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कर्मचारी Corruption Case की कार्यवाही में लगाए गए आरोपों से बरी तो अनुशासनात्मक प्राधिकारी के पास फैसला स्वीकार करना ही एकमात्र विकल्प: हाई कोर्ट

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने घूम मांगने के आरोप में पुलिस विभाग से मिली सजा को रद किया, सिपाही को सेवा में लेने और सभी लाभों का भुगतान करने का आदेश दिया

कर्मचारी Corruption Case की कार्यवाही में लगाए गए आरोपों से बरी तो अनुशासनात्मक प्राधिकारी के पास फैसला स्वीकार करना ही एकमात्र विकल्प: हाई कोर्ट

एक बार जब याचिकाकर्ता Corruption जैसे केस की कार्यवाही में लगाए गए आरोपों से बरी हो जाता है तो अनुशासनात्मक प्राधिकारी के पास एकमात्र विकल्प यही बचता है कि वह बरी करने के उक्त फैसले को स्वीकार करे और उसे उचित प्रभाव दे. आपराधिक अदालत द्वारा Corruption के मामले में दर्ज किए गए निष्कर्ष जो फैसले के बाद अंतिम रूप ले चुके हैं, पुलिस विनियमों के नियम 493 के साथ-साथ केदार नाथ यादव बनाम उत्तर प्रदेश सरकार मामले में घोषित कानून के अनुसार बाध्यकारी हैं.

इस कमेंट के साथ इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच के जस्टिस करुणेश सिंह पवार ने पुलिसकर्मी बलवंत चंद्रा की Corruption में लिप्त होने के आधार दिये गये विभागीय दण्डादेश को रद कर दिया है. कोर्ट ने अपीलीय अथॉरिटी द्वारा पारित आदेश को भी रद करते हुए  याचिकाकर्ता को लखनऊ जिले की सिविल पुलिस में कांस्टेबल के पद पर सेवा में बहाल करने का आदेश दिया है और यह भी कहा है कि वह 11.04.2018 से वेतन, भत्तों और अन्य आनुषंगिक सेवा लाभों के बकाया भुगतान का हकदार होगा.

यह रिट याचिका पुलिस विभाग में आरक्षी के पद पर तैनात बलवंत चन्द्रा की ओर से दाखिल की गयी थी. इसमें सम्पूर्ण विभागीय कर्यवाही के साथ ही दण्डादेश को रद करने की मांग के साथ उसे लखनऊ जिले में सिविल पुलिस में कांस्टेबल के पद पर कार्य जारी रखने की अनुमति देने की मांग की गयी थी.

Prevention of Corruption Act, 1988 की धारा 7/13(1)(d)/13(2) के तहत पंजीकृत हुआ केस

प्रकरण के तथ्यों के अनुसार जब याचिकाकर्ता मोहनलालगंज थाने में कांस्टेबल के पद पर तैनात था, तब उसे लखनऊ जिले के बंथरा पुलिस स्टेशन में दिनांक 10.04.2018 को Prevention of Corruption Act, 1988 की धारा 7/13(1)(d)/13(2) के तहत पंजीकृत ‘केस क्राइम संख्या 97/2018’ के संबंध में गिरफ्तार किया गया. यह गिरफ्तारी शिकायतकर्ता से अवैध परितोषण (घूस) की मांग (Corruption) करने और उसे स्वीकार करने के आरोपों के आधार पर की गई थी.

Corruption में गिरफ्तारी और Prevention of Corruption Act, 1988 की धारा 7/13(1)(d)/13(2) के तहत मामला दर्ज होने के परिणामस्वरूप याचिकाकर्ता को निलंबित कर दिया गया था. निलंबन आदेश से व्यथित याचिकाकर्ता ने रिट याचिका संख्या 100 (S/S) वर्ष 2019 दायर की.

इस याचिका का मुख्य आधार यह था कि उक्त निलंबन, उत्तर प्रदेश पुलिस विनियमों के विनियम 486 और 490 में निहित प्रावधानों के साथ-साथ सर्वोच्च न्यायालय द्वारा ‘उत्तर प्रदेश राज्य बनाम बाबू राम उपाध्याय (1961) 2 SCR 679’ और ‘केदार नाथ यादव बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2005) 3 ESC 1955’ मामलों में निर्धारित विधि के भी विपरीत था. रिट याचिका के लंबित रहने के दौरान ही निलंबन आदेश निरस्त कर दिया गया.

रिट याचिका के लंबित रहने के दौरान ही एक आरोप-पत्र याचिकाकर्ता को तामील कराया गया. यह आरोप-पत्र उन आरोपों पर आधारित था, जो उपर्युक्त FIR संख्या 97 वर्ष 2018 (Corruption) का मुख्य विषय थे. याचिकाकर्ता ने 30.03.2019 को आरोप पत्र के जवाब में अपना उत्तर प्रस्तुत किया जिसमें उसने अपने ऊपर लगाए गए आरोपों से इनकार किया.

विभागीय जांच पूरी होने के बाद जांच अधिकारी ने अपनी रिपोर्ट में याचिकाकर्ता को उसके ऊपर लगाए गए आरोपों (Corruption) का दोषी ठहराया गया. इसके बाद याचिकाकर्ता को एक कारण बताओ नोटिस के साथ दी गई. याचिकाकर्ता ने रिट याचिका संख्या 34508 (S/S) वर्ष 2019 “बलवंत चंद्र बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य” दायर करके उसे चुनौती दी. उक्त रिट याचिका का निपटारा इस न्यायालय द्वारा 13.12.2019 के निर्णय और आदेश के माध्यम से किया गया.

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इसमें कारण बताओ नोटिस में कोई हस्तक्षेप किए बिना याचिकाकर्ता को स्वतंत्रता दी गयी कि वह कारण बताओ नोटिस का स्पष्टीकरण पंद्रह दिनों के भीतर प्रस्तुत करे. जांच अधिकारी के निष्कर्षों को चुनौती देने वाली सभी दलीलों और कानूनी आधारों पर विचार करते हुए अपना विशिष्ट निष्कर्ष देगा कि क्या आपराधिक कार्यवाही और विभागीय कार्यवाही एक साथ चल सकती हैं.

निर्देशों के अनुपालन में याचिकाकर्ता ने कारण बताओ नोटिस का अपना जवाब प्रस्तुत किया. जवाब में उसने अपने लिए उपलब्ध सभी तर्क प्रस्तुत किए. उक्त जवाब पर विचार करने के पश्चात् अनुशासनात्मक प्राधिकारी ने 13.12.2021 का दंडादेश पारित कर दिया. याचिकाकर्ता ने अपीलीय प्राधिकारी के समक्ष विभागीय अपील प्रस्तुत की, जिसे भी खारिज कर दिया गया.

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कोर्ट को बताया गया कि  वर्तमान रिट याचिका के लंबित रहने के दौरान FIR संख्या 97/2018 से जुड़ा आपराधिक मुकदमा विशेष न्यायाधीश, Prevention of Corruption Act-VI, लखनऊ की अदालत में समाप्त हो गया. अदालत ने अपने निर्णय और आदेश के माध्यम से याचिकाकर्ता को सभी आरोपों से बरी कर दिया. याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने तर्क प्रस्तुत दिया कि ‘उत्तर प्रदेश पुलिस विनियम’ के विनियम 486(1) में निहित प्रावधानों को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा ‘स्टेट आफ यूपी बनाम बाबू राम उपाध्याय मामले में आधिकारिक तौर पर ‘अनिवार्य प्रकृति’ का घोषित किया गया है.

उक्त प्रावधान के तहत निर्धारित प्रक्रिया का उल्लंघन करते हुए संचालित की गई कोई भी विभागीय कार्यवाही कानून की दृष्टि से दूषित मानी जाएगी और उसे अवैध घोषित किए जाने योग्य होगी.

उन्होंने यह तर्क भी दिया कि ‘केदार नाथ यादव बनाम स्टेट आफ यूपी मामले में, यह स्पष्ट रूप से निर्धारित किया गया है कि एक बार जब किसी पुलिस अधिकारी को सक्षम आपराधिक न्यायालय (Prevention of Corruption Act) द्वारा बरी कर दिया जाता है तो उस न्यायालय द्वारा दर्ज किए गए निष्कर्ष अंतिम माने जाते हैं और उन्हें बाध्यकारी समझा जाना चाहिए. आरोपों के उसी समूह के आधार पर कोई भी विभागीय कार्यवाही जारी नहीं रखी जा सकती, क्योंकि आपराधिक न्यायालय के निष्कर्षों को सही के रूप में स्वीकार किया जाना अनिवार्य है.

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यह तर्क भी दिया गया है कि इस न्यायालय द्वारा 13.12.2019 को Corruption case में दिये गये निर्णय में जारी किए गए निर्देशों का घोर उल्लंघन किया गया है. न्यायालय ने स्पष्ट रूप से निर्देश दिया था कि दो महीने की अवधि के भीतर एक अंतिम आदेश पारित किया जाए. उक्त अवधि 13.02.2020 को समाप्त हो गई थी जबकि विवादित दंडादेश 13.02.2021 को पारित किया गया.

एक बार जब न्यायालय द्वारा कोई समय-सीमा निर्धारित कर दी जाती है, तो संबंधित प्राधिकारी उसका पालन करने के लिए बाध्य होता है और किसी भी कठिनाई की स्थिति में उसे वैध और संतोषजनक कारण बताते हुए न्यायालय से समय विस्तार की मांग करनी चाहिए. इसके समर्थन में उन्होंने इस न्यायालय के पूर्ण पीठ के निर्णय *अभिषेक प्रभाकर अवस्थी बनाम न्यू इंडिया एश्योरेंस कंपनी लिमिटेड और अन्य*, 2013 SCC OnLine All 14267 पर भरोसा किया.

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इसके विपरीत स्थायी अधिवक्ता ने रिट याचिका का विरोध किया है और कहा कि उत्तर प्रदेश पुलिस अधिकारी और अधीनस्थ रैंक (दंड और अपील) नियमावली, 1991 का निर्माण पुलिस अधिनियम, 1861 की धारा 2 और 7 के साथ पठित धारा 46 की उप-धारा (2) के तहत प्रदत्त शक्तियों के प्रयोग में किया गया है. उक्त नियमावली का अधिभावी प्रभाव है और इसने इस विषय पर सभी पूर्ववर्ती नियमों, विनियमों और कार्यकारी निर्देशों का स्थान ले लिया है. अतः पुलिस विनियमों के पैराग्राफ 486 (i), 492 और 493 पर, साथ ही बाबू राम उपाध्याय (उपर्युक्त), केदार नाथ यादव (उपर्युक्त) और संजय राय (उपर्युक्त) के निर्णयों पर दिया गया संदर्भ भ्रामक है और वर्तमान मामले में लागू नहीं होता है.

फैसला सुनाते हुए बेंच ने कहा कि इस अदालत की डिवीजन बेंच द्वारा केदार नाथ यादव बनाम स्टेट आफ यूपी मामले में निर्धारित कानून को ध्यान में रखते हुए और पुलिस विनियमों के नियम 493 के साथ मिलाकर पढ़ने पर सक्षम आपराधिक अदालत द्वारा दिया गया बरी करने का फैसला विभागीय कार्यवाही पर बाध्यकारी प्रभाव डालता है.

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अनुशासनात्मक प्राधिकारी के लिए यह स्वीकार्य नहीं है कि वह आपराधिक अदालत (Prevention of Corruption Act) द्वारा दिए गए निष्कर्षों की अनदेखी करे या उनके विपरीत जाए. आपराधिक मुकदमे (Prevention of Corruption Act) में दिए गए न्यायिक निर्णय को संबंधित मुद्दों पर अंतिम माना जाना चाहिए, विशेष रूप से तब, जब बरी करने का फैसला मामले के गुण-दोष के आधार पर दिया गया हो.

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