बर्खास्तगी का Punishment आदेश कानून की कसौटी पर खरा नहीं उतरता, फिर भी याचिकाकर्ता को कोई राहत नहीं दी जा सकती
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने सरकारी मिल को निजी कंपनी द्वारा अधिग्रहित कर लिये जाने के आधार पर खारिज की रिट, लेबर कोर्ट जाने को दी स्वतंत्रता

चोरी के आरोप में अनुशासनात्क कार्रवाई के रूप में कर्मचारी के तीन इंक्रीमेंट रोक की सजा (Punishment) को अपीलीय प्राधिकारी द्वारा बर्खास्तगी तक बढ़ा देने का विवादित आदेश कानून की कसौटी पर खरा नहीं उतरता, फिर भी याचिकाकर्ता को कोई राहत नहीं दी जा सकती क्योंकि जहां वह काम करता था वह सरकारी संस्थान अब प्राइवेट कंपनी के रूप में रन कर रहा है. इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस सौरभ श्याम शमशेरी ने कर्मचारी की रिट याचिका खारिज कर दी है.
कोर्ट ने याचिकाकर्ता को यह स्वतंत्रता दी है कि यदि उसे उचित लगे तो वह लेबर कोर्ट में जा सकता है. लेबर कोर्ट में कोई कार्यवाही शुरू की जाती है तो उसमें हुई किसी भी देरी को माफ किया जा सकता है क्योंकि यह रिट याचिका इस कोर्ट में लगभग 25 वर्षों से लंबित थी. कोर्ट ने कहा कि लेबर कोर्ट एक साल के भीतर उसका निपटारा करेगा.
यह रिट याचिका वर्ष 2000 में दाखिल की गयी थी. कोर्ट का मानना था कि याचिकाकर्ता का मामला मजबूत है. लेकिन, बाद में घटी घटनाओं के कारण, जिनके तहत उत्तर प्रदेश राज्य स्थित चीनी मिल (अर्थात यू.पी. स्टेट शुगरकेन कॉर्पोरेशन, बिजनौर इकाई) का अब विनिवेश कर दिया गया है और उसे एक निजी संस्था ‘वेव इंडस्ट्रीज प्राइवेट लिमिटेड’ द्वारा अधिग्रहित कर लिया गया है. इसके चलते यह रिट याचिका अब विचारणीय नहीं रह गई है.
3 वार्षिक वेतन-वृद्धियों को रोकने की Punishment दी गई थी
बेंच ने माना कि जिन तथ्यों पर कोई विवाद नहीं है वह यह था कि याचिकाकर्ता जो एक मजदूर था को चोरी के आरोप में एक अनुशासनात्मक कार्यवाही का सामना करना पड़ा था. उसे 9/11.6.1998 के आदेश के माध्यम से 3 वार्षिक वेतन-वृद्धियों को रोकने की Punishment दी गई थी. इसके बाद, याचिकाकर्ता ने यूपी चीनी उद्योग के स्थायी आदेश के खंड ‘O’ के तहत एक अपील दायर की. अपीलीय प्राधिकारी ने 17.12.1999 के आदेश द्वारा उसे सेवा से बर्खास्त करने का Punishment आदेश पारित कर दिया गया.
कोर्ट ने माना कि याचिकाकर्ता के अधिवक्ता के इस तर्क में सार्थकता प्रतीत होती है कि किसी वैधानिक अपील में Punishment बढ़ाने की कोई विशिष्ट शक्ति न होने के कारण वह विवादित Punishment आदेश जिसके द्वारा सजा को ‘तीन वार्षिक वेतन-वृद्धियों की स्थायी रोक’ से बढ़ाकर ‘सेवा से बर्खास्तगी’ कर दिया गया था, कानूनी रूप से मान्य नहीं रह सकता.
कोर्ट ने इस न्यायालय द्वारा ‘Ravi Kumar बनाम State of U.P. और 3 अन्य’ (2024:AHC:85116-DB) मामले में पारित निर्णय का भी संज्ञान लिया. बेंच ने कहा कि आज कोई आदेश पारित करने में एक कानूनी बाधा मौजूद है, क्योंकि अब यह रिट याचिका बाद में घटित हुई घटनाओं के कारण सुनवाई योग्य नहीं रह गई है.
बेंच ने अपने आदेश में माना है कि ‘R.S. Madireddy’ मामले में विधि की जिस स्थिति का उल्लेख किया गया है, उस पर याचिकाकर्ता के विद्वान अधिवक्ता द्वारा भी कोई विवाद नहीं उठाया गया है. संदर्भ हेतु उस निर्णय के प्रासंगिक पैराग्राफ (अनुच्छेद) नीचे उद्धृत किए जा रहे हैं:
“38. रिट जारी करने का प्रश्न केवल तभी उत्पन्न होगा, जब रिट याचिका पर निर्णय लिया जा रहा हो. भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के अंतर्गत असाधारण रिट क्षेत्राधिकार के प्रयोग से संबंधित प्रश्न केवल उसी तिथि को उत्पन्न होगा, जिस तिथि को रिट याचिकाओं को विचार और निर्णय हेतु सुनवाई के लिए लिया गया था. प्रतिवादी जो कि नियोक्ता है, उस तिथि को एक सरकारी संस्था थी.”
रिट याचिकाओं को दायर करने के बाद, उन पर फैसला आने में काफी देर हो गई; तब तक कंपनी का विनिवेश हो चुका था और उसे किसी निजी पक्ष ने अपने कब्जे में ले लिया था. चूंकि प्रतिवादी नियोक्ता का विनिवेश हो चुका था और वह एक निजी संस्था बन गई थी जो कोई सार्वजनिक कार्य नहीं कर रही थी, इसलिए हाई कोर्ट ऐसी निजी संस्था के खिलाफ रिट जारी करने के लिए अपनी असाधारण रिट अधिकार-क्षेत्र का इस्तेमाल नहीं कर सकता था.
डिवीजन बेंच ने अपीलकर्ताओं के उपचार पाने के अधिकारों की रक्षा का पूरा ध्यान रखा है; इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि इस मामले में अपीलकर्ताओं को न्याय से वंचित किया गया है. बात बस इतनी है कि अपीलकर्ताओं को अपना उपचार पाने के लिए किसी दूसरे मंच पर जाना होगा.
किसी भी तरह से रिट याचिकाओं के निपटारे में हुई देरी को उन याचिकाओं को जारी रखने और बनाए रखने का आधार नहीं माना जा सकता क्योंकि जिस मंच (हाई कोर्ट) में ये रिट याचिकाएं दायर की गई थीं, वह उस निजी प्रतिवादी के खिलाफ रिट जारी नहीं कर सकता था, जिसका स्वामित्व इस बीच बदल चुका था.