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Criminal Conviction को केवल संभावना या संदेह के आधार पर कायम नहीं रखा जा सकता, 42 साल बाद दो आरोपितों की सजा रद

1983 में हुई थी हत्या, 1984 में सुनायी गयी थी सजा, दो आरोपित हो चुके दिवंगत, जिंदा बजे दो को तत्काल रिहा करने का आदेश

Criminal Conviction को केवल संभावना या संदेह के आधार पर कायम नहीं रखा जा सकता, 42 साल बाद दो आरोपितों की सजा रद

किसी भी Criminal Conviction को केवल संभावना या संदेह के आधार पर कायम नहीं रखा जा सकता. जहाँ रिकॉर्ड पर मौजूद सबूतों से दो अलग-अलग निष्कर्ष निकलते हों, वहाँ आरोपी के पक्ष वाला निष्कर्ष (Criminal Conviction) ही मान्य होना चाहिए. इन सिद्धांतों को वर्तमान मामले के तथ्यों पर लागू करते हुए, यह कोर्ट पाता है कि प्रॉसिक्यूशन, अपीलकर्ताओं नत्थी और भारत को कथित अपराध से जोड़ने वाली परिस्थितियों की एक स्पष्ट और विश्वसनीय कड़ी स्थापित करने में विफल रहा है. सबूतों में विसंगतियाँ हैं, पुष्टि करने वाले सहायक सामग्री का अभाव है और आरोपी की विशिष्ट भूमिका के संबंध में भी सबूतों की कमी है.

इसके साथ ही इलाहाबाद हाई कोर्ट के दो जजों की बेंच ने आगरा में 1983 में हुए हत्याकांड के जिंदा दो आरोपितों नत्थी और भारत के खिलाफ अपर सत्र न्यायाधीश द्वारा सुनायी गयी सजा (Criminal Conviction) को रद कर दिया है और दोनों को तत्काल रिहा करने का आदेश दिया है. इस प्रकरण के दो अन्य अपीलकर्ता की मौत हो जाने के चलते उनकी अपीलें कोर्ट ने समाप्त कर दी हैं. यह फैसला जस्टिस सिद्धार्थ और जस्टिस गरिमा प्रसाद की बेंच ने सुनाया है. इस केस की सुनवाई 10 फरवरी को पूरी होने के बाद फैसला सुरक्षित कर लिया गया था जिसे 12 मार्च को जस्टिस गरिमा प्रसाद ने ब्रीफ किया.

दो जजों की बेंच दो क्रिमिनल (Criminal) अपीलों पर एक साथ सुनवाई कर रहा था. दोनों का फैसला भी एक साथ ही सुनाया गया. ये आपराधिक (Criminal) अपीलें अपर सत्र न्यायाधीश-X, आगरा द्वारा सत्र विचारण संख्या 363/1983 (राज्य बनाम रघुवीर सिंह और अन्य) में 08 फरवरी 1984 को पारित निर्णय और आदेश के विरुद्ध दायर की गई थी.

यह मामला केस क्राइम संख्या 131/1983 से संबंधित है, जो भारतीय दंड संहिता की धारा 302 और 307 के तहत आगरा जनपद के अछनेरा थाने में दर्ज कराया गया था. कोर्ट ने चारों अभियुक्तों रघुवीर सिंह, नत्थी, जगराम और भारत को 302/34 और 307/34 के तहत दोषी (Conviction) ठहराया था. कोर्ट ने सभी को धारा 302/34 के तहत आजीवन कारावास और धारा 307/34 के तहत दस वर्ष के कठोर कारावास की सजा (Conviction) सुनाई थी.

ट्रायल कोर्ट के इस फैसले को आरोपितों ने इलाहाबाद हाई कोर्ट में चैलेंज किया था. वर्तमान अपील के लंबित रहने के दौरान ही अपीलकर्ता रघुवीर सिंह और जगराम का निधन हो गया.  अभियोजन पक्ष के अनुसार घटना 25 मई 1983 को हुई थी. रायभा गाँव के निवासी तेज सिंह, थान सिंह, शैतान सिंह और टीकम सिंह, नहाने के लिए वनखंडी महादेव मंदिर के पास स्थित कुएँ की ओर जा रहे थे. रास्ते में थान सिंह और मड़ीहर गाँव के निवासी नब्बा उर्फ नप्पा के दामाद के बीच कहा-सुनी और हाथापाई हो गयी.

साथ चल रहे लोगों ने बीच-बचाव किया तो तत्समय झगड़ा शांत हो गया. शाम को जब थान सिंह और टीकम सिंह, गंगा सिंह के खेत (चक) में बनी एक झोपड़ी के पास कसरत कर रहे थे, आरोपी रघुवीर सिंह, भरत, नत्थी और जगराम वहाँ पहुंचे. रघुवीर सिंह के पास बंदूक, भरत के पास देसी पिस्तौल और नत्थी तथा जगराम के पास चाकू थे.

वहाँ पहुँचने पर आरोपियों ने यह कहना शुरू कर दिया कि थान सिंह ने नब्बा के दामाद को पीटा था, इसलिए उसे सजा मिलनी चाहिए. इसके बाद नत्थी और जगराम ने थान सिंह पर चाकुओं से वार कर दिया. थान सिंह ने शोर मचाया तो टीकम सिंह, तेज सिंह, शैतान सिंह और अन्य लोग उसे बचाने के लिए दौड़ पड़े. आरोपियों ने टीकम सिंह पर भी चाकुओं से हमला किया.

अभियोजन पक्ष के अनुसार रघुवीर सिंह और भरत ने अपने-अपने हथियारों से गोलियाँ चलाईं. शोर सुनकर और मौके पर जमा हुए लोगों द्वारा ललकारे जाने पर आरोपी घटना स्थल से भाग गए. थान सिंह और टीकम सिंह को गंभीर चोटें आई थीं. थान सिंह की मौत हो गयी. घटना की रिपोर्ट तेज सिंह के कहने पर लिखी गयी थी.

जाँच पूरी होने पर अभियुक्तों के खिलाफ धारा 302 और 307 के तहत चार्जशीट पेश की गई. अपराध केवल सेशन कोर्ट द्वारा ही विचारणीय थे इसलिए मजिस्ट्रेट ने इस मामले को आगरा के सेशन कोर्ट में भेज दिया. चारों अभियुक्तों के खिलाफ IPC की धारा 302/34 और 307/34 के तहत आरोप तय किए गए.

हाई कोर्ट में Criminal अपीलों में जीवित अपीलकर्ताओं के वकील ने विवादित फैसले को इस आधार पर चुनौती दी कि अभियोजन पक्ष के सबूत अविश्वसनीय हैं और उनमें महत्वपूर्ण विरोधाभास और कमियां हैं. यह तर्क दिया गया है कि मूल विवाद मृतक थान सिंह और नप्पा के दामाद के बीच था और ऐसा दिखाने के लिए कोई सबूत नहीं था कि नत्थी और भारत का नप्पा या उस झगड़े से कोई संबंध था.

यह भी तर्क दिया गया है कि रघुवीर सिंह कथित तौर पर आपराधिक (Criminal) गतिविधियों में नप्पा से जुड़ा था लेकिन नत्थी और भारत के संबंध में ऐसे किसी जुड़ाव का कोई सबूत नहीं है. इसके अलावा, यह भी कहा गया है कि रघुवीर सिंह को छोड़कर किसी भी आरोपी का कोई आपराधिक इतिहास नहीं था, और अभियोजन पक्ष जीवित अपीलकर्ताओं की ओर से कोई मकसद साबित करने में विफल रहा है.

AGA ने दलील दी कि थान सिंह की हत्या पूरी तरह से साबित हो चुकी है. तर्क दिया कि एक घायल गवाह है और उसकी गवाही का अधिक महत्व है. यह कि केवल खाली कारतूस का बरामद न होना या जाँच अधिकारी से पूछताछ न होना हर मामले में अभियोजन पक्ष के लिए घातक नहीं होता. तर्क दिया कि निचली अदालत ने अभियोजन पक्ष के सबूतों पर सही भरोसा किया और आरोपी को दोषी ठहराया.

रघुवीर सिंह Criminal गतिविधियों में नप्पा से जुड़ा हुआ था

बेंच ने कहा कि, रिकॉर्ड पर मौजूद सबूत यह दर्शाते हैं कि जिस झगड़े के कारण यह घटना तुरंत घटित हुई, वह थान सिंह और नप्पा के दामाद के बीच हुआ था. ऐसे भी सबूत मौजूद हैं जिनसे यह संकेत मिलता है कि रघुवीर सिंह आपराधिक (Criminal) गतिविधियों में नप्पा से जुड़ा हुआ था. घायल ने स्वयं यह बयान दिया था कि रघुवीर सिंह नप्पा के साथ मिलकर आपराधिक गतिविधियों में शामिल रहा था.

हालाँकि, ऐसा कोई भी ठोस सबूत मौजूद नहीं है जिससे यह साबित हो सके कि नत्थी और भारत का नप्पा या उसके दामाद, किसी से भी कोई संबंध था. नत्थी या भारत की थान सिंह या टीकम सिंह के साथ किसी भी प्रकार की पुरानी दुश्मनी थी. कोर्ट ने माना कि किसी भी प्रकार के ‘मकसद’ (motive) के अभाव में और जब उनकी संलिप्तता से जुड़े सबूत वैसे भी संदिग्ध प्रतीत होते हैं तो यह परिस्थिति और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है.

बेंच ने कहा कि काली राम बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य, (1973) 2 SCC 808 में, सुप्रीम कोर्ट ने माना कि आपराधिक (Criminal) न्यायशास्त्र के ताने-बाने में एक ‘सुनहरा धागा’ (golden thread) पिरोया हुआ है, वह यह है कि अभियोजन पक्ष को अपना मामला ‘उचित संदेह से परे’ (beyond reasonable doubt) साबित करना होगा; और यदि दो दृष्टिकोण संभव हैं, तो वह दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए जो आरोपी के पक्ष में हो. कोर्ट ने आगाह किया कि संदेह, चाहे वह कितना भी मजबूत क्यों न हो, सबूत की जगह नहीं ले सकता.

राजस्थान राज्य बनाम तेजा राम, (1999) 3 SCC 507 में, यह माना गया कि संबंधित गवाहों की गवाही को केवल रिश्तेदारी के आधार पर खारिज नहीं किया जाना चाहिए, बल्कि उसकी सावधानीपूर्वक जाँच की जानी चाहिए. वर्तमान मामले में मुखबिर और मृतक से संबंधित है. हालाँकि यह तथ्य अपने आप में उसकी गवाही को खारिज करने का आधार नहीं है, फिर भी कोर्ट को इसकी सावधानीपूर्वक जाँच करनी चाहिए. ऐसी जाँच करने पर ऊपर बताई गई कमियाँ महत्वपूर्ण हो जाती हैं.

बेंच ने कहा कि अभियोजन पक्ष के सबूतों में कई बड़ी कमियाँ हैं, जैसे कि हमले की जगह पर गवाह की मौजूदगी संदिग्ध होना, गवाहों के बयानों में विरोधाभास, हथियार का बरामद न होना, करीब से गोली चलाने के आरोप के बावजूद खाली कारतूस का बरामद न होना, नत्थी पर चोटों का साफ आरोप न होना, यह न समझा पाना कि टीकम सिंह पर हमला क्यों किया गया, जबकि उसका मूल विवाद से कोई संबंध नहीं था, गवाह का इलाज करने वाले डॉक्टर की गवाही न होना, जाँच अधिकारी की गवाही न होना और नत्थी और भारत के खिलाफ किसी भी ठोस मकसद का अभाव. इन सभी परिस्थितियों को एक साथ देखने पर एक उचित संदेह पैदा होता है.

CRIMINAL APPEAL No. – 639 of 1984 Jag Ram and another Versus State of U.P.
CRIMINAL APPEAL No. – 428 of 1984 Raghubir Singh and Another Versus State of U.P.

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