+91-9839333301

legalbulletin@legalbulletin.in

| Register

बिना Divorce शादीशुदा व्यक्ति किसी तीसरे के साथ लिव-इन में नहीं रह सकता: इलाहाबाद हाई कोर्ट

स्वतंत्रता का अधिकार पूर्ण नहीं है, एक व्यक्ति की स्वतंत्रता वहीं समाप्त हो जाती है जहां दूसरे का वैधानिक अधिकार शुरू होता है

बिना Divorce शादीशुदा व्यक्ति किसी तीसरे के साथ लिव-इन में नहीं रह सकता: इलाहाबाद हाई कोर्ट

कोई व्यक्ति जो पहले से विवाहित है और जिसका जीवनसाथी जीवित है वह बिना पूर्व जीवनसाथी से Divorce लिए किसी तीसरे व्यक्ति के साथ लिव-इन रिलेशनशिप में कानूनी रूप से नहीं रह सकता. इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस विवेक कुमार सिंह की कोर्ट ने यह टिप्पणी उस रिट याचिका को खारिज करते हुए की जो एक ऐसे जोड़े द्वारा दायर की गई थी (दोनों अलग-अलग लोगों से विवाहित थे और बिना Divorce साथ रह रहे थे) जिसमें उन्होंने शांतिपूर्ण जीवन में हस्तक्षेप न करने और सुरक्षा प्रदान करने के लिए निर्देश की कोर्ट से मांग की थी.

याचिकाकर्ताओं का कहना था कि वे पति-पत्नी की तरह साथ रह रहे हैं और उन्हें प्रतिवादियों से जान का खतरा है. राज्य ने इस याचिका का विरोध करते हुए तर्क दिया कि दोनों याचिकाकर्ता पहले से विवाहित हैं और उन्होंने सक्षम न्यायालय से Divorce का डिक्री प्राप्त नहीं किया है इसलिए उनका यह कृत्य अवैध है.

मामले के तथ्यों को ध्यान में रखते हुए अदालत ने प्रारंभ में कहा कि विवाह या लिव-इन रिलेशनशिप में दो सहमति देने वाले वयस्क व्यक्तियों का होना आवश्यक है और इसमें गोत्र जाति और धर्म की अवधारणाएं पीछे छूट जाती हैं.

कोर्ट ने यह भी कहा कि किसी को भी यहां तक कि माता-पिता को भी दो वयस्कों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता में हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं है. जस्टिस सिंह ने स्पष्ट किया कि स्वतंत्रता का अधिकार या व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार पूर्ण नहीं है और एक व्यक्ति की स्वतंत्रता वहीं समाप्त हो जाती है जहां दूसरे व्यक्ति का वैधानिक अधिकार शुरू होता है.

एकल न्यायाधीश ने कहा कि जीवनसाथी को अपने साथी के साथ रहने का वैधानिक अधिकार होता है और इस अधिकार को व्यक्तिगत स्वतंत्रता के नाम पर छीना नहीं जा सकता. हाईकोर्ट ने यह भी जोड़ा कि एक व्यक्ति की स्वतंत्रता दूसरे व्यक्ति के कानूनी अधिकार पर अतिक्रमण नहीं कर सकती.

 “यदि याचिकाकर्ता पहले से विवाहित हैं और उनके जीवनसाथी जीवित हैं तो वे बिना पूर्व जीवनसाथी से Divorce लिए किसी तीसरे व्यक्ति के साथ लिव-इन रिलेशनशिप में कानूनी रूप से नहीं रह सकते. उन्हें विवाह करने या लिव-इन संबंध में प्रवेश करने से पहले सक्षम न्यायालय से तलाक की डिक्री प्राप्त करनी होगी.“
कोर्ट ने की टिप्पणी

कोर्ट ने माना कि इस मामले में याचिकाकर्ताओं के पास संरक्षण मांगने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है क्योंकि मांगी गई सुरक्षा भारतीय दंड संहिता की धारा 494/495 के तहत संभावित अपराध के संरक्षण के समान हो सकती है.

बिना Divorce की डिक्री प्राप्त किए लिव-इन संबंध में रह रहे याचिकाकर्ताओं को संरक्षण देने के लिए कोई रिट आदेश या निर्देश जारी नहीं किया जा सकता

कोर्ट ने कहा यह स्थापित विधि है कि मैंडमस का रिट कानून के विरुद्ध या किसी वैधानिक प्रावधान जिसमें दंडात्मक प्रावधान भी शामिल हैं को विफल करने के लिए जारी नहीं किया जा सकता. न्यायालय का यह मत है कि बिना Divorce की डिक्री प्राप्त किए लिव-इन संबंध में रह रहे याचिकाकर्ताओं को संरक्षण देने के लिए कोई रिट आदेश या निर्देश जारी नहीं किया जा सकता.

अदालत ने रिट जारी करने से इनकार करते हुए याचिका का निस्तारण कर दिया और यह कहा कि यदि याचिकाकर्ताओं के साथ हिंसा होती है तो वे विस्तृत आवेदन के साथ पुलिस अधीक्षक के पास जा सकते हैं.

इसे भी पढ़ें…सह अभियुक्त के इकबालिया बयान चार्जशीट में शामिल नहीं किया जा सकता, लेकिन पुलिस बयान का उपयोग जांच में कर सकती है

ज्ञात हो कि सिंगल जज के आदेश के बाद इसी हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच जस्टिस जेजे मुनीर और जस्टिस तरून सक्सेना ने एक अलग मामले में यह कहा कि यदि कोई विवाहित पुरुष किसी वयस्क महिला के साथ उसकी सहमति से बिना Divorce लिव-इन रिलेशनशिप में रहता है तो यह अपने आप में कोई अपराध नहीं है. डिवीजन बेंच ने यह भी कहा कि नैतिकता और कानून को अलग रखा जाना चाहिए और सामाजिक या नैतिक विचार अदालत के निर्णयों को प्रभावित नहीं कर सकते.

यह टिप्पणी उस मामले में की गई, जिसमें एक लिव-इन जोड़े ने महिला के परिवार से खतरे के मद्देनजर सुरक्षा की मांग की थी. प्रथम दृष्टया मामला बनता हुआ पाते हुए, अदालत ने याचिका स्वीकार की और प्रतिवादियों को नोटिस जारी किया. साथ ही, राज्य के वकील को दो सप्ताह का समय काउंटर एफिडेविट दाखिल करने के लिए दिया.

इसे भी पढ़ें…इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा, लिव-इन रिलेशनशिप मामलों में कानून और सामाजिक नैतिकता को अलग रखना अनिवार्य

पीठ ने जोड़े (18 वर्षीय महिला और एक विवाहित पुरुष) को तत्काल राहत देते हुए यह निर्देश दिया कि अगली सुनवाई तक उन्हें शाहजहांपुर जिले के जैतीपुर थाने में दर्ज भारतीय न्याय संहिता की धारा 87 के तहत दर्ज आपराधिक मामले में गिरफ्तार न किया जाए.

उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए अदालत ने शिकायतकर्ता और महिला के परिवार के सभी सदस्यों को दोनों पक्षों को किसी भी प्रकार की शारीरिक या मानसिक क्षति पहुंचाने से रोका. अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि परिवार के सदस्य उनके वैवाहिक घर में प्रवेश नहीं करेंगे और न ही सीधे, इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से या किसी अन्य के जरिए उनसे संपर्क करेंगे. पीठ ने यह भी कहा कि शाहजहांपुर के पुलिस अधीक्षक व्यक्तिगत रूप से याचिकाकर्ताओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए जिम्मेदार होंगे.

इसे भी पढ़ें…‘Executive Directives न्यायिक निर्देशों को रद्द नहीं कर सकते न ही वे अर्जित अधिकारों को समाप्त कर सकते हैं’

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *