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विग्नेश शिशिर की 3 Post से विचलित हुए जस्टिस सुभाष विद्यार्थी, राहुल गांधी की दोहरी नागरिकता केस की सुनवाई से किया खुद को अलग

मौजूद याचिकाकर्ता की सुनवाई जारी रखने की गुजारिश को बेंच
ने ठुकराया, हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस नामित करेंगे नयी बेंच

विग्नेश शिशिर की 3 Post से विचलित हुए जस्टिस सुभाष विद्यार्थी, राहुल गांधी की दोहरी नागरिकता केस की सुनवाई से किया खुद को अलग

आरएसएस से जुड़े भाजपा विग्नेश शिशिर की 3 Post के बाद कांग्रेस सांसद लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी की दोहरी नागरिकता को लेकर इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच के जस्टिस सुभाष विद्यार्थी की कोर्ट में चल रही सुनवाई में सोमवार को नया मोड़ आ गया. 17 अप्रैल को ओपन कोर्ट में सुनाया गया फैसला हाई कोर्ट की वेबसाइट पर अपलोड न किये जाने के बाद याचिकाकर्ता विग्नेश शिशिर की तरफ से सोसल मीडिया पर की गयी तीन Post को लेकर व्यथित जस्टिस सुभाष विद्यार्थी ने खुद को इस मामले की सुनवाई से अलग कर लिया है. उन्होंने इस मामले को नयी बेंच के समक्ष नामित करने के लिए हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस के पास भेज दिया है.

सोमवार 20 अप्रैल को इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच के जस्टिस सुभाष विद्यार्थी के हस्ताक्षर के बाद इस फैसले को बेवसाइट पर अपलोड भी कर दिया गया है. नौ पेज के फैसले में बेंच ने सोशल मीडिया पर की गयी तीनों Post को हूबहू पेस्ट करवा दिया है.

बता दें कि 17 अप्रैल को ओपन कोर्ट में लिखवाये गये फैसले में बेंच ने राहुल गांधी के खिलाफ दोहरी नागरिकता के मामले में केस दर्ज करने का आदेश दिया था और कहा था कि सरकार किसी भी स्वतंत्र एजेंसी से दोहरी नागरिकता केस की जांच करा सकती है. ओपन कोर्ट में सुनवाई के बाद जो कुछ भी बोला गया और बाद में पूरा फैसला जो हाई कोर्ट की वेबसाइट पर अपलोड किया गया, उसमें असमानता थी. इसके साथ ही नई डेट 20 अप्रैल लगा दी गयी थी.

सोमवार 20 अप्रैल को अपलोड किये गये फैसले में लिखा गया है कि 17 अप्रैल का फैसला अपलोड होने के बाद याचिकाकर्ता ने सोशल मीडिया पर निम्नलिखित संदेश Post किया:-

“कांग्रेस पार्टी द्वारा पर्दे के पीछे बड़े पैमाने पर गतिविधियाँ और ‘डीप स्टेट’के तत्वों द्वारा सभी को देर रात फोन कॉल. एक ऐसा मोड़ जो किसी साजिश की ओर इशारा करता है.
अभी-अभी पता चला है कि कांग्रेस पार्टी और उनके विदेशी ‘डीप स्टेट’ के सहयोगियों द्वारा विभिन्न उच्च-पदस्थ व्यक्तियों को देर रात फोन किए गए हैं और पर्दे के पीछे गतिविधियाँ की गई हैं.
पर्दे के पीछे चीजों में एक बहुत बड़ा मोड़ आ रहा है.
कृपया सावधान रहें; R&AW और इंटेलिजेंस ब्यूरो हर किसी पर 24×7 नजर रख रहे हैं.
यह एक असली युद्ध है कोई मॉक ड्रिल नहीं.
माननीय इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ द्वारा 17 अप्रैल 2026 को शाम 4:30 बजे के बाद आदेश पारित किए गए थे.
बिना आग के धुआँ नहीं उठता.
मेरा नाम विघ्नेश शिशिर है. मैं RSS का तीसरी पीढ़ी का स्वयंसेवक और भारतीय जनता पार्टी का तीसरी पीढ़ी का कार्यकर्ता हूँ.
मेरे परिवार ने आजादी से पहले से लेकर 18 अप्रैल 2026 को सुबह 11:00 बजे तक आपकी सभी चालों को देखा है.
यदि इसमें कोई भी मोड़ आता है तो मैं सीधे भारत के माननीय मुख्य न्यायाधीश से संपर्क करूँगा और किसी भी साजिश या ‘डीप स्टेट’ की मिलीभगत के बारे में अपना पत्र प्रस्तुत करूँगा.
जय हिंद, वंदे मातरम.
ॐ नमः शिवाय.”

सोशल मीडिया पर Post किए गए एक अन्य संदेश में, याचिकाकर्ता ने लिखा:-

“मैं सभी भारतीय नागरिकों और व्यापक राष्ट्रीय सुरक्षा की ओर से, पूरे साहस, समर्पण, जुनून और 100% सच्ची भावना के साथ यह मुकदमा लड़ रहा हूँ.
रातों-रात क्या जबरदस्त घटनाक्रम घटित हुआ है!
यदि मेरी खुफिया जानकारी सही है और यह हमेशा 100% सटीक होती है. तो…
मैं आम जनता से आग्रह करता हूँ कि वे 17 अप्रैल 2026 की शाम 5 बजे से लेकर 18 अप्रैल की सुबह 11 बजे के बीच जो कुछ भी हुआ है उसके बारे में अपनी आवाज उठाएँ. कृपया यह शिकायत भारत के माननीय मुख्य न्यायाधीश, भारत के सर्वोच्च न्यायालय को भेजें, ताकि वे 17 अप्रैल 2026 को शाम 5 बजे से लेकर 18 अप्रैल को सुबह 11 बजे के बीच हुए इस ‘विशाल खेल’ का स्वतः संज्ञान ले सकें.
यदि मैं जीवित रहा तो मैं सभी भारतीय नागरिकों, राष्ट्रवादियों और देशभक्तों की ओर से अपनी अंतिम सांस तक संघर्ष करता रहूंगा.
जय हिंद. वंदे मातरम.
गणेश इच्छा.
ॐ नमः शिवाय.
शुभकामनाओं सहित,
विग्नेश शिशिर
भारतीय जनता पार्टी

कोर्ट ने यह दोनों कमेंट आर्डर में कोट कराने के बाद लिखा कि याचिकाकर्ता द्वारा सोशल मीडिया पर Post किए गए उपरोक्त संदेशों से पता चलता है कि वह इस न्यायालय पर लांछन लगा रहा है क्योंकि न्यायालय ने 17.04.2026 को खुली अदालत में सुनाए गए आदेश पर हस्ताक्षर करके उसे अपलोड नहीं किया था. इसका कारण 17.04.2026 के उस आदेश में दर्ज है, जिस पर हस्ताक्षर करके उसे इस न्यायालय की वेबसाइट पर अपलोड किया गया था. इन संदेशों से संकेत मिलता है कि याचिकाकर्ता का इस न्यायालय पर से विश्वास उठ गया है.

सोशल मीडिया पर Post किए गए एक और संदेश में, याचिकाकर्ता ने लिखा:-

“पिछले 24 घंटों में उत्पन्न हुई इन असाधारण परिस्थितियों में मैं भारत के सभी लोगों से विनम्र अनुरोध करना चाहूंगा कि वे भारत के माननीय मुख्य न्यायाधीश से आग्रह करें कि वे इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ के माननीय मुख्य न्यायाधीश को निर्देश दें कि वे उस निर्णय को टाइप करके अपलोड करें, जिसे खुली अदालत में सुनाया और घोषित किया गया था; क्योंकि यह मामला भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित है और पिछले 22 वर्षों से लोकसभा में बैठे एक विदेशी नागरिक के संबंध में, प्रत्येक भारतीय नागरिक के व्यापक जनहित से जुड़ा हुआ है.”
आर्डर के अनुसार इस संदेश के साथ, याचिकाकर्ता ने 17.04.2026 को इस न्यायालय द्वारा पारित आदेश के एक अंश का स्क्रीनशॉट भी Post किया है.

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बेंच ने कहा कि विचित्र बात यह है कि सोशल मीडिया पर Post किए गए एक अन्य संदेश में, याचिकाकर्ता ने जनता की राय मांगी है कि क्या उसे इस न्यायालय से यह अनुरोध करना चाहिए कि वह विरोधी पक्ष को नोटिस जारी करे और उसे न्यायालय के समक्ष व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने का आदेश दे; साथ ही उसने यह भी कहा है कि उसे इस न्यायालय और भारत के माननीय सर्वोच्च न्यायालय पर पूर्ण विश्वास है.

याचिकाकर्ता द्वारा सोशल मीडिया पर Post किए गए उपरोक्त पहले तीन संदेशों से संकेत मिलता है कि उसने इस न्यायालय पर लांछन लगाया है. लेकिन, उसके बाद उसने जनता की राय मांगी है कि क्या उसे इस न्यायालय के समक्ष इस मामले को आगे बढ़ाना चाहिए. इन परिस्थितियों में जब याचिकाकर्ता ने सोशल मीडिया Post पर सार्वजनिक रूप से न्यायालय पर लांछन लगाया है तो यह न्यायालय इस मामले की आगे सुनवाई करना उचित नहीं समझता है.

सोमवार को सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता कोर्ट में खुद मौजूद थे. उन्होंने बेंच से अनुरोध किया कि वह इस मामले से स्वयं को अलग न करें. कहा कि 17 अप्रैल को इस अदालत द्वारा सुनाए गए फैसले की तारीफ की थी और इसकी रिपोर्ट ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ में छपी थी. उन्होंने यह भी कहा कि किसी भी सोशल मीडिया Post में इस अदालत पर कोई लांछन नहीं लगाया है.

इस पर बेंच ने कहा कि अदालतें मुकदमेबाजों की तारीफ से प्रभावित नहीं होतीं. 17 अप्रैल के आदेश के बाद किये गये Post इस अदालत पर लांछन लगाने के बराबर हैं. उन्हें ध्यान में रखते हुए मुझे इस मामले की सुनवाई से खुद को अलग करना ही उचित लगता है. इसलिए मैं इस मामले की सुनवाई से खुद को अलग करता हूँ.

इस मामले को समाप्त करने से पहले मुझे यह रिकॉर्ड पर रखते हुए दुख हो रहा है कि याचिकाकर्ता ने इस अदालत को कानूनी स्थिति के बारे में गुमराह किया था. इस बारे में कि क्या धारा 528 BNSS के तहत दायर याचिका में, जिसमें धारा 173 (4) BNSS के तहत आवेदन खारिज करने वाले आदेश को चुनौती दी गई हो, प्रस्तावित आरोपी को नोटिस जारी करना जरूरी है या नहीं.

यह सवाल पार्टियों की ओर से पेश सभी विद्वान वकीलों से पूछा गया था. जिसमें भारत के विद्वान उप सॉलिसिटर जनरल (जिनकी सहायता वकीलों की एक टीम कर रही थी) और विद्वान सरकारी वकील (जिनकी सहायता विद्वान A.G.A.-I और एक A.G.A. कर रहे थे) शामिल थे और उन सभी ने साफ तौर पर कहा था कि प्रस्तावित आरोपी को नोटिस जारी करने की कोई जरूरत नहीं है.

याचिकाकर्ता द्वारा स्वयं और पार्टियों की ओर से पेश सभी विद्वान वकीलों द्वारा बताई गई कानून की उपरोक्त स्थिति गलत प्रतीत होती है; क्योंकि ‘जगन्नाथ वर्मा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य’ (2014 SCC OnLine All. 11859) के मामले में, इस अदालत की एक पूर्ण पीठ ने साफ तौर पर फ़ैसला दिया था कि धारा 156(3) Cr.P.C. के तहत आवेदन खारिज करने वाले आदेश के खिलाफ धारा 397 के तहत दायर आपराधिक पुनरीक्षण में कोई फैसला लिए जाने से पहले आरोपी अपनी बात रखने का अवसर पाने का हकदार है.

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यह सिद्धांत धारा 397 के तहत एक पुनरीक्षण के संदर्भ में निर्धारित किया गया है, लेकिन धारा 528 BNSS के तहत दायर याचिका भी धारा 173(4) BNSS के तहत आवेदन को खारिज करने वाले आदेश की वैधता को चुनौती देती है, यह याचिका काफी हद तक पुनरीक्षण जैसी ही है. इसलिए, जगन्नाथ वर्मा मामले में पूर्ण पीठ द्वारा निर्धारित किया गया उपरोक्त सिद्धांत, धारा 173(4) BNSS के तहत आवेदन को खारिज करने वाले आदेश के खिलाफ धारा 528 BNSS के तहत दायर याचिका पर भी लागू होता प्रतीत होता है.

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