आरोप की seriousness, आपराधिक इतिहास और गिरफ्तारी की आशंका के बावजूद भागने का जोखिम और जांच में सहयोग के आश्वासन को वरीयता दी जानी चाहिए: हाई कोर्ट

आरोपी एक मामले में कोर्ट में पेश हो रहा हो और दूसरे मामले में उसे फरार दिखाया गया हो तो आरोपों की seriousness, आपराधिक इतिहास और गिरफ्तारी की आशंका के बावजूद उसके भागने का जोखिम कम होने और जांच व मुकदमे में सहयोग करने के आरोपी के आश्वासन को वरीयता दी जानी चाहिए. इसके साथ ही इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस अवनीश सक्सेना की बेंच ने आम्स एक्ट के आरोपित की अग्रिम जमानत मंजूर कर ली है.
कोर्ट ने आरोपित कमलेश सिंह को 30 दिनों के भीतर संबंधित ट्रायल कोर्ट या जांच अधिकारी के समक्ष, जैसा भी मामला होने का निर्देश दिया है. उसे 25,000/- रुपये का व्यक्तिगत मुचलका और इतनी ही राशि के दो जमानतदार पेश करने पर जमानत पर रिहा कर दिया जाएगा जो संबंधित न्यायालय की संतुष्टि के अधीन होगा.
कोर्ट में आवेदक की तरफ से कुमार परीक्षित और राज्य की ओर से AGA ने पक्ष रखा. BNSS की धारा 482 के तहत यह अग्रिम जमानत याचिका कमलेश सिंह की तरफ से द्वारा इस प्रार्थना के साथ दायर की गई थी कि उसे केस क्राइम नंबर 1398/2017 (आम्स एक्ट की धारा 27 के तहत थाना केराकत, जिला जौनपुर) में, मुकदमे के लंबित रहने के दौरान, अग्रिम जमानत पर रिहा किया जाए.
आवेदक के वकील ने यह तर्क दिया है कि आरोपी आवेदक इस केस क्राइम नंबर में एसीजेएम द्वितीय जौनपुर द्वारा 20.03.2018 के आदेश के तहत, पहले से ही जमानत पर था. आवेदक इस मामले में अपने वकील के माध्यम से उपस्थित था लेकिन बाद में उसका मुख्य मामला यानी उसी पुलिस स्टेशन का केस क्राइम नंबर 1391/2017 सत्र न्यायालय को सुपुर्द कर दिया गया, जबकि यह वर्तमान मामला मजिस्ट्रेट न्यायालय के पास ही बना रहा.
वकील ने इस न्यायालय का ध्यान सत्र विचारण संख्या 30/2023 (राज्य बनाम सुनील और अन्य) की आदेश-शीट की ओर आकर्षित किया, जिसमें आरोपी आवेदक लगातार उपस्थित हो रहा था. उन्होंने यह भी बताया कि हथियार अधिनियम से संबंधित यह मामला जब एक मजिस्ट्रेट से दूसरे मजिस्ट्रेट न्यायालय में स्थानांतरित हुआ तो आवेदक को कभी भी कोई समन या जमानती वारंट तामील नहीं कराया गया. बाद में, CrPC की धारा 82 के तहत प्रक्रिया जारी कर दी गई. आवेदक ने यह बताया है कि उसके विरुद्ध आपराधिक इतिहास के पाँच मामले दर्ज हैं, जिनमें से चार मामलों के संबंध में स्थिति पहले ही स्पष्ट की जा चुकी है.
आरोपी आवेदक को पाँचवें मामले के संबंध में कोई जानकारी नहीं है, किंतु वह सभी मामलों में जमानत पर है. आरोपी आवेदक विचारण न्यायालय के समक्ष उपस्थित होना चाहता है, किंतु उसे अपनी गिरफ्तारी की आशंका है. A.G.A. ने आवेदक की जमानत की प्रार्थना का विरोध किया है. कोर्ट ने माना कि अग्रिम जमानत का दायरा और उसकी परिधि सर्वोच्च न्यायालय के तीन महत्त्वपूर्ण निर्णयों में स्पष्ट रूप से परिभाषित की गई है.
मूल्यांकन आरोपों की प्रकृति और seriousness, आरोपी के आपराधिक इतिहास के संदर्भ में किया जाना चाहिए
जिनकी शुरुआत *गुरुबख्श सिंह सिब्बिया बनाम पंजाब राज्य* [(1980) 2 SCC 565] से होती है, जिसके बाद *सिद्धाराम सतलिंगप्पा म्हेत्रे बनाम…* महाराष्ट्र राज्य बनाम (2011) 1 SCC 694 और सुशीला अग्रवाल और अन्य बनाम राज्य (NCT दिल्ली) और अन्य (2020) 5 SCC 1 में, सर्वोच्च न्यायालय ने लगातार यह माना है कि अग्रिम जमानत देते समय, न्यायालय को आवेदक के आवेदन पर विचार करते हुए गिरफ्तारी के खतरे या आशंका का मूल्यांकन करना चाहिए. यह मूल्यांकन आरोपों की प्रकृति और गंभीरता (seriousness), आरोपी के आपराधिक इतिहास, झूठे या बढ़ा-चढ़ाकर लगाए गए आरोपों, हिरासत में पूछताछ की आवश्यकता, जांच और मुकदमे में सहयोग करने की आरोपी की इच्छा, आरोपी के आचरण और उसके भागने के जोखिम के संदर्भ में किया जाना चाहिए.