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Candidate बिना किसी विरोध के Exam में शामिल होता है तो उसे परीक्षा के परिणाम को चुनौती देने का अधिकार नहीं होता

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने खारिज की उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग की यूनानी मेडिकल कॉलेज में रीडर पद पर नियुक्ति के खिलाफ याचिका

Candidate बिना किसी विरोध के Exam में शामिल होता है तो उसे परीक्षा के परिणाम को चुनौती देने का अधिकार नहीं होता

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा है कि जब कोई Candidate बिना किसी विरोध के Exam में शामिल होता है तो उसे Exam के परिणाम को चुनौती देने का अधिकार नहीं होता. सुप्रीम कोर्ट द्वारा विभिन्न मामलों में इस सिद्धांत पर विश्वास किये जाने को देखते हुए जस्टिस अनीश कुमार गुप्ता की बेंच ने उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग द्वारा यूनानी मेडिकल कॉलेज में रीडर पद पर नियुक्ति और इसके लिए जारी विज्ञापन की वैधता को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी है.

यह याचिका मूल रूप से याचिकाकर्ता Candidate द्वारा 19.01.2022 के आदेश/सिफारिश को रद्द करने की मांग करते हुए दायर की गई थी जिसके द्वारा उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग ने सरकारी यूनानी मेडिकल कॉलेजों में रीडर के पद पर नियुक्ति के लिए प्रतिवादी संख्या 4 (Candidate) के नाम की सिफारिश की थी. याचिका में प्रतिवादियों को यह निर्देश देने की मांग की गई थी कि वे याचिकाकर्ता को रीडर (सर्जिकल) के रूप में नियुक्त करें क्योंकि वह एक पात्र उम्मीदवार है. बाद में एक संशोधन के माध्यम से याचिकाकर्ता ने 24.09.2019 के विज्ञापन को चुनौती दी.

प्रकरण के तथ्यों के अनुसार राज्य सरकार के अनुरोध पर उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग प्रयागराज ने 24.09.2019 को रीडर/जराहत के एक पद पर नियुक्ति के लिए विज्ञापन जारी किया. विज्ञापन के अनुसरण मे याचिकाकर्ता (Candidate) ने आवेदन किया. वह इंटरव्यू तक पहुंचा लेकिन उसका सेलेक्शन नहीं हुआ. आयोग ने जिस Candidate का चयन उक्त पद के लिए किया था 19.01.2022 के विवादित आदेश के माध्यम से नियुक्ति हेतु उनके नाम की अनुशंसा कर दी.

Candidate के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि विज्ञापन में पात्रता की शर्तें गलत तरीके से निर्धारित की गई थीं

अपना पक्ष रखते हुए याचिकाकर्ता (Candidate) के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि विज्ञापन में पात्रता की शर्तें गलत तरीके से निर्धारित की गई थीं. शर्तों के अनुसार, आवेदक के पास कानून द्वारा स्थापित किसी विश्वविद्यालय से आयुर्वेद/यूनानी में उच्च डिग्री होनी चाहिए, अथवा उत्तर प्रदेश या किसी अन्य राज्य के’भारतीय चिकित्सा बोर्ड’ या संकाय से उच्च डिग्री होनी चाहिए, जो ‘संयुक्त प्रांत [आयुर्वेदिक और यूनानी तिब्बी चिकित्सा प्रणाली] अधिनियम, 1939’ के तहत पंजीकरण योग्य हो.

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याचिकाकर्ताओं की ओर से दिए गए तर्कों का मुख्य जोर इस बात पर था कि वर्ष 1970 में संसद द्वारा ‘भारतीय चिकित्सा केंद्रीय परिषद अधिनियम, 1970’अधिनियमित किया गया था क्योंकि चिकित्सा शिक्षा ‘समवर्ती सूची’ का विषय था.

इसके परिणामस्वरूप, राज्य सरकार ‘उत्तर प्रदेश राज्य आयुर्वेदिक और यूनानी महाविद्यालय शिक्षक सेवा नियमावली, 1990’ बनाकर ऐसी योग्यताएं निर्धारित नहीं कर सकती, जो राज्य अधिनियम, 1939 के तहत निर्धारित की गई थीं. उसे ‘अधिनियम, 1970’ के प्रावधानों के अनुरूप ही योग्यताएं निर्धारित करनी चाहिए थीं. इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए विज्ञापन को ही रद्द करने की मांग की गयी थी.

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वकील ने यह भी कहा कि अधिनियम, 1970 की धारा 36 के अनुसार वर्ष 1986 में कुछ विनियम बनाए गए थे जिनमें बाद में वर्ष 2016 में संशोधन किया गया. ये विनियम ‘रीडर’ के पद पर नियुक्ति के लिए उच्च योग्यताएँ और साथ ही Candidate के लिए स्नातकोत्तर की डिग्री अनिवार्य करते हैं. चूंकि प्रतिवादी संख्या 4 के पास स्नातकोत्तर की योग्यता नहीं थी, अतः वह नियुक्ति के लिए पात्र नहीं थी. याचिकाकर्ता Candidate के पास स्नातकोत्तर की योग्यता थी इसलिए विज्ञापन के अनुसार नियुक्ति में उसे ही प्राथमिकता दी जानी चाहिए थी.

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राज्य के के अधिवक्ता ने तर्क प्रस्तुत किया कि वर्तमान मामले में याचिकाकर्ता Candidate ने न तो 1939 के अधिनियम की वैधता को चुनौती दी है और न ही भारत के संविधान के अनुच्छेद 309 के तहत राज्य सरकार द्वारा बनाए गए 1990 के नियमों को, जो ‘रीडर’ के पद पर नियुक्ति के लिए 1939 के अधिनियम के तहत पंजीकृत होने योग्य योग्यताएं निर्धारित करते हैं.

न तो उक्त 1939 का अधिनियम और न ही 1990 के नियम इस याचिका में चुनौती के दायरे में हैं. इसलिए, राज्य द्वारा अनुच्छेद 309 के तहत बनाए गए सांविधिक नियमों के अनुरूप योग्यताएं निर्धारित करने वाले विज्ञापन पर प्रश्नचिह्न नहीं लगाया जा सकता.

यह भी कहा है कि कानून की यह एक स्थापित स्थिति है कि कोई भी Candidate, जिसने किसी विज्ञापन के आधार पर चयन प्रक्रिया में भाग लिया हो और अयोग्य घोषित कर दिया गया हो, उसे चयन प्रक्रिया के परिणाम घोषित होने के बाद उसे चुनौती देने की अनुमति नहीं दी जा सकती.

कानून की यह एक स्थापित स्थिति है कि अधिनियम, 1970 की धारा 36 के तहत बनाए गए नियम केवल सिफारिशी प्रकृति के होते हैं, अनिवार्य नहीं और प्रोफेसर, रीडर तथा लेक्चरर के पदों पर भर्ती के लिए Candidate कि योग्यता निर्धारित करना ‘भारतीय केंद्रीय चिकित्सा परिषद’ के अधिकार क्षेत्र से बाहर है. यह परिषद केवल व्यापक दिशा-निर्देश ही निर्धारित कर सकती है.

बेंच ने माना कि इस मामले में यह निर्विवाद है कि विज्ञापन के अनुसरण में याचिकाकर्ता ने बिना विज्ञापन को चुनौती दिए ही चयन प्रक्रिया में भाग लिया. चयन प्रक्रिया पूरी हो जाने के बाद ही Candidate ने याचिका दायर की गई है. बेंच ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा ओम प्रकाश शुक्ला बनाम अखिलेश कुमार शुक्ला 1986 Supp SCC 285 की तरफ ध्यान खींचा जिसमें तीन न्यायाधीशों की पीठ ने यह माना है कि जब कोई Candidate बिना किसी विरोध के परीक्षा में शामिल होता है तो उसे परीक्षा के परिणाम को चुनौती देने का अधिकार नहीं होता.

वर्तमान मामले में विज्ञापन वर्ष 2019 में जारी किया गया था इसलिए याचिकाकर्ता Candidate ने बिना कोई आपत्ति उठाए आवेदन किया और चयन प्रक्रिया में भाग लिया. उसका साक्षात्कार भी हुआ था. परीक्षा में सफल न होने पर उसने याचिका दाखिल की. जहाँ तक सार्वजनिक सेवा में नियुक्ति का प्रश्न है, जो कि इस मामले का विषय है, कानून की यह स्थिति स्थापित है कि अनुच्छेद 309 के परंतुक के तहत बनाए गए नियम ही लागू होंगे और 1970 के अधिनियम के तहत बनाए गए सुझावों/विनियमों के साथ किसी भी विरोधाभास की स्थिति में इन्हीं नियमों की प्रधानता होगी.

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परिणामस्वरूप, इस न्यायालय को विज्ञापन में कोई अनियमितता नहीं मिली, जिसमें 1990 के नियमों के तहत निर्धारित योग्यताएं ही निर्धारित की गई थीं. तदनुसार, यह रिट याचिका खारिज की जाती है. कोर्ट ने प्रतिवादियों को निर्देश दिया है कि वे उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग के 19.01.2022 के आदेश के अनुसार आवश्यक कार्रवाई करें. कोर्ट ने अंतरिम आदेश को भी रद कर दिया है.

WRIT – A No. – 835 of 2022 Dr. Albina Versus State Of U.P. And 3 Others

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