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Family Court के आदेश से पत्नी से 5 हजार रुपये गुजारा भत्ता पाने वाले पति पर 15 लाख रुपये जुर्माना, हाई कोर्ट ने खारिज की याचिका

Family Court और हाई कोर्ट में गलत व भ्रामक तथ्य पेश करना किसी रियायत से वंचित करने का पर्याप्त कारण: इलाहाबाद HC

Family Court के आदेश से पत्नी से 5 हजार रुपये गुजारा भत्ता पाने वाले पति पर 15 लाख रुपये जुर्माना, हाई कोर्ट ने खारिज की याचिका

उच्च न्यायालय कोई दिखावा करने वाला मंच नहीं है. याचिकाकर्ता ने गलत और भ्रामक तथ्यों के साथ और हाई कोर्ट और Family Court में याचिकाओं और आवेदनों के समर्थन में झूठे हलफनामे दाखिल करते हुए कई बार इस न्यायालय का रुख किया है. महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाना और न्यायसंगत राहत की मांग करते हुए समानांतर उपायों का सहारा लेना उसे कोर्ट द्वारा किसी रियायत का हकदार नहीं बनाता.

इसके आधार पर इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस विनोद दिवाकर की बेंच ने कहा कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत दायर याचिका में ईमानदारी की कमी है और इसमें इस अदालत के पास मौजूद सुपरवाइजरी अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करने की कोई जरूरत नहीं है. इसलिए कोर्ट ने याचिका को खारिज कर दिया और पति पर 15 लाख रुपये का जुर्माना लगाया है.

यह याचिका रणजीत सिंह की तरफ से हाई कोर्ट में दाखिल की गयी थी. इसमें मांग की गयी थी कि Family Court में चल रहे भरण पोषण मामले संख्या 523/2025 की कार्यवाही में तेजी लाई जाए. यह मामला BNSS, 2023 की धारा 144 (पत्नियों, बच्चों और माता-पिता के भरण-पोषण का आदेश) के तहत दायर किया गया था जो ‘रणजीत सिंह बनाम नीतू सिंह’ Family Court इटावा की अदालत में पेंडिंग है.

कोर्ट में पेश किये गये तथ्यों के अनुसार विवाह 2019 में हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार इटावा में संपन्न हुआ. विवाह के समय दोनों पक्ष बेरोजगार थे और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे थे. विवाह के तुरंत बाद पत्नी को इलाहाबाद हाई कोर्ट में ‘अतिरिक्त निजी सचिव’ के पद पर नौकरी मिल गई लेकिन पति को सरकारी नौकरी नहीं मिली. प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हुए याचिकाकर्ता पति ने कानून की पढ़ाई पूरी की और उत्तर प्रदेश बार काउंसिल में एक वकील के रूप में अपना पंजीकरण कराया.

प्रधान न्यायाधीश Family Court प्रयागराज के समक्ष सुनवाई चल रही

भरण-पोषण के आवेदन में पति की तरफ से तर्क दिया गया कि नौकरी मिलने के बाद पत्नी ने याचिकाकर्ता और उसकी माँ के साथ झगड़ा और दुर्व्यवहार शुरू कर दिया. उसने पति को उसके परिवार से अलग करने के लिए हर संभव प्रयास किया और पुलिस को प्रभावित करके याचिकाकर्ता तथा उसके परिवार के सदस्यों के खिलाफ झूठे आपराधिक मुकदमे दायर कर दिए. याचिकाकर्ता के पास आय का कोई स्वतंत्र स्रोत नहीं है. वह एक बेरोजगार युवक है. उसके पास पत्नी से भरण-पोषण की मांग करने के लिए BNSS, 2023 की धारा 144 के तहत आवेदन दायर करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है.

याचिका में जानकारी दी गयी कि पत्नी ने हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13 के तहत तलाक की एक याचिका भी दायर की है जो विवाह केस नंबर 2504/2023 के रूप में पंजीकृत है. जिस पर प्रधान न्यायाधीश Family Court प्रयागराज के समक्ष सुनवाई चल रही है.

दलील दी कि पति ने हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 9 के तहत भी एक आवेदन दायर किया है, जो इटावा के प्रधान न्यायाधीश Family Court के समक्ष केस संख्या 43/2024 के रूप में पंजीकृत है. प्रतिवादी पत्नी ने Family Court कार्यवाही में भाग नहीं लिया है. वास्तव में प्रतिवादी पत्नी ने इस न्यायालय के समक्ष स्थानांतरण आवेदन दायर किया था जिसमें इटावा के Family Court के समक्ष विचाराधीन केस संख्या 43/2024 को स्थानांतरित करने की मांग की गई थी. इस न्यायालय की एक समन्वय पीठ ने 14.11.2024 के आदेश से उक्त कार्यवाही पर रोक लगा दी थी.

प्रतिवादी पत्नी का पक्ष रखते हुए उनके वकील ने कोर्ट को बताया कि याचिकाकर्ता पति एक राजनीतिक परिवार से आता है और उत्तर प्रदेश बार काउंसिल में एक पंजीकृत अधिवक्ता है. याचिकाकर्ता के चाचा इटावा निर्वाचन क्षेत्र से 15वीं लोकसभा के सदस्य रह चुके हैं. उसकी माँ ग्राम प्रधान थीं. याचिकाकर्ता निर्माण के व्यवसाय में भी संलग्न रहा है. याचिकाकर्ता एक धोखेबाज आदतन झूठा और लालची व्यक्ति है. वह एक अय्याशी भरा जीवन जीने के लिए मुफ्त का पैसा चाहता है.

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उन्होंने तर्क दिया कि याचिकाकर्ता का यह पुराना इतिहास है कि वह Family Court और हाई कोर्ट के समक्ष भी झूठे और भ्रामक बयान देता रहा है. उसने कोर्ट को गुमराह करके अपने पक्ष में आदेश हासिल किए जबकि वह प्रतिवादी पत्नी की कमाई से फायदा उठाना जारी रखे हुए था. 2020 में याचिकाकर्ता ने धोखे से पत्नी को जमीन का एक टुकड़ा खरीदने का झूठा वादा करके भरोसे में लिया और पत्नी के सैलरी अकाउंट से 11,50,000 रुपये का पर्सनल लोन ले लिया.

लोन की राशि जमा हो जाने के बाद याचिकाकर्ता ने फिर से 2022 में प्रयागराज में एसबीआई की झलवा ब्रांच में प्रतिवादी के सैलरी अकाउंट से 13,56,000 रुपये का पर्सनल लोन लिया. जिसे छह साल में चुकाना था. प्रतिवादी पत्नी तब से हर महीने 26,020 रुपये की ईएमआई चुका रही है. याचिकाकर्ता ने धोखे से लोन की पूरी रकम UPI के जरिए अपने पर्सनल अकाउंट में ट्रांसफर कर ली और पूरी रकम शराब पीने, ऐशो आराम की जिंदगी जीने और दूसरी गलत हरकतों पर उड़ा दी.

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प्रतिवादी पत्नी के अनुसार जब उसने याचिकाकर्ता से अकाउंट स्टेटमेंट और खर्चीले खर्चों के बारे में पूछा तो शुरू में उसने प्रतिवादी को टाल दिया और उसके बाद उस पर ज़ुल्म करना शुरू कर दिया. उसने प्लॉट देखने की जिद की तो याचिकाकर्ता ने मानसिक और शारीरिक ज़ुल्म करना शुरू कर दिया.

सम्पूर्ण तथ्यों को परखने के बाद बेंच ने कहा कि यह स्वीकार्य है कि विवाह सफल नहीं हो सका और दोनों पक्ष मुकद्दमेबाजी में उलझ गए. रिकॉर्ड से यह भी पता चलता है कि प्रतिवादी पत्नी ने शुरू में अपने वेतन खाते पर 11,50,000 रुपये का पर्सनल लोन लिया था.

6.10.2022 को फिर से 13,56,000/- रुपये का पर्सनल लोन लिया और तब से वह अपने वेतन खाते से 26,020/- रुपये की नियमित मासिक किस्तें चुका रही है. पत्नी के वेतन खाते का विवरण यह भी दर्शाता है कि पति ने लोन की पूरी राशि UPI के माध्यम से अपने सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया के खाते में स्थानांतरित कर दी.

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याचिकाकर्ता ने न तो पिछले तीन वर्षों के बैंक खाते का विवरण संलग्न किया है और न ही बैंक का नाम, शाखा और खाता संख्या आदि जैसे अन्य विवरण प्रदान किए हैं. इस प्रकार यह सुरक्षित रूप से निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि याचिकाकर्ता ने प्रयागराज स्थित प्रधान न्यायाधीश Family Court से आय के मुख्य स्रोत को छिपाया है.

याचिकाकर्ता पति ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 24 के तहत भरण-पोषण की मांग करते हुए 20.05.2025 को एक आवेदन प्रस्तुत किया था जिसे 15.9.2025 के आदेश द्वारा स्वीकार कर लिया गया. इस आदेश में प्रतिवादी-पत्नी को निर्देश दिया गया कि वह याचिकाकर्ता को प्रति माह 5,000 रुपये तथा कानूनी खर्चों के लिए 10,000 रुपये का भुगतान करे.

टिप्पणियाँ केवल इस याचिका पर फैसला करने के लिए हैं और इनका प्रयागराज के Family Court या किसी अन्य न्यायालय में चल रहे मुकदमों पर कोई असर नहीं पड़ेगा. प्रधान न्यायाधीश Family Court कानून के अनुसार मुकदमों का फैसला उनके गुण-दोष के आधार पर करेंगे.
बेंच ने कहा

बेंच ने आगे के लिए जारी किये निर्देश

  • प्रधान न्यायाधीश Family Court प्रयागराज हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13 के तहत वैवाहिक मुकदमा संख्या 2504/2023 (श्रीमती नीतू सिंह बनाम रंजीत सिंह) से संबंधित कार्यवाही में तेजी लाएं और इसका फैसला इस न्यायालय की एक समतुल्य पीठ द्वारा ‘अनुच्छेद 227 के तहत मामले संख्या 12641/2024’ (‘नीतू सिंह बनाम रंजीत सिंह’) में 24.10.2024 के आदेश के माध्यम से व्यक्त किए गए दृष्टिकोण के अनुसार करें.
  • कार्यवाही का फैसला हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 21-B में उल्लिखित समय-सीमा को ध्यान में रखते हुए किया जाए.
  • याचिकाकर्ता के वकील Family Court में हंगामा करते हैं और कोर्ट के अंदर आवाज उठाकर या ऐसा माहौल बनाकर न्याय की प्रक्रिया में बाधा डालते हैं जो मामले के प्रभावी और निष्पक्ष ट्रायल के लिए अनुकूल नहीं है तो मामले की कार्यवाही ‘इन-कैमरा’ (बंद कमरे में) शुरू की जाएगी.
  • पक्षों के बीच लगाए गए आरोपों और जवाबी आरोपों की प्रकृति को ध्यान में रखते हुए पक्षों की गवाही जिसमें जिरह भी शामिल है जहाँ तक संभव हो ‘इन-कैमरा’ ही ली जाएगी.
  • चूंकि पत्नी ने Family Court प्रयागराज द्वारा 15.9.2025 को पारित आदेश को वापस लेने और उसकी समीक्षा करने के लिए एक आवेदन दायर किया है अतः इस आदेश की प्रति प्राप्त होने के चार सप्ताह के भीतर उक्त आवेदन का निपटारा किया जाए.
  • प्रधान न्यायाधीश Family Court यह सुनिश्चित करें कि कोर्ट प्रिमाइस के भीतर प्रतिवादी-पत्नी को पर्याप्त और उचित सुरक्षा व्यवस्था उपलब्ध कराई जाए.
  • प्रधान न्यायाधीश Family Court इस न्यायालय के रजिस्ट्रार (अनुपालन) को एक त्रैमासिक स्थिति रिपोर्ट भी प्रस्तुत करेंगे, जिसमें वे मामले की प्रगति से उन्हें अवगत कराएंगे.
  • प्रतिवादी पति ने महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाकर और शपथ पर झूठे बयान देकर Family Court का दरवाजा खटखटाया है. ऐसे में Family Court के प्रधान न्यायाधीश उपयुक्त चरण पर एक जांच का आदेश दें. इस जांच का उद्देश्य यह परीक्षण करना होगा कि क्या याचिकाकर्ता पति के विरुद्ध झूठा शपथ-पत्र दायर करने और महत्वपूर्ण विवरणों को छिपाने के लिए कानून के अनुसार उचित कार्यवाही शुरू की जानी चाहिए.
  • प्रतिवादी पत्नी को यह स्वतंत्रता होगी कि वह याचिकाओं हलफनामों या किसी भी अन्य सामग्री की प्रमाणित प्रति जिसे वह उचित समझे रिकॉर्ड और संदर्भ के लिए Family Court प्रयागराज के समक्ष प्रस्तुत कर सके.
  • Family Court के न्यायाधीश इससे जुड़े मुद्दे का संज्ञान लेने से पहले अपने स्वतंत्र विवेक का प्रयोग करेंगे.

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खर्चों की वसूली के लिए आगे के निर्देश

याचिकाकर्ता पति इस न्यायालय के रजिस्ट्रार जनरल के पास डिमांड ड्राफ्ट के माध्यम से खर्च की राशि जमा करने में विफल रहता है तो प्रतिवादी-पत्नी के आवेदन पर जिला मजिस्ट्रेट इटावा याचिकाकर्ता को दी गई समय सीमा समाप्त होने के तीन महीने के भीतर उस राशि को भू-राजस्व के बकाया के रूप में वसूल करेंगे.

आदेश की प्रति प्राप्त होने के तुरंत बाद जिला मजिस्ट्रेट इटावा इस आदेश की एक प्रति संबंधित उप-रजिस्ट्रार को भेजेंगे. उप-रजिस्ट्रार यह सुनिश्चित करेंगे कि आज से लेकर खर्च की वसूली होने तक किसी भी प्रकार के विक्रय सौदे की अनुमति न दी जाए.

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डीएम इटावा इस आदेश की प्रति प्राप्त होने के तुरंत बाद, रिकॉर्ड रखने और इस आदेश की शर्तों के अनुपालन के लिए याचिकाकर्ता के स्वामित्व और कब्जे वाली चल और अचल संपत्तियों की जांच हेतु एक समिति का भी गठन करेंगे.

इस न्यायालय के माननीय रजिस्ट्रार जनरल यह सुनिश्चित करेंगे कि इस मामले से संबंधित संपूर्ण रिकॉर्ड को स्कैन किया जाए और भविष्य के संदर्भ के लिए सुरक्षित रखा जाए.

MATTERS UNDER ARTICLE 227 No.12198 of 2025;  Ranjeet Singh V/s Neetu Singh

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