Non Cognizable Offence में पुलिस रिपोर्ट ‘शिकायत’, समन से पहले आरोपी की बात सुनी जानी चाहिए, समन आर्टिकल 21 का उल्लंघन

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि non cognizable (असंज्ञेय) अपराध के लिए फाइल की गई चार्जशीट को मजिस्ट्रेट द्वारा शिकायत माना जाना चाहिए, न कि पुलिस केस या स्टेट केस की तरह ट्रीट करना चाहिए. यह भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) के सेक्शन 2(1)(h) के एक्सप्लेनेशन के अनुसार है. ऐसे मामलों में ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट आरोपी को सुनवाई का मौका दिए बिना समन जारी नहीं कर सकता. ऐसा करना BNSS की धारा 223(1) के पहले प्रोविजो के तहत जरूरी है.
यह कमेंट जस्टिस प्रवीण कुमार गिरी की बेंच ने शाहजहांपुर में ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट द्वारा non cognizable अपराध के लिए पास किए गए कॉग्निजेंस-कम-समन ऑर्डर को रद्द करते हुए किया. कोर्ट ने समन जारी करने को भारत के संविधान के आर्टिकल 21 का उल्लंघन बताया.
कोर्ट ने कहा कि संबंधित मजिस्ट्रेट ने न तो non cognizable ऑफेंस बताने वाली चार्जशीट/पुलिस रिपोर्ट को कंप्लेंट में बदला और न ही BNSS की धारा 210(1)(a) के तहत कॉग्निजेंस लेकर शिकायत पर शुरू किए गए ‘समन-केस के ट्रायल’ के तौर पर आगे बढ़ने में गलती की.
दूसरे शब्दों में, कोर्ट ने BNSS की धारा 210(1)(b) के तहत कॉग्निजेंस लेने और आवेदक को सुनवाई का मौका दिए बिना समन भेजने में संबंधित मजिस्ट्रेट के काम में गलती पाई. साथ ही गलती से शिकायत के बजाय पुलिस रिपोर्ट पर शुरू किए गए समन-केस के ट्रायल के तौर पर आगे बढ़ा. यह मामला पड़ोसियों के बीच टॉयलेट वेस्ट ड्रेनेज को लेकर हुए झगड़े से जुड़ा था.
BNS की धारा 115(2) और 352 के तहत non cognizable Report (NCR) दर्ज की गई
शिकायत करने वाले ने आरोप लगाया कि आरोपी ने गलत तरीके से सोक-पिट टॉयलेट बनाया, जिससे गंदा पानी उसके घर के सामने खुले नाले में बहता था. 10 अगस्त, 2024 को झगड़ा बढ़ गया, जिसके बाद कथित तौर पर गाली-गलौज और मारपीट हुई. इसके बाद BNS की धारा 115(2) और 352 के तहत एक non cognizable रिपोर्ट (NCR) दर्ज की गई.
मजिस्ट्रेट द्वारा अधिकृत जांच के बाद, पुलिस ने चार्जशीट पेश की. ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट ने इस चार्जशीट पर अपराध का संज्ञान लिया और इसे BNSS की धारा 210(1)(b) के तहत पुलिस रिपोर्ट माना. फिर मजिस्ट्रेट ने आरोपी को समन भेजा और पुलिस रिपोर्ट पर शुरू किए गए समन-केस के ट्रायल का सामना करने के लिए कहा.

इस आदेश को चुनौती देते हुए आरोपी ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया. हाईकोर्ट ने देखा कि मजिस्ट्रेट ने गलती से धारा 210(1)(a) (कम्प्लेंट पर कॉग्निजेंस) के बजाय धारा 210(1)(b) (पुलिस रिपोर्ट पर कॉग्निजेंस) के तहत कार्रवाई की.
हाईकोर्ट ने साफ किया कि केस को पुलिस केस के बजाय कम्प्लेंट मानना टेक्निकल ही नहीं है, बल्कि यह आरोपी के असली अधिकारों और ट्रायल के तरीके पर भी असर डालता है. कोर्ट ने जोर दिया कि BNSS की धारा 223 के तहत आरोपी को सुनवाई का मौका दिए बिना मजिस्ट्रेट किसी अपराध (शिकायत पर) का संज्ञान नहीं लेगा.
जस्टिस गिरी ने कहा कि शिकायत पर शुरू किए गए समन-केस के ट्रायल में BNSS की धारा 279 लागू होती है. इसलिए अगर शिकायतकर्ता पेश नहीं होता है या उसकी मौत हो जाती है, तो मजिस्ट्रेट आरोपी को बरी कर देगा. कहा कि यह नियम पुलिस रिपोर्ट (BNSS की धारा 281) पर शुरू किए गए मामलों में उपलब्ध नहीं है, जहां डिस्चार्ज का मतलब बरी होना नहीं है.
शिकायत पर शुरू किए गए समन केस के ट्रायल में मजिस्ट्रेट की ट्रायल कोर्ट के पास BNSS की धारा 279 के तहत आरोपी को बरी करने का अधिकार है, अगर शिकायत करने वाला गैर-हाजिर हो या उसकी मौत हो गई हो, लेकिन BNSS की धारा 281 के तहत पुलिस रिपोर्ट पर शुरू किए गए समन केस के ट्रायल में मजिस्ट्रेट की ट्रायल कोर्ट के पास शिकायत करने वाले के गैर-हाजिर होने या उसकी मौत होने पर आरोपी को बरी करने का अधिकार नहीं है.
BNSS की धारा 280 शिकायत करने वाले को फाइनल ऑर्डर पास होने से पहले शिकायत वापस लेने की इजाजत देता है. यह खास तौर पर शिकायत वाले केस के लिए है और इस नियम का फायदा पुलिस केस में लागू नहीं होता है. हाईकोर्ट ने कहा कि ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट ने गलती से BNSS के नियमों का उल्लंघन करते हुए कॉग्निजेंस-कम-समन ऑर्डर पास कर दिया.
इसलिए समन ऑर्डर रद्द करते हुए हाईकोर्ट ने मामला ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट को वापस भेज दिया. कोर्ट ने निर्देश दिया कि पुलिस रिपोर्ट (चार्ज-शीट) को, जहाँ तक उसमें किसी नॉन-कॉग्निजेबल अपराध के होने का खुलासा होता है, शिकायत’ माना जाए. शिकायत मामलों में लागू नियमों के अनुसार सख्ती से आगे बढ़ें. बेंच ने संबंधित मजिस्ट्रेट को यह भी निर्देश दिया कि भविष्य में समन ऑर्डर पास करते समय ज़्यादा सावधानी बरतें.
CRIMINAL APPEAL No. – 1434 of 2016 Raju Batham Versus State of U.P
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