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National Human Rights Commission मॉब लिंचिंग हाने पर अपराधियों के खिलाफ केस दर्ज करने को खुद संज्ञान क्यों नहीं लेता, 588 मदरसों की जांच पर रोक जारी रहेगी

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने National Human Rights Commission की भूमिका पर उठाये गंभीर सवाल, 11 मई को किया तलब

National Human Rights Commission मॉब लिंचिंग हाने पर अपराधियों के खिलाफ केस दर्ज करने को खुद संज्ञान क्यों नहीं लेता, 588 मदरसों की जांच पर रोक जारी रहेगी

मुस्लिम समुदाय के लोगों पर हमला और कुछ मामलों में लिंचिंग होने और अपराधियों के खिलाफ केस दर्ज न होने की स्थिति में खुद संज्ञान लेने के बजाय National Human Rights Commission ऐसे मामलों में दखल देते दिखते हैं जिनसे पहली नजर में उनका कोई लेना-देना नहीं होता. इस कमेंट के साथ इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस विवेक सरन की बेंच ने यूपी के 588 मदरसों की जांच कराने पर रोक जारी रखी है. जस्टिस अतुल श्रीधरन ने National Human Rights Commission को कोर्ट में तलब कर लिया है.

बेंच ने इस मामले को रिट-C संख्या 15360/2026 के साथ कनेक्ट कर दिया है और सुनवाई की नई ति​थि 11 मई तय कर दी है. बेंच ने कहा है कि दोनों पक्षों के तर्कों को सुनने के बाद कोर्ट मामले पर विचार करेगा और अंतिम आदेश देगा तब तक पूर्व में पारित अंतरिम आदेश सुनवाई की अगली तारीख तक जारी रहेगा.

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने यह कमेंट भी किया कि, इस कोर्ट को इस बात की जानकारी नहीं है कि National Human Rights Commission उन मामलों में खुद संज्ञान लेता है जहां विजिलेंट कानून अपने हाथ में ले लेते हैं और इस देश के आम नागरिकों को परेशान करते हैं या अलग-अलग समुदायों के लोगों के बीच रिश्तों की वजह से लोगों को परेशान करते हैं या जहां किसी पब्लिक जगह पर दूसरे धर्म के व्यक्ति के साथ एक कप कॉफी पीना भी डरावना काम बन जाता है.

ऐसे मामलों में, इस कोर्ट के सामने कोई उदाहरण नहीं रखा गया है कि स्टेट ह्यूमन राइट्स कमीशन या National Human Rights Commission ने खुद संज्ञान लिया या नहीं. इसके बजाय उसके पास उन मामलों पर विचार करने का समय है जो आर्टिकल 226 के तहत हाई कोर्ट के दायरे में आते हैं और जिनसे अच्छे से न्याय मिल सकता है.

टीचर्स एसोसिएशन मदरसा अरबिया और दो अन्य की तरफ से दाखिल याचिका पर सुनवाई के दौरान कोर्ट में पिटीशनर के वकील ने बहस करने वाले वकील की गैरमौजूदगी में सुनवाई टालने की मांग की. राज्य के वकील ने इसका कड़ा विरोध किया. उनका कहना था कि यह करोड़ों रुपये का मामला है और National Human Rights Commission को मामले की जांच करने और रिपोर्ट फाइल करने का निर्देश दिया गया है.

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यह पता लगाने के लिए कि राज्य इस बात को लेकर कितना परेशान है कि मामला टाला न जाए, कोर्ट ने National Human Rights Commission के 28.2.2025 के तीन ऑर्डर में से पहले ऑर्डर की जांच की. इस ऑर्डर में यह दिखाया गया है कि National Human Rights Commission के सामने शिकायत करने वाले ने कहा है कि राज्य में माइनॉरिटी वेलफेयर डिपार्टमेंट, उत्तर प्रदेश सरकार के अधिकारियों की मिलीभगत से 588 मदरसे चल रहे हैं.

शिकायतकर्ता ने यह भी आरोप लगाया कि ये मदरसे सरकारी ग्रांट लेते हैं लेकिन कोई स्टैंडर्ड पूरा नहीं करते. इनमें अनपढ़ टीचर हैं. बेसिक एजुकेशन इंफ्रास्ट्रक्चर, बिल्डिंग, फर्नीचर, हॉस्टल वगैरह की कमी है. शिकायतकर्ता ने यह भी आरोप लगाया है कि अनपढ़ टीचरों को रिश्वत और राज्य के अधिकारियों को कमीशन देकर भर्ती किया जाता है इसलिए कमीशन से दखल देने की मांग की थी.

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शिकायत डीजी इकोनॉमिक ऑफेंस विंग गवर्नमेंट ऑफ यूपी को National Human Rights Commission के इस निर्देश के साथ भेजी गई है कि शिकायत में लगाए गए आरोपों की जांच की जाए और कमीशन को देखने के लिए चार हफ्ते के अंदर एक्शन टेकन रिपोर्ट पेश की जाए. इसके बाद, शिकायत की एक कॉपी डीजी इकोनॉमिक ऑफेंस विंग गवर्नमेंट ऑफ यूपी को भेजकर उन्हें कमीशन के निर्देशों के अनुसार मामले में सही कार्रवाई करने का निर्देश दिया गया है.

कोर्ट ने National Human Rights Commission के आदेश पर हैरानी जतायी

कोर्ट ने National Human Rights Commission के आदेश पर हैरानी जतायी. कोर्ट ने तथ्यों के आधार पर कहा कि नेशनल ह्यूमन राइट कमीशन की शक्तियां और उसका दायरा और इस्तेमाल का दायरा, प्रोटेक्शन ऑफ ह्यूमन राइट्स एक्ट 1993 से आता है. इस एक्ट में ह्यूमन राइट्स को इस तरह बताया गया है:- सेक्शन 2(1)(d) “ह्यूमन राइट्स” का मतलब है जीवन, आजादी, बराबरी और व्यक्ति की इज्जत से जुड़े अधिकार, जिनकी गारंटी संविधान या इंटरनेशनल समझौतों में है और जिन्हें भारत की अदालतें लागू कर सकती हैं.

कानून यह बिल्कुल साफ करता है कि सिर्फ ऊपर बताए गए कानून में बताए गए ह्यूमन राइट्स के उल्लंघन पर ही ह्यूमन राइट्स कमीशन, चाहे वह नेशनल ह्यूमन राइट्स कमीशन हो या स्टेट ह्यूमन राइट्स कमीशन, कोई भी कॉग्निजेंस लेने के लिए अधिकृत है. नेशनल ह्यूमन राइट्स कमीशन और स्टेट ह्यूमन राइट्स कमीशन को यह समझना चाहिए कि वे कानून के तहत कोई ट्रिब्यूनल नहीं हैं जो मामलों की सुनवाई कर सकें.

बेशक, अगर किसी खास मामले में ह्यूमन राइट्स कमीशन को लगता है कि उसे सेक्शन 2(1)(d) में बताए गए देश के नागरिकों के ह्यूमन राइट्स की रक्षा के लिए दखल देना चाहिए, तो ह्यूमन राइट्स कमीशन अगर चाहे तो शिकायत दर्ज करके खुद किसी सही कोर्ट में शिकायत कर सकता है, या अगर पीड़ित ऐसा नहीं कर सकता है तो शिकायतकर्ता के तौर पर FIR दर्ज करवा सकता है.

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लेकिन पहली नजर में इस कोर्ट को शक है कि क्या एग्जीक्यूटिव के अधिकारियों को ऐसे मामले में जहां ह्यूमन राइट्स शामिल नहीं हैं, किसी खास तरीके से काम करने का ऐसा निर्देश दिया जा सकता है. मामले के नेचर में कोर्ट को हैरानी की बात लगी कि देश में ह्यूमन राइट्स कमीशन ऐसे मामलों में शामिल होने की कोशिश कर रहे हैं, जिन्हें वरना सही ऑर्डर के लिए जरूरत पड़ने पर पीआईएल के जरिए आर्टिकल 226 के तहत हाई कोर्ट में उठाया जाना चाहिए था.

केस के नेचर को देखते हुए खासकर जिस तरह से नेशनल ह्यूमन राइट कमीशन ने आगे बढ़कर शिकायत स्वीकार की ऐसे केस में जहाँ पहली नजर में कोई ह्यूमन राइट्स शामिल नहीं था, कोर्ट ने याची के अधिवक्ता द्वारा मांगे गए पासओवर को मंजूरी देते हुए स्टेट की आपत्तियों को खारिज कर दिया है.

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