प्रश्न: क्या एक मृत Divorced बेटी की माँ, तलाक के आदेश के तहत पत्नी को दी गई राशि प्राप्त करने की हकदार है? हाई कोर्ट का जवाब: बिल्कुल नहीं
इलाहाबाद हाई कोर्ट का फैसला सहमति से तलाक की शर्तों के तहत जमा करायी गयी राशि पर पति का ही हक होगा

क्या एक मृत Divorced बेटी की माँ, तलाक के आदेश के तहत पत्नी को दी गई राशि प्राप्त करने की हकदार है? इसका जवाब इलाहाबाद हाई कोर्ट ने हिंदू महिलाओं के मामले में उत्तराधिकार के सामान्य नियम के हवाले से दिया है. इसके अनुसार किसी हिंदू महिला को अपने पति या अपने ससुर से विरासत में मिली कोई भी संपत्ति, मृतक के किसी बेटे या बेटी (जिनमें किसी पहले से मरे हुए बेटे या बेटी के बच्चे भी शामिल हैं) के न होने पर उप-धारा (1) में बताए गए क्रम के अनुसार अन्य वारिसों को न मिलकर पति के वारिसों को मिलेगी.
इस कानून के अनुपालन में इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस क्षितिज शैलेन्द्र की बेंच ने एक मृत Divorced बेटी की मां की तरफ से कोर्ट में जमा पैसों को उसके पक्ष में रिलीज करने का आग्रह ठुकरा दिया है. कोर्ट ने कहा कि पति ही अपनी दिवंगत Divorced पत्नी के विधिक प्रतिनिधि के रूप में और उसकी मृत्यु के बाद बचे एकमात्र जीवित उत्तराधिकारी के रूप में पारिवारिक न्यायालय में जमा 16 लाख रुपये की राशि प्राप्त करने का हकदार है.
कोर्ट ने पति की याचिका स्वीकार करते हुए प्रधान न्यायाधीश फैमिली कोर्ट बांदा को निर्देश दिया है कि वे वाद संख्या 103/2023 में पारित डिक्री के अनुपालन में याचिकाकर्ता के पक्ष में 16 लाख रुपये की राशि जारी करें. यह याचिका प्रधान न्यायाधीश फैमली कोर्ट बांदा को यह निर्देश जारी करने की प्रार्थना के साथ दायर की गई थी कि याचिकाकर्ता (जो स्वर्गीय किरण रायकवार की माँ हैं) के पक्ष में 16,00,000 रुपये की राशि जारी करें. यह धनराशि पति द्वारा हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13-B के तहत O.S. संख्या 103/2023 में जमा की गई थी.
याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया है कि धारा 13-B के तहत याचिका विवाह के दोनों पक्षों द्वारा संयुक्त रूप से दायर की गई थी. जिसमें आपसी सहमति से विवाह विच्छेद (Divorced) की मांग की गई थी. याचिका पर दिनांक 23.4.2024 के आदेश द्वारा डिक्री (आदेश) पारित किया गया था.
पक्षों के बीच हुए समझौते की शर्तों में से एक शर्त पत्नी (अर्थात् याचिकाकर्ता की बेटी) को 20 लाख रुपये का भुगतान करना था. इसमें से 4 लाख रुपये की राशि पत्नी को भुगतान कर दी गई थी. शेष 16 लाख रुपये की राशि परिवार न्यायालय में जमा कर दी गई थी. पत्नी ने इस राशि को अपने पक्ष में जारी करने के लिए कोर्ट में आवेदन किया था. इसके परिणामस्वरूप फैमली कोर्ट द्वारा चेक तैयार किया गया था. यह चेक उसके पक्ष में जारी किया जाता उससे पहले ही उसकी मृत्यु हो गई.
याचिकाकर्ता ही Divorced की माँ परिवार की एकमात्र जीवित सदस्य
इसके बाद, याचिकाकर्ता जो मृतक पत्नी की माँ हैं ने एक आवेदन दायर किया. इस आवेदन के साथ एक शपथ-पत्र, मृत्यु प्रमाण-पत्र की प्रति और जिलाअधिकारी द्वारा जारी एक प्रमाण-पत्र भी संलग्न था, जिसमें यह प्रमाणित किया गया था कि याचिकाकर्ता ही Divorced की माँ परिवार की एकमात्र जीवित सदस्य हैं. यह अनुरोध किया गया था कि उक्त राशि उनके पक्ष में जारी कर दी जाए. इसमें यह कहा गया कि उक्त राशि संबंधित पारिवारिक न्यायालय के समक्ष जमा है और केवल पति द्वारा दायर की गई एक आपत्ति के कारण ही इसे अभी तक जारी नहीं किया गया है.
कोर्ट ने प्रतिवादी पति द्वारा प्रस्तुत आपत्तियों का अवलोकन किया जिसमें यह कहा गया था कि उक्त राशि पत्नी (Divorced) को भुगतान किए जाने और उसके भरण-पोषण के लिए अभिप्रेत थी. उसकी माँ को यह राशि प्राप्त करने का कोई अधिकार नहीं है.
इसके चलते कोर्ट के समक्ष निर्णय हेतु एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न उत्पन्न हुआ है कि यदि किसी मामले में आपसी सहमति के आधार पर इस शर्त के साथ तलाक मंजूर किया जाता है कि पत्नी को एक निश्चित राशि का भुगतान किया जाएगा और यदि तलाक की डिक्री पारित हो जाने के बाद किंतु Divorced पत्नी द्वारा उक्त राशि प्राप्त किए जाने से पूर्व ही उसकी मृत्यु हो जाती है, तो क्या उस मृतक Divorced पत्नी के विधिक प्रतिनिधि उक्त राशि प्राप्त करने के हकदार होंगी?
कोर्ट ने पाया कि हिंदू पुरुष या महिला के स्वामित्व वाली चल और अचल संपत्तियां हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 या भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 के प्रावधानों के अनुसार उत्तराधिकार द्वारा हस्तांतरित होती हैं. वर्तमान मामले में राशि पत्नी (Divorced) के पक्ष में दी गई थी और पारिवारिक न्यायालय द्वारा चेक भी तैयार किया गया था.
- हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 14 के प्रावधानों का संदर्भ लेना आवश्यक है. ये प्रावधान इस प्रकार हैं:-
- “14. किसी हिंदू महिला की संपत्ति उसकी पूर्ण संपत्ति होगी.”
- (1) किसी हिंदू महिला के कब्जे में कोई भी संपत्ति, चाहे इस अधिनियम के प्रारंभ होने से पहले या बाद में अर्जित की गई हो, वह उसे उसकी पूर्ण स्वामी के रूप में धारण करेगी न कि सीमित स्वामी के रूप में.
- स्पष्टीकरण: इस उप-धारा में, “संपत्ति” में चल और अचल दोनों प्रकार की संपत्तियां शामिल हैं, जो किसी हिंदू महिला द्वारा विरासत या वसीयत द्वारा, या बंटवारे पर, या भरण-पोषण या भरण-पोषण के बकाया के बदले में, या किसी भी व्यक्ति से उपहार के रूप में (चाहे वह रिश्तेदार हो या नहीं), उसकी शादी से पहले, शादी के समय या उसके बाद, या उसके अपने कौशल या परिश्रम से, या खरीद द्वारा, या चिरभोग द्वारा, या किसी भी अन्य तरीके से अर्जित की गई हों और इसमें ऐसी कोई भी संपत्ति भी शामिल है जिसे वह इस अधिनियम के प्रारंभ होने से ठीक पहले “स्त्रीधन” के रूप में धारण किए हुए थी.
- (2) उप-धारा (1) में निहित कोई भी बात ऐसी किसी संपत्ति पर लागू नहीं होगी जो उपहार के रूप में, या किसी वसीयत के तहत, या किसी अन्य लिखत के तहत, या किसी सिविल न्यायालय की डिक्री या आदेश के तहत, या किसी अधिनिर्णय के तहत अर्जित की गई हो. बशर्ते कि उस उपहार, वसीयत या अन्य लिखत, या डिक्री, आदेश या अधिनिर्णय की शर्तें उस संपत्ति में एक “प्रतिबंधित संपदा” निर्धारित करती हों.
- बेंच ने कहा कि धारा 14 के मात्र अवलोकन से यह स्पष्ट होता है कि किसी हिंदू महिला के कब्जे में कोई भी संपत्ति, वह उसे उसकी पूर्ण स्वामी के रूप में धारण करेगी, न कि सीमित स्वामी के रूप में. प्रस्तुत मामले में परिवार न्यायालय द्वारा पारित आदेश में संपत्ति पर कोई ‘सीमित अधिकार’ निर्धारित नहीं किया गया है.

- कोर्ट ने ‘हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम’ की धारा 15 के प्रावधान पर भी चर्चा की, जो इस प्रकार हैं:-
- हिंदू महिलाओं के मामले में उत्तराधिकार के सामान्य नियम?
- (1) बिना वसीयत किए मरने वाली हिंदू महिला की संपत्ति, धारा 16 में बताए गए नियमों के अनुसार, इन लोगों को मिलेगी:
- (a) सबसे पहले, बेटों और बेटियों (जिनमें किसी पहले से मरे हुए बेटे या बेटी के बच्चे भी शामिल हैं) और पति को;
- (b) दूसरे स्थान पर, पति के वारिसों को;
- (c) तीसरे स्थान पर, माँ और पिता को;
- (d) चौथे स्थान पर, पिता के वारिसों को; और
- (e) अंत में, माँ के वारिसों को.
- (2) उप-धारा (1) में कही गई किसी भी बात के बावजूद,
- (a) किसी हिंदू महिला को अपने पिता या माँ से विरासत में मिली कोई भी संपत्ति, मृतक के किसी बेटे या बेटी (जिनमें किसी पहले से मरे हुए बेटे या बेटी के बच्चे भी शामिल हैं) के न होने पर, उप-धारा (1) में बताए गए क्रम के अनुसार अन्य वारिसों को न मिलकर, पिता के वारिसों को मिलेगी
- (b) किसी हिंदू महिला को अपने पति या अपने ससुर से विरासत में मिली कोई भी संपत्ति, मृतक के किसी बेटे या बेटी (जिनमें किसी पहले से मरे हुए बेटे या बेटी के बच्चे भी शामिल हैं) के न होने पर, उप-धारा (1) में बताए गए क्रम के अनुसार अन्य वारिसों को न मिलकर पति के वारिसों को मिलेगी.
कानूनी प्रतिनिधि
कोर्ट ने फैसले में कहा है कि इस मामले को एक और नजरिए से भी देखा जा सकता है यानी सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 2(11) के आलोक में, जो “कानूनी प्रतिनिधियों” को परिभाषित करती है:-
“2(11) ‘कानूनी प्रतिनिधि’ का अर्थ है वह व्यक्ति जो कानून की नजर में किसी मृत व्यक्ति की संपत्ति का प्रतिनिधित्व करता है और इसमें कोई भी ऐसा व्यक्ति शामिल है जो मृत व्यक्ति की संपत्ति में हस्तक्षेप करता है और जहाँ कोई पक्ष किसी प्रतिनिधि की हैसियत से मुकदमा करता है या उस पर मुकदमा किया जाता है तो उस व्यक्ति की मृत्यु होने पर जो इस प्रकार मुकदमा कर रहा है या जिस पर मुकदमा किया गया है वह व्यक्ति जिस पर संपत्ति का अधिकार हस्तांतरित होता है.”
- ‘संपत्ति’ शब्द को ‘ब्लैक्स लॉ डिक्शनरी’ के 7वें संस्करण में इस प्रकार परिभाषित किया गया है:
- “1. किसी व्यक्ति का जमीन या अन्य संपत्ति में हित यानी अधिकार की मात्रा, स्तर, प्रकृति और गुणवत्ता.
- 2. वह सब कुछ जिसका कोई व्यक्ति या संस्था स्वामी है, जिसमें अचल और चल, दोनों प्रकार की संपत्तियाँ शामिल हैं.
- 3. वह संपत्ति जो कोई व्यक्ति अपनी मृत्यु के बाद छोड़ जाता है; किसी मृत व्यक्ति की समस्त परिसंपत्तियाँ और दायित्व.
- 4. जमीन का कोई टुकड़ा, विशेष रूप से वह टुकड़ा जो किसी ‘सुखाधिकार’ से प्रभावित हो.”
- इस मामले का एक तीसरा पहलू भी है, जो CPC की धारा 146 के अंतर्गत आता है, जो इस प्रकार है:-
“146. प्रतिनिधियों द्वारा या उनके विरुद्ध कार्यवाहियाँ:-
जब तक कि इस संहिता या उस समय लागू किसी अन्य विधि द्वारा अन्यथा उपबंधित न हो जहाँ कोई कार्यवाही किसी व्यक्ति द्वारा या उसके विरुद्ध की जा सकती है या कोई आवेदन किया जा सकता है वहाँ ऐसी कार्यवाही उस व्यक्ति के अधीन दावा करने वाले किसी अन्य व्यक्ति द्वारा या उसके विरुद्ध की जा सकती है या ऐसा आवेदन किया जा सकता है.”
धारा 146 के आलोक में, यह स्पष्ट है कि जहाँ कोई कार्यवाही किसी व्यक्ति द्वारा या उसके विरुद्ध की जा सकती है या कोई आवेदन किया जा सकता है वहाँ ऐसी कार्यवाही उस व्यक्ति के अधीन दावा करने वाले किसी अन्य व्यक्ति द्वारा या उसके विरुद्ध की जा सकती है या ऐसा आवेदन किया जा सकता है.
इसलिए यदि याचिकाकर्ता की पुत्री (Divorced) द्वारा (जब वह जीवित थी) प्रस्तुत किया गया आवेदन 16 लाख रुपये के भुगतान की रिहाई के संदर्भ में फलीभूत नहीं हो सका. भले ही पारिवारिक न्यायालय द्वारा चेक तैयार कर लिया गया था, तो उस आवेदन को याचिकाकर्ता द्वारा (उसकी माँ होने के नाते) CPC की धारा 146 के अंतर्गत आगे बढ़ाया जा सकता था. इस प्रयोजन के लिए किसी अन्य कार्यवाही को संस्थित करने की आवश्यकता नहीं थी.
1779/2025; किरण रायकवार (अब दिवंगत) बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य