दहेज हत्या के आरोप में ननदों को जारी Summon Quashed, कोर्ट ने कहा धारा 319 का इस्तेमाल सावधानी से करना जरूरी

बागपत जिले के थाना बड़ौत जहाँ मार्च 2009 में एक महिला रचना का विवाह प्रदीप से हुआ. विवाह के एक वर्ष के भीतर जनवरी 2010 में रचना की जलने के कारण मृत्यु हो गई थी,. जिसके बाद उसके पिता मैनपाल ने पति और ससुराल पक्ष के अन्य सदस्यों के विरुद्ध दहेज हत्या और उत्पीड़न का मामला दर्ज कराया था. पुलिस जांच के दौरान मृतका के मृत्यु पूर्व बयान और अन्य साक्ष्यों के आधार पर याचिकाकर्ता संख्या 3 से 5, जो कि पति की अविवाहित बहनें हैं को निर्दोष पाया गया था और उनके विरुद्ध आरोप पत्र दाखिल नहीं किया गया था.
ट्रायल के दौरान अभियोजन पक्ष के गवाहों के बयानों के आधार पर अपर सत्र न्यायाधीश, फास्ट ट्रैक कोर्ट, बागपत ने 3 मार्च 2011 को एक आदेश पारित कर इन बहनों को भी अतिरिक्त अभियुक्त के रूप में Summon कर लिया था. इस Summon आदेश को चुनौती देते हुए उच्च न्यायालय में पुनरीक्षण याचिका दायर की गई थी. उच्च न्यायालय ने अपने विस्तृत निर्णय में पाया कि मृतका ने अपने मृत्यु पूर्व बयान में केवल अपनी सास मुनेश का उल्लेख किया था और बहनों के विरुद्ध दहेज की मांग के कोई विशिष्ट आरोप नहीं थे.
असाधारण शक्तियों (Summon) का प्रयोग केवल ट्रायल के दौरान आए उन साक्ष्यों के आधार पर होना चाहिए
कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि धारा 319 के तहत असाधारण शक्तियों (Summon) का प्रयोग केवल ट्रायल के दौरान आए उन साक्ष्यों के आधार पर होना चाहिए जो किसी व्यक्ति की संलिप्तता को मजबूती से दर्शाते हों, न कि केवल प्राथमिकी की बातों को दोहराने मात्र से.
अदालत ने यह भी संज्ञान में लिया कि याचिकाकर्ता ऋषिपाल और नितिन पहले ही मुख्य मुकदमे के साथ ट्रायल का सामना कर चुके हैं और 29 मार्च 2012 को उन्हें बरी किया जा चुका है, जिसके कारण उनके संबंध में यह याचिका निष्प्रभावी हो गई. अंततः, कोर्ट ने अविवाहित बहनों के विरुद्ध जारी Summon आदेश को अवैध मानते हुए रद्द कर दिया और उन्हें इस मामले से राहत प्रदान की.
एसिड हमले की सजा के खिलाफ 41 साल बाद अपील खारिज, HC ने कहा सत्र अदालत की कैद की सजा सही
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आगरा के कटरा गडरियान में तीन लोगों पर एसिड फेंकने के आरोपी राजेंद्र को सत्र अदालत से सुनाई गई सात साल की कैद की सजा को सही माना और कहा कि दी गई सजा उचित है जिसमें हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता. कोर्ट ने कहा अभियोजन पक्ष संदेह से परे अपराध साबित करने में सफल रहा. तीनों चश्मदीद घायलों के बयान व अन्य साक्ष्य दोष साबित करने के लिए पर्याप्त है. कोर्ट ने सत्र अदालत आगरा के फैसले के खिलाफ दाखिल अपील खारिज कर दी है.
यह आदेश जस्टिस तेज प्रताप तिवारी ने राजेंद्र की सजा के खिलाफ अपील की सुनवाई करते हुए दिया है. सत्र अदालत ने घटना के एक साल के भीतर अपराध की सजा सुना दी थी और हाईकोर्ट में सजा के खिलाफ अपील का फैसला होने में 41 साल का समय बीत गया.
मालूम हो कि सुभाष अशोक व दिनेश लाउडस्पीकर लगाकर आ रहे थे कि रास्ते में मारने की नीयत से आरोपी ने उनपर एसिड फेंका. कोर्ट ने कहा इनमें से किसी घायल की मौत हो जाती तो निश्चित ही यह हत्या का अपराध होता. किंतु घायलों पर एसिड बेकर घायल करने का साक्ष्य है.
घटना के चश्मदीद गवाह भी है.एक साइकिल व जला हुआ तहमद बरामद किया गया है. सत्र अदालत ने 20 अक्टूबर 85 को सजा सुनाई. 2 अक्टूबर 84 की घटना की एफआईआर 3 अक्टूबर 84 को दर्ज की गई. ट्रायल कोर्ट ने एक साल के भीतर सजा सुना दी और 1985 मे दाखिल अपील पर हाईकोर्ट का फैसला सजा के 41 साल बाद आया. जिसमें सुनाई गई सजा की पुष्टि की.