Fraud और न्याय कभी एक साथ नहीं रह सकते, हाई कोर्ट ने खारिज की आबकारी विभाग के 3 कर्मचारियों की अपील
चीफ जस्टिस की अध्यक्षता वाली दो जजों की बेंच ने सिंगल बेंच के फैसले को सही ठहराया

इस कमेंट के साथ इलाहाबाद हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस अरुण भंसाली और जस्टिस क्षितिज शैलेन्द्र की बेंच ने तीन स्पेशल अपील का एक साथ निस्तारण कर दिया है. बेंच ने कहा कि सिंगल बेंच द्वारा दिये गये फैसले में कोई त्रुटि नहीं है. इसके आधार पर बेंच ने तीनों रिट याचिकाओं को खारिज कर दिया है.
दो जजों की बेंच स्पेशल अपील संख्या 1632/2013; जावेद खान बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (सचिव के माध्यम से) और 5 अन्य, स्पेशल अपील संख्या 1634/2013 (नजीब अली बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और 4 अन्य) और स्पेशल अपील संख्या 388/2014 (मुश्ताक उल्लाह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और 2 अन्य) का नेचर एक जैसा होने के चलते एक साथ सुनवाई कर रही थी. सिंगल बेंच ने अलग अलग पेश की गयी तीनों रिट याचिकाओं को खारिज कर दिया था.
Fraud और मनगढ़ंत दस्तावेजों के आधार पर नियुक्ति प्राप्त की थी
इस फैसले को स्पेशल अपील में चुनौती दी गयी थी. तीनों याचिकाकर्ता आबकारी विभाग के कर्मचारी थे. रिट A संख्या 54819/2013 का फैसला सुनाते हुए सिंगल बेंच ने आगरा के उप आबकारी आयुक्त के आदेश को सही ठहराया था. रिट याचिका ‘A’ संख्या 54821/2013 में अपीलकर्ता नजीब अली की सेवाएँ इस आधार पर समाप्त कर दी थी क उसने जाली (Fraud) और मनगढ़ंत दस्तावेजों के आधार पर नियुक्ति प्राप्त की थी. रिट ‘ए’ संख्या 3689/2014 में मिर्जापुर के याचिकाकर्ता मुश्ताक उल्लाह पर भी धोखाधड़ी (Fraud) करके जाली और मनगढ़ंत दस्तावेजों के आधार पर नौकरी पाने का आरोप लगा और उनकी सेवाएं समाप्त कर दी गयीं.
प्रकरण के तथ्यों के अनुसार आगरा के अपीलकर्ता को 2010 में आबकारी सिपाही के पद पर नियुक्त किया गया. 2013 में आगरा के उप आबकारी आयुक्त ने उसकी सेवाएँ समाप्त कर दीं. उसने आगरा क्षेत्र के उप आबकारी आयुक्त के समक्ष अभ्यावेदन प्रस्तुत किया और साथ ही रिट याचिका संख्या 36360/2013 (जावेद खान बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और 2 अन्य) भी दायर की.
इस रिट याचिका का निस्तारण दिनांक 09.07.2013 के आदेश द्वारा किया गया जिसमें अपीलकर्ता को यह स्वतंत्रता दी गई कि वह सहायक दस्तावेजों के साथ सक्षम प्राधिकारी से संपर्क करे और प्राधिकारी को यह निर्देश भी दिया गया कि वह इस मामले पर एक तर्कसंगत निर्णय लें.

इसके बाद अपीलकर्ता ने प्राधिकारी के समक्ष एक और अभ्यावेदन प्रस्तुत किया जिसके साथ उसने 87 दस्तावेज संलग्न किए थे. इन दस्तावेजों के साथ धोखाधड़ी (Fraud) करके दस्तावेज तैयार करके पेश करने के चलते अभ्यावेदन निरस्त कर दिया गया.
अथॉरिटी ने अपीलकर्ता को सुनवाई का मौका देने के बाद उसके द्वारा दी गई सफाई पर विचार करने के बाद और दस्तावेजों के आधार पर, यह पाया कि याचिकाकर्ता ने वर्ष 2008 में गुरुकुल विश्वविद्यालय, वृंदावन, मथुरा से जो ‘अधिकारी परीक्षा’ का सर्टिफिकेट हासिल किया था वह धोखाधड़ी (Fraud) से बना था और जाली, मनगढ़ंत और अमान्य था. विश्वविद्यालय द्वारा कथित तौर पर आयोजित ‘अधिकारी परीक्षा’ माध्यमिक शिक्षा बोर्ड द्वारा आयोजित हाई स्कूल परीक्षा के बराबर नहीं थी.
अपीलकर्ता के वकील ने दलील दी कि सेवा समाप्ति का आदेश उन दस्तावेजों पर आधारित था जिनकी प्रतियाँ उन्हें नहीं दी गई थीं. इसलिए वह आदेश मान्य नहीं हो सकता. मामले के गुण-दोष के आधार पर तर्क दिया गया कि अपीलकर्ता ने ‘अधिकारी परीक्षा’ (हाई स्कूल)-2008 की मार्कशीट और सर्टिफिकेट पेश किया था.
वकील ने अपीलकर्ता सहित विभिन्न छात्रों द्वारा प्राप्त अंकों के रिकॉर्ड का भी हवाला दिया और दलील दी कि वर्ष 2008 तक उक्त विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित ‘अधिकारी परीक्षा’ (हाई स्कूल) की वैधता को लेकर कोई विवाद नहीं था. 2008 के बाद ही इसे अमान्य घोषित किया गया था.
इसके विपरीत तर्क दिया गया कि यह ऐसा मामला नहीं है जहाँ अपीलकर्ता को सुनवाई का कोई अवसर नहीं दिया गया हो. न केवल उसके स्पष्टीकरण पर विचार किया गया, बल्कि उसे व्यक्तिगत रूप से सुना भी गया. आदेश विभाग द्वारा की गई जांच के आधार पर पारित किया गया था. जांच में सामने आया था कि जिस संस्थान से अपीलकर्ता ने प्रमाण पत्र प्राप्त किया था वहाँ वर्ष 2008 से आगे की अवधि के दौरान कोई भी शैक्षणिक गतिविधियाँ संचालित नहीं की गई थीं.
जांच के दौरान बीएल विद्या मंदिर, देव नगर, झील का पुरवा, जिला-बांदा को कथित रूप से दी गई मान्यता का भी कोई अभिलेख (रिकॉर्ड) नहीं पाया गया. इसके बाद प्राधिकारी इस निष्कर्ष तक पहुंचे कि अपीलकर्ता द्वारा प्रस्तुत किए गए दस्तावेज धोखाधड़ी करके तैयार किये गये जाली (Fraud) और मनगढ़ंत थे. सुनवाई के बाद बेंच ने माना कि अपीलकर्ता को अपना स्पष्टीकरण प्रस्तुत करने का अवसर दिया गया था और व्यक्तिगत सुनवाई के लिए तिथि निर्धारित की गई थी.
वर्ष 2008 की परीक्षाओं से संबंधित अपीलकर्ता की अंक-तालिका का सत्यापन किया गया तो यह तथ्य सामने आया कि अपीलकर्ता द्वारा प्रस्तुत किए गए समस्त साक्ष्य न तो विश्वविद्यालय द्वारा जारी किए गए थे और न ही वहाँ से प्राप्त हुए थे. अपीलकर्ता द्वारा जाली और मनगढ़ंत दस्तावेज पेश किए जाने के संबंध में विभिन्न निष्कर्ष दर्ज करने के बाद प्राधिकारी इस नतीजे पर पहुँचे हैं कि अपीलकर्ता ने जाली (Fraud) और मनगढ़ंत दस्तावेज़ों के आधार पर आबकारी सिपाही के पद पर नियुक्ति हासिल की थी.
धोखाधड़ी (Fraud) से प्राप्त नियुक्ति आदेशों को नियोक्ता के विकल्प पर वैध रूप से रद्द करने योग्य माना जा सकता है, अथवा नियोक्ता द्वारा उन्हें वापस लिया जा सकता है. ऐसे मामलों में केवल इस आधार पर कि कर्मचारी ने धोखाधड़ी (Fraud) से प्राप्त ऐसी नियुक्ति के आधार पर कई वर्षों तक सेवा जारी रखी है, उसे अपने पक्ष में कोई ‘इक्विटी’ (न्यायसंगत अधिकार) या नियोक्ता के विरुद्ध कोई ‘एस्टोपल’ (विधिक रोक) प्राप्त नहीं हो सकता.
जहाँ सेवा में नियुक्ति धोखाधड़ी (Fraud) या छल करके प्राप्त की गई हो तो कानून की नजर में ऐसी नियुक्ति कोई नियुक्ति नहीं मानी जाती है और ऐसी स्थिति में, भारत के संविधान का अनुच्छेद 311 लागू नहीं होता है.
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यदि सिविल पदों पर की गई नियुक्ति ही धोखाधड़ी (Fraud) जालसाजी, अपराध या अवैधता से दूषित है, तो इसका अनिवार्य परिणाम यह होगा कि संविधान के अनुच्छेद 311 के तहत कोई भी संवैधानिक अधिकार प्राप्त नहीं हो सकते हैं. यदि राज्य या संघ की सिविल सेवा के क्षेत्र में प्रवेश करने या उसकी सीमा को पार करने के अधिकार पर ही प्रश्नचिह्न लग जाता है और उसके लिए प्रवेश द्वार बंद कर दिया जाता है तो अनुच्छेद 311 के तहत मिलने वाला सुरक्षा कवच उस पर लागू नहीं होता है.