पत्नी को 25% और नाबालिग बच्चों को 15% Maintenance के लिए आर्थिक सहायता प्रदान करना पति का पवित्र कर्तव्य : हाई कोर्ट
पत्नी की रिवीजन याचिका स्वीकार, पति की खारिज, केस दाखिल होने की तिथि से देना होगा Maintenance, राशि कोर्ट ने तय की

सुप्रीम कोर्ट द्वारा रजनीश बनाम नेहा मामले में सुनाये गये फैसले में Maintenance के मामलों में दी गयी व्यवस्था पर भरोसा करते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय की गयी व्यवस्था का पालन प्रदेश की हर कोर्ट में होना अनिवार्य है. इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि पत्नी और नाबालिग बच्चों को आर्थिक सहायता (Maintenance) प्रदान करना पति का पवित्र कर्तव्य है इसलिए यदि पति शारीरिक रूप से सक्षम है तो उसे शारीरिक श्रम करके भी धन अर्जित करना आवश्यक है, और वह अपने इस दायित्व से बच नहीं सकता.
इस व्यवस्था देने के साथ ही इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस डॉ अजय कुमार-II की बेंच ने क्रिमिनल रिवीजन संख्या 223/2024 को स्वीकार करते हुए क्रिमिनल रिवीजन संख्या 51/2024 को खारिज कर दिया है. यह आपराधिक पुनरीक्षण याचिका श्रीमती साधना (पत्नी) द्वारा अपर प्रधान न्यायाधीश परिवार न्यायालय बुलंदशहर द्वारा भरण-पोषण वाद संख्या 829/2019 (श्रीमती साधना उर्फ साक्षी व अन्य बनाम जितेंद्र सिंह सोम) में धारा 125 सीआरपीसी (Maintenance) के अंतर्गत थाना पहासू जिला बुलंदशहर में पारित आदेश के विरुद्ध दायर की गयी थी.
इस आदेश के द्वारा अधीनस्थ न्यायालय ने पुनरीक्षणकर्ताओं की धारा 125 सीआरपीसी के अंतर्गत प्रस्तुत अर्जी को स्वीकार कर लिया था और विपक्षी पक्ष संख्या 2 (पति) को यह निर्देश दिया था कि वह अर्जी दाखिल करने की तिथि से लेकर वर्तमान आक्षेपित निर्णय और आदेश पारित होने की तिथि तक पत्नी को 8,000/- रुपये और बेटे को 12,000/- रुपये Maintenance का भुगतान करे. पुनरीक्षणकर्ताओं ने याचिका के माध्यम से अधीनस्थ न्यायालय द्वारा निर्धारित Maintenance की राशि को अर्जी दाखिल करने की तिथि से ही 20,000/- रुपये से बढ़ाकर 75,000/- रुपये प्रति माह कर दिये जाने की मांग की थी.
क्रिमिनल रिवीजन नंबर 51/2024 जितेंद्र सिंह सोम (पति) द्वारा दायर किया गया. इसमें प्रार्थना की गई कि अतिरिक्त प्रधान न्यायाधीश, फैमिली कोर्ट बुलंदशहर द्वारा Maintenance केस नंबर 829/2019 (श्रीमती साधना उर्फ साक्षी और अन्य बनाम जितेंद्र सिंह सोम) में पारित निर्णय और आदेश को रद्द कर दिया जाए. दोनों क्रिमिनल रिवीजन एक ही विवादित निर्णय और आदेश से प्रभावित थे, इसलिए कोर्ट ने दोनों मामलों की एक साथ सुनवाई की.
रिविजन करने वालों के वकील ने तर्क दिया कि विपक्षी नंबर 2 (पति) का रिविजन करने वाली पत्नी के साथ दूसरा विवाह है. ससुराल वालों की मांग पर विवाह में बड़ी धनराशि खर्च की गयी और घर-गृहस्थी का पूरा सारा सामान दिया गया. पति और उसके परिवार के सदस्य दहेज से संतुष्ट नहीं थे और 10 लाख रुपये के अतिरिक्त दहेज तथा एक स्विफ्ट कार की मांग कर रहे थे.
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अतिरिक्त दहेज की मांग पूरी नहीं हुई तो उसका मानसिक और शारीरिक उत्पीड़न करना शुरू कर दिया. किसी अन्य महिला के साथ अवैध संबंध और अतिरिक्त दहेज की मांग पूरी न होने के कारण उसे गर्भावस्था के दौरान ससुराल से निकाल दिया गया था. बेटे का जन्म उनके वैवाहिक मिलन से मायके में हुआ था. इस संबंध में धारा 498A, 323, 504 IPC और डीपी एक्ट के तहत क्रिमिनल केस नंबर 481/2017 दायर किया है.
अधिनियम जिसके अंतर्गत न्यायिक मजिस्ट्रेट, खुर्जा जिला बुलंदशहर ने पति और उसके माता-पिता को विचारण का सामना करने हेतु समन जारी किया है. इस मामले में तीनों को जमानत मिल चुकी है. पत्नी की तरफ से कहा गया कि उसकी कोई देखभाल नहीं की है और न ही उनके बेटे के जन्म के बाद कोई Maintenance राशि दी है. उसके पास Maintenance के लिए आय का कोई स्रोत नहीं है इसलिए उसने Maintenance याचिका दायर की.
जिसमें पति ट्रायल कोर्ट के समक्ष उपस्थित हुआ और अपना लिखित जवाब प्रस्तुत किया लेकिन अपनी वास्तविक आय का खुलासा नहीं किया. पत्नी की ओर से पति की सैलरी स्लिप प्रस्तुत की गई जिससे पता चला की एक वह प्राइवेट कंपनी में इंजीनियर के रुप में काम करता है और उसकी सैलरी प्रति माह 1,94,860/- रुपये है.
पुनरीक्षणकर्ता के पास स्वयं और अपने बेटे के Maintenance के लिए आय का कोई स्रोत नहीं

यह भी तर्क दिया गया कि पुनरीक्षणकर्ता के पास स्वयं और अपने बेटे के Maintenance के लिए आय का कोई स्रोत नहीं है. निचली अदालत ने रिकॉर्ड पर उपलब्ध साक्ष्यों का सही ढंग से मूल्यांकन नहीं किया है इसलिए, विवादित आदेश में संशोधन किया जाना चाहिए. जिसके तहत उसे 75,000/- रुपये प्रति माह भरण-पोषण (Maintenance) देने का निर्देश दिया जाए. आगे कहा गया कि पति के पहले विवाह से एक पुत्री है. पहली पत्नी से तलाक के बारे में भी उसे जानकारी नहीं दी गयी.
पति के वकील और राज्य की तरफ से AGA ने आपराधिक पुनरीक्षण याचिका का कड़ा विरोध किया और तर्क दिया कि विवादित निर्णय और आदेश फाइल पर उपलब्ध तथ्यों के आधार पर पारित किया गया है. पति के वकील ने तर्क दिया कि विवाह हिंदू रीति-रिवाजों और परंपराओं के अनुसार बिना किसी दहेज की मांग के संपन्न हुआ था. तब पत्नी एक निजी नौकरी में थी. कहा गया कि याचिकाकर्ता बहुत महत्वाकांक्षी है और वह ससुराल के लोगों के साथ सहज महसूस नहीं करती थी. जब उसके पिता बीमार पड़ गए तो वह उनकी देखभाल करने की जगह ससुराल छोड़कर चली गई.
उसने पत्नी को साथ रहने के लिए मनाने और राजी करने का प्रयास किया. ‘दाम्पत्य अधिकारों की बहाली’ के लिए एक मुकदमा भी दायर किया. लगातार प्रयासों के कारण, वह दो अवसरों पर घर वापस आई लेकिन फिर से अपने मायके चली गई और झूठे तथा बेबुनियाद आधारों पर उसके खिलाफ धारा 125 सीआरपीसी (Maintenance) के तहत एक आवेदन दायर कर दिया.
याचिकाकर्ता एक पढ़ी-लिखी महिला है और उसने फैशन डिजाइनिंग में पोस्ट ग्रेजुएट डिग्री हासिल की है. वह अपना गुजारा खुद कर सकती है. उसने अपने लिखित बयान के समर्थन में अपनी देनदारियों से जुड़े सभी दस्तावेजी सबूत पेश किए. प्रधान न्यायाधीश, फैमिली कोर्ट ने रिकॉर्ड पर मौजूद सबूतों पर ठीक से विचार किए बिना ही याचिकाकर्ता द्वारा दायर अर्जी को मंजूर कर लिया. फैमिली कोर्ट का आदेश कानून के मुताबिक नहीं है इसलिए इस कोर्ट द्वारा इसमें दखल दिया जाना जरूरी है. गुजारिश की गई कि क्रिमिनल रिवीजन नंबर 223/2024 को खारिज कर दिया जाए.
तथ्यों को परखने पर कोर्ट ने पाया कि ट्रायल कोर्ट ने फैसले में यह निष्कर्ष दर्ज किया है कि याचिकाकर्ता पत्नी के पास अपने पति से अलग रहने का एक उचित कारण है, और इसलिए वह अपने माता-पिता के घर में रह रही है. जितेंद्र सिंह सोम द्वारा दायर हलफनामे की, कानून के ऊपर बताए गए स्थापित सिद्धांतों की रोशनी में जांच करने पर यह पता चलता है कि उन्होंने अपने हलफनामे में पिता रामभूल सिंह, माता मुनेश देवी और उनकी बहन रजनी सोम को अपने उपर आश्रित दिखा है. जबकि क्रास एग्जामिनेशन में पता चला कि उसके पिता पेंशन प्राप्त करते हैं. हलफनामे में उन्होंने कहा है कि उन्हें प्रति माह 1,25,000 रुपये का वेतन हाथ में मिलता है.
उन्होंने अपने द्वारा प्राप्त अन्य लाभों और भत्तों का खुलासा नहीं किया है. यह जरूर बताया है कि वह अपनी पहली पत्नी से जन्मी बेटी कनक को प्रति माह 5,000/- रुपये भरण-पोषण (Maintenance) दे रहा है. उसने खुद को आयकर दाता बताया लेकिन न तो पे स्लिप पेश किया और न ही बैंक खाते का डिटेल शेयर किया. कोर्ट ने माना कि इसका अर्थ यह है कि पति ने जानबूझकर अपनी वास्तविक आय दर्शाने वाले महत्वपूर्ण दस्तावेजों को ट्रायल कोर्ट से छिपाया है. हलफनामे की एक साधारण विस्तृत जाँच की गई होती तो ट्रायल कोर्ट द्वारा ये सभी जानबूझकर की गई छिपाने की हरकतें आसानी से पकड़ में आ जातीं.
कोर्ट ने अपने फैसले में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा रजनीश बनाम नेहा (2021) 2 SCC 324 मामले में सुनाये गये फैसले का जिक्र किया जिसमें कहा गया है कि पत्नी और नाबालिग बच्चों को आर्थिक सहायता प्रदान करना पति का पवित्र कर्तव्य है, इसलिए यदि पति शारीरिक रूप से सक्षम है तो उसे शारीरिक श्रम करके भी धन अर्जित करना आवश्यक है, और वह अपने इस दायित्व से बच नहीं सकता.
रजनीश बनाम नेहा और कुलभूषण कुमार (डॉ.) बनाम राज कुमारी, (1970) 3 SCC 129 मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि भरण-पोषण (Maintenance) भत्ता पति की शुद्ध आय के 25% तक पत्नी को और उनकी शुद्ध आय के 15% तक उनके बच्चे को प्रदान किया जा सकता है. निर्धारित भरण-पोषण (Maintenance) की राशि उचित और यथार्थवादी होनी चाहिए और इसे दोनों में से किसी भी अति से बचना चाहिए अर्थात, पत्नी को दिया जाने वाला भरण-पोषण न तो इतना अधिक (खर्चीला) होना चाहिए कि वह प्रतिवादी के लिए दमनकारी और असहनीय बन जाए और न ही इतना कम होना चाहिए कि वह पत्नी को घोर गरीबी की ओर धकेल दे.

इसके आधार पर कोर्ट ने कहा कि निचली अदालत द्वारा निर्धारित भरण-पोषण (Maintenance) भत्ता, सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्धारित कानून के अनुरूप नहीं है. इसलिए, अतिरिक्त प्रधान न्यायाधीश, परिवार न्यायालय, बुलंदशहर 01.12.2023 को पारित निर्णय और आदेश (मामला संख्या 829/2019: श्रीमती साधना @ साक्षी बनाम जितेंद्र सिंह सोम) में इस हद तक संशोधन किया जाना आवश्यक है कि अब विपक्षी पक्ष संख्या 2 द्वारा रुपये का भुगतान किया जाएगा.
प्रतिवादी-पति को अपने बेटे के बालिग होने तक उसके भरण-पोषण की अपनी देनदारी और जिम्मेदारी से मुक्त नहीं किया जा सकता. पति और पत्नी के बीच विवाद चाहे जो भी हो, बच्चे को इसका खामियाजा नहीं भुगतना चाहिए. बच्चे/बेटे के बालिग होने तक, पिता की उस बच्चे के भरण-पोषण (Maintenance) की देनदारी और जिम्मेदारी बनी रहती है. इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि बेटे को अपने पिता के सामाजिक दर्जे के अनुसार भरण-पोषण (Maintenance) पाने का अधिकार है.
इसके आधार पर कोर्ट ने माना कि बेटे के लिए मासिक भरण-पोषण के तौर पर 17,500/- रुपये की राशि न्यायसंगत, उचित और यथार्थवादी है. अतः, विवादित निर्णय और आदेश में इस हद तक संशोधन किया जाना आवश्यक है कि अब पिता अपने बेटे को 01.12.2023 से प्रति माह 17,500/- रुपये का भुगतान करेगा.
पत्नी के लिए कोर्ट ने भरण पोषण (Maintenance) की राशि 30000 रुपये तय की है. कोर्ट ने केस दाखिल किये जाने की तिथि से भरण पोषण की राशि का बंटवारा भी तय कर दिया और निर्देश दिया कि पति छह समान किश्तों में इसका भुगतान करे. पहली किस्त 1 जुलाई, 2026 से शुरू होगी.
न्यायालय इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि विद्वान विचारण न्यायालय का दृष्टिकोण अत्यंत ही लापरवाहीपूर्ण प्रकृति का था. कोर्ट ने इस निर्णय की एक प्रति, रजिस्ट्रार (अनुपालन) के माध्यम से उत्तर प्रदेश राज्य के समस्त न्यायिक अधिकारियों के मध्य प्रसारित करने का निर्देश दिया ताकि ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि ‘रजनीश बनाम नेहा’ मामले में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए निर्देशों का अक्षरशः और उसकी मूल भावना के अनुरूप अनुपालन किया जाए. सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के अनुपालन में शपथ पत्र दाखिल करना मात्र एक औपचारिकता नहीं है.