Child Marriage का उन्मूलन की अधिनियम की धारा 10 और 11 केवल एक वैधानिक लक्ष्य नहीं बल्कि यह एक संवैधानिक अनिवार्यता
इलाहाबाद HC ने नाबालिग से शादी करने पर दर्ज करायी गयी एफआईआर को रद करने से किया इंकार, IO को कार्रवाई की छूट

Child Marriage का उन्मूलन केवल एक वैधानिक लक्ष्य नहीं है, बल्कि यह एक संवैधानिक अनिवार्यता है. 2006 का अधिनियम यह अनिवार्य करता है कि जैसे ही पुलिस को Child Marriage संपन्न होने या पूरा होने की जानकारी मिलती है वे तुरंत कड़ी कार्रवाई करें. ऐसा इसलिए किया जाना चाहिए ताकि अधिनियम की धारा 10 और 11 के तहत, ऐसे अवैध Child Marriage को संपन्न कराने के जिम्मेदार सभी लोगों पर मुकदमा चलाया जा सके.
इस कमेंट के साथ इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस जस्टिस राजीव गुप्ता और जस्टिस अजय कुमार-II की बेंच ने आजाद अंसारी और उनके परिवार के सदस्यों की तरफ से नाबालिग लड़की के अपहरण की एफआईआर रद करने की मांग में दाखिल याचिका को खारिज कर दिया है और जांच अधिकारी को निर्देश दिया है कि वे इस मामले को 2006 के अधिनियम के प्रावधानों के परिप्रेक्ष्य से देखें और जांच पूरी करते हुए कानून के अनुसार आगे की कार्रवाई करें.
इस रिट याचिका के माध्यम से थाना महुवाडीह, जिला देवरिया में केस क्राइम संख्या 0068/2026 के अंतर्गत धारा 137(2), 87, 61(2), 316(2) BNS के तहत 02.04.2026 को दर्ज की गई एफआईआर को रद्द करने की मांग की गई थी. एफआईआर में आरोप है कि प्रतिवादी संख्या 3 की बेटी युवती जिसकी आयु लगभग 15 वर्ष है. वह कक्षा 9 की छात्रा है. युवती को भगा ले जाने का आरोपित आजाद अंसारी उसके पड़ोस में रहता है.
युवती का निकाह (Child Marriage) मुस्लिम रीति-रिवाजों के अनुसार संपन्न करा दिया था, किंतु विदाई (गौना) अभी शेष थी
आरोप है कि युवती अपने घर से सोने के आभूषण और 20,000 रुपये नकद लेकर निकली थी. आरोप के अनुसार आजाद अंसारी उसके घर आता जाता था और युवती पर बुरी नजर रखता था. इसी के चलते युवती का निकाह (Child Marriage) मुस्लिम रीति-रिवाजों के अनुसार संपन्न करा दिया था, किंतु विदाई (गौना) अभी शेष थी.
युवती के पिता ने इसकी सूचना पुलिस थाने को दी लेकिन पुलिस द्वारा कोई कार्रवाई नहीं की गयी. इसके बाद उन्होंने डाक से इसकी सूचना पुलिस अधीक्षक देवरिया को दी. यहां से भी कोई रिस्पांस न मिलने पर कोर्ट का सहारा लिया गया जिसके आदेश पर एफआईआर दर्ज की गई.
याचिकाकर्ताओं के वकील ने दलील दी कि याचिकाकर्ता युवक और उसके परिवार के सदस्य को झूठा फंसाया गया है. युवती की शादी (Child Marriage) पहले उसकी मर्जी के खिलाफ कर दी गई थी. युवती वास्तव में आजाद से शादी करना चाहती थी. इसलिए अब दोनों ने अपनी मर्जी से शादी (Child Marriage) कर ली है और दोनों साथ रह रहे हैं. तर्क दिया कि युवती बालिग है और उसने अपनी मर्जी से शादी की है, इसलिए याचिकाकर्ता नंबर 2 और 3 के खिलाफ कोई भी अपराध नहीं बनता है.
सरकार की तरफ से पक्ष रखते हुए अधिवक्ता ने तर्क दिया कि याचिकाकर्ता नंबर 1 एक नाबालिग लड़की है. वर्तमान समय में उसकी उम्र काफी कम है. याचिकाकर्ता नंबर 2 युवक उसे बहला-फुसलाकर अपने साथ भगा ले गया ताकि उसे उससे शादी करने के लिए मजबूर किया जा सके. स्टेट की ओर से दलील दी गई कि युवक को पूरी तरह पता था कि लड़की नाबालिग है.
इस स्थिति में दोनों की शादी Child Marriage के अन्तर्गत आती है जो Child Marriage निषेध अधिनियम, 2006 के प्रावधानों के तहत दंडनीय अपराध है. कहा गया कि युवक ने इस अपराध को अंजाम देने के लिए साजिश रची थी. इसके आधार पर प्रार्थना की गई कि एफआईआर रद्द करने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी जानी चाहिए.
दोनों पक्षकारों की दलीलों और आरोपियों पर लगे आरोपों पर विचार करने के बाद बेंच ने पाया कि इस चरण पर युवक और उसका साथ देने वाले तीसरे याचिकाकर्ता के खिलाफ प्रथम दृष्टया मामला बनता है. कोर्ट ने कहा कि उत्तर प्रदेश में बाल विवाह (Child Marriage) बढ़ रहे हैं क्योंकि यूपी पुलिस ऐसे गैर-कानूनी विवाहों के दूल्हों और मदद करने वालों पर ‘बाल विवाह (Child Marriage) निषेध अधिनियम 2006’ के तहत केस दर्ज करने में नाकाम रही है.
कोर्ट ने कहा कि आज तक उसके सामने एक भी ऐसा मामला नहीं आया जिसमें पुलिस ने 2006 के Child Marriage अधिनियम की धारा 10 (Child Marriage कराने पर सजा) और धारा 11 (Child Marriage को बढ़ावा देने या उसकी इजाजत देने पर सजा) के तहत किसी नाबालिग लड़की से शादी करने वाले आरोपी या ऐसे गैर-कानूनी विवाह को संपन्न कराने के लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई की हो.
दो जजों की बेंच ने पुलिस महानिदेशक को निर्देश दिया कि वे राज्य के सभी पुलिस कमिश्नरों/एसएसपी/एसपी को जरूरी निर्देश, गाइडलाइंस और सर्कुलर जारी करें, ताकि ऐसे मामलों में उचित कार्रवाई सुनिश्चित की जा सके. बेंच ने यूपी के डीजीपी को निर्देश दिया कि वे इन निर्देशों का पालन सुनिश्चित करें और इस सामाजिक बुराई को पूरी ताकत से खत्म करें.
“…जब भी पुलिस को बाल विवाह (Child Marriage) के बारे में पता चले, चाहे किसी शिकायत के जरिए, जांच के दौरान या खुद संज्ञान लेते हुए तो बाल विवाह (Child Marriage) के संज्ञेय अपराध के मामले में बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006 की धारा 10 और 11 के तहत बाल विवाह कराने के लिए जिम्मेदार सभी लोगों के खिलाफ बिना किसी देरी के कानूनी कार्रवाई शुरू की जाए.”
बेंच ने कहा
केस पर सुनवाई के बाद अपने फैसले में बेंच ने मेंशन कराया कि, आरोप गंभीर प्रकृति के हैं इसलिए विवादित एफआईआर से युवक और उसका साथ देने वाले द्वारा संज्ञेय अपराध को अंजाम दिये जाने का संकेत मिलता है. दोनों के खिलाफ पर्याप्त सुबूत पहले ही जांच करने वाले अधिकारी जुटा चुके हैं. इस स्थिति में इस चरण पर विवादित एफआईआर को रद्द नहीं किया जा सकता.

बेंच ने तथ्यों को परखने के बाद यह भी पाया कि जांच अधिकारी दूल्हे के साथ शादी कराने वालों के खिलाफ बाल विवाह (Child Marriage) निषेध अधिनियम, 2006 की धारा 10 और 11 के इन प्रावधानों का इस्तेमाल नहीं करते हैं, जिसके कारण बाल विवाह (Child Marriage) की घटनाएं दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही हैं. चूंकि बाल विवाह (Child Marriage) निषेध अधिनियम के प्रावधानों के तहत ऐसे अवैध बाल विवाह कराने के लिए जिम्मेदार सभी लोगों पर मुकदमा चलाने के लिए कोई कार्रवाई नहीं की जा रही है.
बेंच ने निराशा व्यक्त की कि जांच अधिकारी अक्सर इन प्रावधानों की अनदेखी करते हैं. ऐसे विवाहों को सुगम बनाने वाली संस्थाओं की कार्यप्रणाली पर कड़ी आपत्ति जताते हुए बेंच ने कहा कि यहां तक कि ऐसे अवैध बाल विवाह कराने वाले सामाजिक और धार्मिक संगठन बच्ची के आधार कार्ड या उसके हलफनामे का सहारा लेते हैं. वह इस तथ्य पर भी ध्यान नहीं देते कि आधार कार्ड जन्मतिथि या उम्र को प्रमाणित करने का वैध दस्तावेज नहीं है.
इस स्थिति में किसी भी धार्मिक या सामाजिक संगठन द्वारा नाबालिग बच्ची की उम्र के स्पष्ट प्रमाण के अभाव में अवैध बाल विवाह (Child Marriage) नहीं कराया जा सकता और न ही इसे मान्यता दी जा सकती है. बेंच ने कहा कि ऐसे केसेज में नाबालिग लड़की की तरफ से बालिग होने को लेकर हलफनामा दिये जाने के आधार पर उसे बालिग नहीं माना जा सकता.
मुस्लिम रीति-रिवाजों के तहत विवाह के याचिकाकर्ताओं के दावे का जवाब देते हुए बेंच ने ‘इंडिपेंडेंट थॉट बनाम भारत संघ और अन्य’ (2017) मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि बच्चों से संबंधित एक धर्मनिरपेक्ष अधिनियम होने के नाते 2006 के अधिनियम के प्रावधान, जहां तक बच्चों का संबंध है, हिंदू विवाह अधिनियम और मुस्लिम विवाह और तलाक अधिनियम दोनों के प्रावधानों पर प्रभावी होंगे.