‘जहाँ Kanoon कोई कर्तव्य या दायित्व निर्धारित करता है और संबंधित पक्ष बिना किसी दोष के उसे पूरा करने में असमर्थ हो तो सामान्यतः Kanoon उसे BNSS की धारा 187(4) का उल्लंघनमुक्त कर देता है’
हाई कोर्ट ने एटा में तैनात रहे डॉ आशीष शाक्य की गैरमौजूदगी में रिमांड अवधि बढ़ाने के ट्रायल कोर्ट के फैसले को सही ठहराया

जहाँ Kanoon कोई कर्तव्य या दायित्व निर्धारित करता है और संबंधित पक्ष अपनी ओर से बिना किसी दोष के उसे पूरा करने में असमर्थ हो जाता है तथा उस पर उसका कोई नियंत्रण नहीं होता तो सामान्यतः Kanoon उसे इस दायित्व से मुक्त कर देता है. ऐसी परिस्थितियों में भी संबंधित वैधानिक प्रावधान उसमें उत्पन्न हुई बाद की असंभवता के कारण अपने अनिवार्य स्वरूप से वंचित नहीं हो जाता. उक्त तथ्य और परिस्थितियाँ ‘असंभवता के सिद्धांत’के अंतर्गत आती हैं.
Kanoon के अनुसार ऐसी स्थिति में न्यायिक हिरासत की अवधि बढ़ाए जाने पर सुनवाई के दिन अभियुक्त की अनुपस्थिति को एक पर्याप्त आधार माना जा सकता है. इसेी के आधार पर इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस विक्रम डी चौहान ने डॉ आशीष शाक्य की संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत दायर याचिका खारिज कर दी है.
बता दें कि डॉ आशीष शाक्य एटा की पॉलीक्लिनिक में तैनात थे. उन पर बिना जरूरी मेडिकल कारण के नोएडा के फेलिक्स अस्पताल में मरीजों को रेफर करने का आरोप लगा था. नोएडा की फेलिक्स अस्पताल में इन मरीजों को भर्ती कराया जाता था. यहां गंभीर बीमारी का हवाला देकर मरीज से मेडिकल जांच, दवाइयां या कोई बड़ी सर्जरी के नाम पर मोटी रकम वसूली जाती थी. मरीजों को रिफर करने के बदले अस्पताल प्रबंधन की ओर से उन्हें रिश्वत दी जाती थी. सीबीआई ने इस साल मार्च महीने में उन्हें फेलिक्स अस्पताल के कॉन्फ्रेंस रूम से तीन लाख रुपये की रिश्वत लेते गिरफ्तार किया था.
संविधान के अनुच्छेद 227 (Kanoon) के तहत वर्तमान याचिका दाखिल करने वाले डॉ आशीष शाक्य ने स्पेशल जज प्रिवेंशन आफ करप्शन एक्ट, सीबीआई गाजियाबाद द्वारा 16.4.2026 को पारित रिमांड आदेश को चुनौती देने के लिए दायर की थी. यह आदेश प्रथम सूचना रिपोर्ट 15.3.2026 संख्या RC2182026A0005 के संबंध में पारित किया गया था जो बीएनएस 2023 की धारा 61(2) के तहत, भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धाराओं 7, 8, 9, 10 और 12 के साथ पठित है, थाना C.B.I. AC-III नई दिल्ली में दर्ज है.
याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने कोर्ट में पक्ष रखते हुए कहा कि 16 अप्रैल के आदेश के माध्यम से याचिकाकर्ता की उपस्थिति के बिना न्यायिक रिमांड की अवधि बढ़ा दी गई है. ‘भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023’ की धारा 187(4) (Kanoon) के अनुसार रिमांड की अवधि बढ़ाते समय प्रतिवादियों के लिए यह अनिवार्य था कि वे याचिकाकर्ता को संबंधित न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करें.
याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा ‘जिगर उर्फ जिमी प्रवीणचंद्र अदातिया बनाम गुजरात राज्य, (2023) 6 SCC 484’का संदर्भ दिया और तर्क दिया कि न्यायिक हिरासत की अवधि बढ़ाते समय Kanoon के अनुसार अभियुक्त को संबंधित न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करना अनिवार्य है क्योंकि अभियुक्त को रिमांड का विरोध करने का अधिकार प्राप्त है.
उन्होंने तर्क दिया कि सांविधिक अनुपालन (Kanoon) एक कोरी औपचारिकता नहीं हैं और स्पष्ट प्रक्रियात्मक निर्देशों से किसी भी प्रकार का विचलन, बाद में किए गए पुष्टिकरण के बहाने क्षम्य नहीं ठहराया जा सकता. आदेश में इस बात का कोई कारण निर्दिष्ट नहीं किया गया है कि न्यायिक हिरासत की अवधि बढ़ाने वाला आदेश पारित करते समय Kanoon के तहतअभियुक्त को संबंधित न्यायालय के समक्ष क्यों प्रस्तुत नहीं किया गया था. उन्होंने तर्क दिया कि वर्तमान याचिका दायर किए जाने के पश्चात् 30 अप्रैल 2026 को संबंधित न्यायालय द्वारा पारित वह बाद का आदेश, जिसमें याचिकाकर्ता-अभियुक्त की अनुपस्थिति का स्पष्टीकरण दिया गया है, पूर्णतः निरर्थक है.
सेंट्रल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन के वकील ने याचिका का विरोध किया है और कहा कि याचिकाकर्ता-आरोपी की न्यायिक हिरासत बढ़ाने का विवादित आदेश पारित किया गया था तब याचिकाकर्ता-आरोपी के वकील संबंधित अदालत के सामने मौजूद थे. इसके जरिए याचिकाकर्ता को 16 अप्रैल 2026 को संबंधित अदालत के सामने न्यायिक हिरासत बढ़ाने का विरोध करने का पर्याप्त अवसर मिला था.

सीबीआई के अधिवक्ता की तरफ से यह भी कहा गया कि जेल अधिकारियों ने Kanoon -व्यवस्था की स्थिति के कारण आरोपी व्यक्ति को शारीरिक रूप से पेश करने में अपनी असमर्थता के बारे में संबंधित अदालत को Kanoon के तहत विधिवत सूचित किया था और शारीरिक पेशी से छूट की माँग की थी. अदालत के अधिकारियों ने Kanoon के तहत ऑडियो-वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से आरोपी-याचिकाकर्ता की पेशी सुनिश्चित करने की भी कोशिश की थी लेकिन टेक्निकल प्राब्लम की वजह से यह संभव नहीं हो पाया.
सीबीआई के अधिवक्ता ने कहा कि जिगर उर्फ जिमी मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला, मौजूदा मामले के तथ्यों और परिस्थितियों पर लागू नहीं होता है. उपर्युक्त निर्णय का आधार यह है कि Kanoon के तहत अभियुक्त को न्यायिक हिरासत या उसके विस्तार पर आपत्ति करने का अवसर मिलना चाहिए और प्रस्तुत मामले में अभियुक्त-याचिकाकर्ता के वकील संबंधित न्यायालय के समक्ष उपस्थित थे. ऐसे में याचिकाकर्ता को कोई हानि नहीं हुई है.
यह तर्क भी दिया गया कि अधिकारियों के नियंत्रण से बाहर की परिस्थितियों के कारण, अभियुक्त-याचिकाकर्ता को संबंधित न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत नहीं किया जा सका. इस स्थिति में अभियुक्त-याचिकाकर्ता को संबंधित न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करने की असंभवता के कारण Kanoon के अनुसार रिमांड के विवादित आदेश को रद्द नहीं किया जा सकता.
सीबीआई के अधिवक्ता ने गौरी शंकर झा बनाम बिहार राज्य और अन्य, AIR 1972 SC 711; संदीप कुमार डे बनाम प्रभारी अधिकारी, साकची थाना, जमशेदपुर और अन्य, AIR 1974 SC 871; रमेश कुमार रवि उर्फ राम प्रसाद और अन्य बनाम बिहार राज्य और अन्य, 1987 CrLJ 1489 (पटना) (पूर्ण पीठ); कुर्रा दशरथ रमैया और अन्य बनाम आंध्र प्रदेश राज्य, 1992 CrLJ 3485 (AP-FB); तथा सूरज चोखानी बनाम प्रवर्तन निदेशालय, 2024 CGHC 39410 के निर्णयों पर भरोसा जताया.
स्टेट की ओर से एजीए ने तर्क दिया कि 16 अप्रैल को कमिश्नरेट गाजियाबाद में व्याप्त Kanoon-व्यवस्था की स्थिति के कारण सदर लॉकअप के लिए पुलिस बल की अनुपलब्धता और जिला जेल में बंद कैदियों की कमांड ड्यूटी के संबंध में जानकारी जिला न्यायाधीश/ मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट/जिला मजिस्ट्रेट, गाजियाबाद/पुलिस आयुक्त, गाजियाबाद और जेल अधीक्षक, गाजियाबाद को भेजी गई थी. सेक्टर 62, गौतम बुद्ध नगर में फैक्ट्री कर्मचारियों के विरोध प्रदर्शन के चलते, रिजर्व पुलिस लाइन से बड़ी संख्या में पुलिस कर्मियों को ‘क्विक रिस्पॉन्स टीम’ और ‘एस्कॉर्ट्स’ में तैनात किया गया था.
याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि प्रतिवादियों ने अपने जवाबी हलफनामे में विवादित आदेश के दिन संबंधित अदालत के सामने पेश न करने के लिए जो स्पष्टीकरण या बहाना दिया है उन कारणों/बहानों का जिक्र विवादित आदेश में नहीं है. बाद में दिया गया कोई भी बाहरी स्पष्टीकरण किसी भी तरह से एक अवैध हिरासत आदेश को वैध नहीं बना सकता.
BNSS, 2023 की धारा 187(4) में इस मामले में पैदा हुई स्थिति का कोई जिक्र नहीं है और न ही BNSS, 2023 में ऐसा कोई प्रावधान है जिसके तहत आरोपी को पेश न करने पर संबंधित अदालत के सामने रिपोर्ट जमा करना जरूरी हो इस मामले पर कानून खामोश है.
विवादित आदेश में पेश न करने का कारण दर्ज नहीं है तो भी Kanoon के अनुसार विवादित आदेश को दोषपूर्ण नहीं कहा जा सकता
कोर्ट ने माना कि उपरोक्त बातों को ध्यान में रखते हुए, विवादित आदेश जारी करते समय आरोपी को संबंधित अदालत के सामने पेश न करने का ठोस आधार मौजूद था. संबंधित अदालत ने भी विवादित आदेश में यह दर्ज किया है कि आरोपी मौजूद नहीं है.
यह सच है कि विवादित आदेश में याचिकाकर्ता-आरोपी को संबंधित अदालत के सामने पेश न करने के कारणों का जिक्र नहीं है, हालाँकि इस अदालत की सुविचारित राय यह है कि यदि विवादित आदेश में पेश न करने का कारण दर्ज नहीं है तो भी Kanoon के अनुसार विवादित आदेश को दोषपूर्ण नहीं कहा जा सकता और यह अदालत अपनी पर्यवेक्षी अधिकार-क्षेत्र का इस्तेमाल करते हुए उन कारणों की पर्याप्तता की जाँच कभी भी कर सकती है.
कोर्ट ने अपने फैसले में मेंशन किया है कि दोनों पक्षों के बीच इस बात पर कोई विवाद नहीं है कि याचिकाकर्ता-आरोपी के वकील 16.4.2026 को संबंधित अदालत के सामने मौजूद थे. न्यायिक हिरासत बढ़ाने के समय आरोपी का अदालत में मौजूद होना इसलिए जरूरी है ताकि आरोपी को हिरासत बढ़ाने का विरोध करने का अधिकार मिल सके.
जब याचिकाकर्ता-आरोपी के वकील की संबंधित अदालत के सामने पेशी हो चुकी है और रिमांड की अवधि बढ़ाने का विरोध भी किया जा चुका है तो यह दिखाना जरूरी है कि इससे याचिकाकर्ता-आरोपी को कोई नुकसान हुआ है या उसके किसी अधिकार का उल्लंघन हुआ है.
इस अदालत के सामने, याचिकाकर्ता के वकील ने आरोपी-याचिकाकर्ता को ऐसा कोई नुकसान नहीं दिखाया है, सिवाय इसके कि BNSS, 2023 की धारा 187(4) का उल्लंघन हुआ है. उक्त उल्लंघन ‘असंभवता के सिद्धांत’ के तहत क्षम्य है, और इसलिए, यह रिमांड बढ़ाने के कोर्ट के आदेश को अमान्य नहीं ठहरा सकता.
MATTERS UNDER ARTICLE 227 No. – 5746 of 2026; Dr Ashish Shakya V/s Central Bureau of Investigation and another