रामपुर के सपा सांसद मोहिबुल्लाह को बड़ी राहत, भाजपा प्रत्याशी घनश्याम सिंह लोधी की Election Petition खारिज
वाद कारण का खुलासा न करना खारिज होने का बना आधार, याचिका में सांसद का चुनाव शून्य घोषित करने की थी मांग

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रामपुर के सपा सांसद मोहिबुल्लाह के चुनाव की वैधता (Election Petition) की चुनौती याचिका खारिज कर दी है. कोर्ट ने कहा हारे भाजपा प्रत्याशी घनश्याम सिंह लोधी ने चुनाव याचिका (Election Petition) में वाद कारण का खुलासा नहीं किया है और जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की बाध्यकारी धारा 83 का अनुपालन नहीं किया है. कोर्ट ने विपक्षी सपा सांसद की सीपीसी के आदेश 7 नियम 11 के तहत दाखिल अर्जी (Election Petition) स्वीकार करते हुए भाजपा प्रत्याशी की चुनाव याचिका खारिज कर दी है. यह आदेश जस्टिस चंद्र कुमार राय ने याची अधिवक्ता मधुर प्रकाश व विपक्षी सांसद के अधिवक्ता नरेंद्र कुमार पाण्डेय को सुनकर दिया है.
इस Election Petition के माध्यम से मोहिबुल्ला के जिला रामपुर के 07-रामपुर संसदीय निर्वाचन क्षेत्र से संसद सदस्य के रूप में हुए चुनाव को चुनौती दी गयी थी. चुनौती का आधार ‘लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951’ की धारा 123 (7) के तहत ‘भ्रष्ट आचरण’ का आरोप, ‘लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 33 और 33(4) के प्रावधानों का पालन न करना तथा निर्वाचित उम्मीदवार के नामांकन पत्र को अनुचित रूप से स्वीकार किया जाना बताया गया था.
Election Petition में आवश्यक तथ्यों का अभाव

सांसद मोहिबुल्ला का पक्ष रखते हुए अधिवक्ता ने कहा कि चुनाव याचिका (Election Petition) में आवश्यक तथ्यों का अभाव है और इसमें कोई ‘वाद-हेतु’ प्रकट नहीं होता है. उन्होंने कहा कि चुनाव याचिका में किए गए अभिकथन, चुनाव को रद्द करने के लिए किसी आधार को आरोपित करने या बताने की श्रेणी में नहीं आते हैं. ऐसे में सीपीसी के आदेश 7 नियम 11 में निहित प्रावधानों के आधार पर चुनाव याचिका को खारिज कर दिया जाना चाहिए.
उन्होंने यह भी तर्क दिया कि Election Petition में अस्पष्ट, सामान्य और भ्रामक आरोप लगाए गए हैं, जो किसी आवश्यक तथ्य को आरोपित करने या बताने के समान नहीं हैं. Election Petition में यह आधार लिया गया है कि चुने हुए उम्मीदवार के नामांकन पत्र को गलत तरीके से स्वीकार किया गया था, लेकिन इस बारे में कोई दलील नहीं दी गई है कि इससे चुनाव पर किस हद तक असर पड़ा है.
Election Petition के पेज नंबर 97 और 98 पर लगे दस्तावेज को देखने से यह साफ पता चलता है कि प्रतिवादी का नाम मतदाता सूची में ठीक कर दिया गया था. प्रतिवादी का नोटरी वाला हलफनामा यह पूरी तरह से साबित करता है कि प्रतिवादी के नामांकन पत्र को स्वीकार करने में कोई भी गैर-कानूनी बात नहीं थी.
चुनाव संचालन नियम, 1961 के नियम 8 में यह तय किया गया है कि यदि किसी उम्मीदवार के नाम की वर्तनी गलत है या उसे गलत तरीके से दिखाया गया है तो चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों की सूची जारी होने से पहले, वह रिटर्निंग अधिकारी को सही फॉर्म में और अपने नाम की सही वर्तनी के साथ लिखित जानकारी दे सकता है.
सुनवाई के दौरान कोर्ट का ध्यान Election Petition के पैरा नंबर 24, 25 और 26 की तरफ आकृष्ट कराया गया. इसमें कहा गया था कि…
“24. यह कि रिटर्निंग ऑफिसर ने प्रतिवादी के नामांकन पत्र को अवैध रूप से स्वीकार कर लिया. यह आवेदन पत्र ‘लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 33 में निहित प्रावधानों के अनुरूप दाखिल नहीं किया गया था. मतदाता सूची में प्रतिवादी के अलग नाम का उल्लेख होने के संबंध में कोई कारण/संतुष्टि व्यक्त किए बिना, प्रतिवादी के प्रभाव और अनुचित दबाव में आकर ऐसा किया, जो ‘लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 123 (7) के तहत परिभाषित ‘भ्रष्ट आचरण’ की श्रेणी में आता है.
25. यह कि उपर्युक्त भ्रष्ट आचरण प्रतिवादी द्वारा स्वयं, उसके कार्यकर्ताओं और समर्थकों द्वारा, रिटर्निंग ऑफिसर की सहमति से किया गया है.
26. यह कि उपर्युक्त तरीके से, प्रतिवादी ने अपने चुनाव की संभावनाओं को आगे बढ़ाने के उद्देश्य से भ्रष्ट आचरण किया है, जैसा कि ‘लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 123(7) के तहत परिकल्पित है और जैसा कि इस चुनाव याचिका के पिछले पैराग्राफों में विस्तार से बताया गया है और इस प्रकार प्रतिवादी का चुनाव शून्य है और उसे शून्य घोषित किए जाने योग्य है.”
दोनों पक्षों के तर्कों को सुनने के बाद बेंच ने कहा कि हमें याचिकाकर्ता की कड़ी निंदा करने में जरा भी हिचकिचाहट नहीं है, जिसने बार-बार और बिना किसी पछतावे के अदालत की प्रक्रिया का घोर दुरुपयोग किया है. हाई कोर्ट के फैसले में दिए गए तथ्यों के बयान से यह पूरी तरह साफ है कि बेंगलुरु की पहली मुंसिफ अदालत में अभी जो मुकदमा चल रहा है, वह मुकदमे की अर्जियां स्वीकार करने के मामले में कानून की उदारता का घोर दुरुपयोग है.
विद्वान मुंसिफ को यह याद रखना चाहिए कि यदि मुकदमे (Election Petition) की अर्जी को ध्यान से- न कि सिर्फ औपचारिकता के तौर पर – पढ़ने पर यह साफ तौर पर परेशान करने वाली और बेबुनियाद लगती है (यानी इसमें मुकदमा करने का कोई स्पष्ट अधिकार नहीं दिखता), तो उन्हें सीपीसी के Order 7, Rule 11 के तहत अपनी शक्ति का इस्तेमाल करना चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उसमें बताए गए आधार पूरे हो रहे हों.
यदि चालाकी भरी लिखावट ने मुकदमे के आधार का भ्रम पैदा कर दिया है, तो पहली सुनवाई में ही भ्रम को खत्म कर देना चाहिए. ऐसे गैर जिम्मेदाराना मुकदमों से निपटने का एकमात्र उपाय एक सक्रिय न्यायाधीश ही है.
निचली अदालतों को पहली सुनवाई में ही संबंधित पक्ष की जाँच करने पर जोर देना चाहिए ताकि ऐसे फर्जी मुकदमों को शुरुआती चरण में ही खत्म किया जा सके. दंड संहिता भी ऐसे लोगों से निपटने में पूरी तरह सक्षम है और इसका इस्तेमाल ऐसे लोगों के खिलाफ जरूर किया जाना चाहिए.
घनश्याम सिंह लोधी ने सांसद मोहिबुल्लाह के चुनाव को भ्रष्ट आचरण के आधार पर शून्य घोषित करने की मांग की थी. कहना था कि विपक्षी का नामांकन पत्र गलत तरीके से स्वीकार किया गया है और विपक्षी का कहना था कि वाद कारण ही नहीं है जिससे चुनाव प्रभावित हो. इनका कहना थाकि सांसद ने वोटर लिस्ट में नाम स्पेलिंग की त्रुटि दुरुस्त करा ली थी.
इसकी जानकारी याची को नहीं थी. बिना ठोस आधार के मनमाने आरोप में Election Petition की गई है. याचिका में वाद कारण का खुलासा नहीं किया गया है. यह कानून के बाध्यकारी नियम का उल्लघंन है. इसलिए याचिका खारिज की जाय.