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Kidnapping के संदेह के आधार पर नहीं दी जा सकती सजा, पुख्ता सबूत जरूरी, 43 साल पुराने केस में सात साल की सजा रद

आरोप हत्या का लगा, Kidnapping का आरोप निर्मित नहीं, बिना आरोप Kidnapping की सजा अवैध: हाईकोर्ट

Kidnapping के संदेह के आधार पर नहीं दी जा सकती सजा, पुख्ता सबूत जरूरी, 43 साल पुराने केस में सात साल की सजा रद

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा है कि Kidnapping के आरोप में संदेह के आधार पर सजा नहीं दी जा सकती. इसके लिए Kidnapping का पुख्ता सुबूत होना जरूरी है. कोर्ट ऐसे मामले की सुनवाई कर रही थी जिसमें आरोप हत्या का लगा था. चार्जशीट के आधार पर Kidnapping का आरोप निर्मित ही नहीं हुआ और आरोपित को Kidnapping के आरोप में सात साल की सजा सुना दी गयी थी. कोर्ट ने 43 साल पुराने केस में सात साल की सजा रद करते हुए कहा कि बिना आरोप Kidnapping की धारा में सजा सुनाना अवैध है.

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने यह कहते हुए कि केवल संदेह अथवा शक के आधार पर सजा नहीं दी जा सकती. आइपीसी की धारा 364 (Kidnapping) के तहत अभियुक्त की सात साल की सजा  40 साल बाद रद कर दी है. कोर्ट ने कहा Kidnapping का आरोप कोर्ट ने निर्मित नहीं हुआ, आरोप हत्या का था, जिसमें सत्र अदालत ने बरी कर दिया, तो Kidnapping के आरोप में सजा नहीं दी जा सकती. दोनों अपराध अलग है. मिलते जुलते अपराध नहीं है. बिना आरोप सजा सुनाना गलत है.

जस्टिस अनिल कुमार (दशम) की एकलपीठ  ने पाया कि अभियोजन अभियुक्त विनोद कुमार के खिलाफ Kidnapping का पर्याप्त सबूत नहीं दे सका. अदालत ने कहा, आइपीसी की धारा 364 (Kidnapping) के तहत अपराध साबित करने के लिए यह साबित करना होगा कि अभियुक्त ने Kidnapping किया था और उसकी हत्या करने का इरादा था.

कोर्ट ने कहा, जब अभियुक्त पर केवल धारा 302 आईपीसी के तहत आरोप तय किए गए थे तब धारा 364 (Kidnapping) आइपीसी के तहत उसे दोषी ठहराया जाना महत्वपूर्ण कानूनी मुद्दों को उठाता है जिन पर विचार आवश्यक है.

302 आईपीसी के तहत बरी करने के बाद धारा 364 (Kidnapping) आईपीसी के तहत दोषी क्यों ठहराया

क्या इस प्रकार की दोषसिद्धि बिना विशिष्ट आरोप तय किए और बिना धारा 313 सीआरपीसी के तहत अभियुक्त से प्रासंगिक प्रश्न पूछे बिना दर्ज की जा सकती थी? यह समझना कठिन है कि ट्रायल कोर्ट ने अभियुक्त को धारा 302 आईपीसी के तहत बरी करने के बाद धारा 364 (Kidnapping) आईपीसी के तहत दोषी क्यों ठहराया, खासकर तब जब उसने स्वयं पाया था कि अवैध संबंध का कथित मकसद सिद्ध नहीं हुआ था और उन गवाहों की गवाही, जिन्होंने मृतक को उसकी मृत्यु से पहले अपीलकर्ता के साथ देखने का दावा किया था, विश्वसनीय नहीं थी.

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ट्रायल कोर्ट ने प्रकरण में दो अन्य अभियुक्तों शिव राम शुक्ला और सुनीत कुमार को यह कहते हुए बरी कर दिया था कि महेश सिंह की हत्या का कोई प्रत्यक्षदर्शी नहीं. अपीलार्थी  विनोद को धारा 302 आईपीसी के तहत आरोप से बरी कर करते हुए  धारा 364 (Kidnapping) आईपीसी के तहत सिर्फ इसलिए दोषी ठहराया था कि उसे महेश (मृतक) को ले जाते हुए गवाह क्रमांक एक बैजनाथ ने देखा था. मुकदमे से जुड़े संक्षिप्त तथ्य यह हैं कि बैजनाथ सिंह ने इटावा के बरहपुरा थाना में 23 अक्टूबर 1983 को रिपोर्ट दर्ज कराई थी. इटावा के सत्र न्यायाधीश ने 21 फरवरी 1986 को सजा सुनाई थी.

करूवाडीह ग्राम प्रधान के भ्रष्टाचार के खिलाफ जनहित याचिका पर जवाब तलब

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने प्रयागराज, ब्लाक प्रतापपुर, ग्राम सभा करुवाडीह के प्रधान संतोष पटेल के खिलाफ जिला आपूर्ति अधिकारी की चल रही जांच शीघ्र पूरा करने का निर्देश दिया है और राज्य सरकार से जनहित याचिका में उठाए गये मुद्दों पर जवाब मांगा है. याचिका की अगली सुनवाई 28 अप्रैल को होगी.

यह आदेश चीफ जस्टिस अरुण भंसाली और जस्टिस क्षितिज शैलेन्द्र की बेंच ने जिबरील अहमद की जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए दिया है. याचिका पर अधिवक्ता हितेश मिश्र ने बहस की. इनका कहना है कि ग्राम प्रधान ने विकास कार्य के लिए राज्य सरकार से मिले 80 लाख रूपये का काम अपने भट्ठे व पुत्र की फर्म में जमा किया.

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शासनादेश के अनुसार कोई भी प्रधान स्वयं व परिजनों के नाम से विकास कार्य नहीं करा सकता. इसके बावजूद प्रधान ने अपने ईट-भट्ठे व अपने पुत्र की फर्म के नाम पैसे जमाकर अनियमितता बरती है.जिसकी शिकायत पर जिलाधिकारी प्रयागराज के आदेश पर जिला आपूर्ति अधिकारी मामले की जांच कर रहे हैं. किंतु जांच आगे नहीं बढ़ रही.जिसपर जनहित याचिका दायर की गई है.

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