UP Gangster Rules 2021 के तहत गैंग चार्ट को मंजूरी देने के लिए डीएम के साथ क्यों नहीं बैठ रहे कमिश्नरेट में पुलिस आयुक्त
HC ने राज्य से मांगा स्पष्टीकरण, कमिश्नरेट बन चुके जिलों में ही हो रहा ऐसा, बाकी जिलों में डीएम और पुलिस प्रमुख करते हैं मिटिंग

UP Gangster Rules 2021 के नियम 5(3)(ए) की अनिवार्य शर्त है कि गैंगेस्टर (Gangster) नियम के तहत गैंग चार्ट जारी करने से पहले कमिश्नरेट व्यवस्था से डील हो रहे जिलों में पुलिस आयुक्त और डीएम के बीच मिटिंग क्यों नहीं हो रही है. आदेश के बावजूद डीएम को मिटिंग में क्यों शामिल नहीं किया जा रहा. इस व्यवस्था पर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने राज्य सरकार से स्पष्टीकरण मांगा है. यह आदेश जस्टिस विनोद दिवाकर ने दिया है. जस्टिस विनोद दिवाकर की बेंच यूपी गैंगस्टर (Gangster) और असामाजिक गतिविधियां (रोकथाम) नियम 2021 के तहत एक मामले की सुनवाई कर रही थी जिसमें Gangster एक्ट के अनुसार संतुष्टि के बिना एफआईआर रद्द करने की मांग की गई थी.
सुनवाई के दौरान बेंच ने पाया कि जिन जिलों में कमिश्नरेट सिस्टम लागू किया गया था, वहां गैंग चार्ट को ऐसी मीटिंग में मंजूरी नहीं दी जा रही है जहां डीएम भी मिटिंग का हिस्सा हों. कोर्ट के संज्ञान में यह तथ्य भी आया कि जहां कमिश्नरेट सिस्टम लागू नहीं किया गया है वहां गैंग चार्ट को मंजूरी देने के लिए डीएम और एसएसपी के बीच संयुक्त बैठक होती है. जिन जिलों में कमिश्नरेट व्यवस्था लागू हुई वहां भी पहले इस तरह की मिटिंग हुआ करती थी.
कोर्ट ने राज्य से इस बात पर स्पष्टीकरण मांगा कि यूपी गैंगस्टर्स (Gangster) नियम, 2021 के नियम 5(3)(a) के आदेश के बावजूद जिलाधिकारी को क्यों शामिल नहीं किया जा रहा था, जिसमें गैंग चार्ट को मंजूरी देने के लिए डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट और सीनियर सुपरिटेंडेंट ऑफ पुलिस/पुलिस कमिश्नर के बीच एक जॉइंट मीटिंग अनिवार्य है.
Gangster नियमित रूप से जमानत की शर्तों का उल्लंघन करते हैं और कोर्ट में बार-बार सुनवाई टाली जाती है

यह देखते हुए कि गैंगस्टर (Gangster) नियमित रूप से जमानत की शर्तों का उल्लंघन करते हैं और कोर्ट में बार-बार सुनवाई टाली जाती है. कोर्ट ने कहा कि असल में एक लोकतांत्रिक राज्य की अवधारणा इस बात पर आधारित है कि हर नागरिक न केवल कानून के सामने बराबर है, बल्कि उसे कानून की सुरक्षा का भी उतना ही हक है और एक कल्याणकारी राज्य की नजर में वह उतना ही महत्वपूर्ण है.
प्रशासकों को यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि वे जो फैसले लेते हैं, वे आखिरकार न्याय व्यवस्था को आकार देते हैं और इतिहास न केवल उन फैसलों को दर्ज करता है, बल्कि उन्हें दोहराता भी है. कोर्ट ने कहा कि ‘चुनिंदा जांच’ और ‘चुनिंदा मुकदमा’ कानून के शासन के खिलाफ हैं और अनिवार्य रूप से शासन में जनता के भरोसे को खत्म करते हैं.
राज्य ने ऐसे गैंगस्टरों (Gangster) के खिलाफ मामलों के तेजी से निपटारे के लिए, गवाहों को पेश करने के लिए, गवाह सुरक्षा योजनाओं को ठीक से लागू करने के लिए, कोर्ट में अभियोजन पक्ष के गवाहों को समय पर पेश करने के लिए, या जिला सरकारी वकीलों को कोर्ट को सार्थक सहायता देने के लिए संवेदनशील बनाने के लिए कोई नीति नहीं बनाई है.
इसके अलावा राज्य सरकार का पुलिस पर जवाबदेही तय करने के लिए पुराने जमाने की विभागीय जांचों को छोड़कर कोई कार्यक्रम नहीं है, जो अक्सर इंस्पेक्टर और उससे नीचे के रैंक के अधिकारियों के खिलाफ शुरू की जाती हैं.
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