयोगशाला के किसी अधिकारी को भी गवाही के लिए पेश नहीं किया गया. ऐसे में विसरा की सुरक्षित अभिरक्षा की श्रृंखला साबित नहीं हो सकी.

हाईकोर्ट ने कहा कि सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि विसरा रिपोर्ट और उससे संबंधित परिस्थितियों के बारे में आरोपियों से धारा 313 सीआरपीसी के तहत कोई प्रश्न नहीं पूछा गया. सर्वोच्च न्यायालय के अनेक निर्णयों का हवाला देते हुए अदालत ने कहा कि जिन परिस्थितियों पर अभियोजन Dowry death दोष सिद्ध करना चाहता है, उन्हें आरोपी के समक्ष रखना अनिवार्य है. ऐसा न होने पर उन परिस्थितियों को साक्ष्य के रूप में आरोपियों के विरुद्ध इस्तेमाल नहीं किया जा सकता.
इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि अभियोजन Dowry death का आरोप संदेह से परे सिद्ध करने में विफल रहा है. इसलिए ट्रायल कोर्ट द्वारा 7 दिसंबर 1989 को दिया गया दोषसिद्धि और सजा का आदेश निरस्त करते हुए राम औतार, राकेश कुमार मिश्रा उर्फ डॉक्टर तथा लड्डन मिश्रा उर्फ महेश को सभी आरोपों से बरी कर दिया. अदालत ने यह भी आदेश दिया कि यदि आरोपी जमानत पर हैं तो उन्हें आत्मसमर्पण करने की आवश्यकता नहीं है तथा उनके जमानत बंधपत्र समाप्त माने जाएंगे.